शेरों सहकारी चीनी मिल विवाद गहराया, 19वें दिन भी जारी रहा किसानों का आंदोलन

मालिकाना हक हस्तांतरण के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा का प्रदर्शन तेज, सरकार पर किसानों के हितों की अनदेखी का आरोप

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शेरों सहकारी चीनी मिल के मालिकाना हक के प्रस्तावित हस्तांतरण के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार 19वें दिन भी जारी रहा। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले प्रदर्शन कर रहे किसानों ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की हिस्सेदारी वाली सहकारी मिल का नियंत्रण बदलने की कोशिश कर रही है।

शेरों चीनी मिल को लेकर किसानों का विरोध तेज

पंजाब में शेरों सहकारी चीनी मिल के प्रस्तावित मालिकाना हस्तांतरण के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। सोमवार को आंदोलन 19वें दिन में प्रवेश कर गया, जहां संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के बैनर तले बड़ी संख्या में किसानों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया।

किसान नेताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक चीनी मिल का नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों और सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है।

किसानों ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

धरना स्थल पर किसान नेताओं हरजिंदर सिंह टांडा, मनजीत सिंह बग्गू, बलकार सिंह वल्टोहा, सुखबाज सिंह सिद्धू और नछत्तर सिंह पन्नू ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया।

नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की सहमति के बिना मिल के मालिकाना ढांचे में बदलाव करने का प्रयास कर रही है, जबकि मिल में सबसे बड़ी हिस्सेदारी किसानों की है।

किसानों का दावा

  • मिल के लगभग 60 प्रतिशत शेयर किसानों के पास हैं।
  • सहकारी संस्था होने के कारण किसानों की भागीदारी सबसे अधिक है।
  • सरकार एकतरफा तरीके से मालिकाना ढांचा नहीं बदल सकती।
  • प्रस्तावित कदम सहकारी व्यवस्था की भावना के विपरीत है।

नवंबर 2025 की अधिसूचना से शुरू हुआ विवाद

यह विवाद नवंबर 2025 में उस समय शुरू हुआ था, जब पंजाब सरकार ने शेरों सहकारी चीनी मिल से संबंधित लगभग 100 एकड़ भूमि के मालिकाना हस्तांतरण को लेकर एक अधिसूचना जारी की थी।

किसान संगठनों का कहना है कि जैसे ही उन्हें इस प्रस्तावित कदम की जानकारी मिली, उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका आरोप है कि यह फैसला किसानों और गन्ना उत्पादकों के हितों के खिलाफ है।

फसल विविधीकरण पर पड़ सकता है असर

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि यदि चीनी मिल की गतिविधियां प्रभावित होती हैं या उसका नियंत्रण बदलता है, तो इसका सीधा असर पंजाब की फसल विविधीकरण नीति पर पड़ेगा।

किसान नेताओं ने कहा कि राज्य सरकार लंबे समय से किसानों को धान-गेहूं चक्र से बाहर निकलकर वैकल्पिक फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

गन्ना खेती को बढ़ावा जरूरी

किसानों का तर्क है कि गन्ना ऐसी फसलों में शामिल है जो फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे सकती है। यदि चीनी मिलों की स्थिति कमजोर होती है, तो किसान गन्ना उत्पादन से दूर हो सकते हैं।

उनका कहना है कि फसल विविधीकरण की नीति तभी सफल हो सकती है जब गन्ना किसानों को स्थायी बाजार और प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध हों।

सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग

प्रदर्शनकारी किसानों ने सरकार से प्रस्तावित मालिकाना हस्तांतरण के निर्णय को वापस लेने और किसानों के साथ बातचीत कर समाधान निकालने की मांग की है।

किसान संगठनों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होती, आंदोलन जारी रहेगा।


Key Highlights:

  • शेरों सहकारी चीनी मिल विवाद पर किसानों का आंदोलन 19वें दिन पहुंचा
  • संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले जारी है प्रदर्शन
  • किसानों ने मालिकाना हस्तांतरण का किया विरोध
  • मिल में करीब 60% हिस्सेदारी किसानों की होने का दावा
  • नवंबर 2025 की अधिसूचना के बाद शुरू हुआ विवाद
  • फसल विविधीकरण और गन्ना खेती पर असर पड़ने की आशंका
  • सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग

FAQ Section:

Q1. शेरों सहकारी चीनी मिल विवाद क्या है?

उत्तर: किसानों का आरोप है कि सरकार मिल और उससे जुड़ी भूमि के मालिकाना ढांचे में बदलाव करना चाहती है, जिसका वे विरोध कर रहे हैं।

Q2. किसान इस फैसले का विरोध क्यों कर रहे हैं?

उत्तर: किसानों का दावा है कि मिल में उनकी बहुमत हिस्सेदारी है और सरकार उनकी सहमति के बिना मालिकाना ढांचा नहीं बदल सकती।

Q3. आंदोलन कितने दिनों से जारी है?

उत्तर: किसानों का आंदोलन 19वें दिन भी जारी रहा।

Q4. किसानों को किस बात की चिंता है?

उत्तर: किसानों का कहना है कि इस कदम से गन्ना खेती और पंजाब की फसल विविधीकरण नीति प्रभावित हो सकती है।


Conclusion:

शेरों सहकारी चीनी मिल को लेकर जारी विवाद अब पंजाब के किसान आंदोलन का महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है। किसानों का कहना है कि यह मामला केवल एक संस्थान के नियंत्रण का नहीं बल्कि कृषि हितों, सहकारी ढांचे और फसल विविधीकरण के भविष्य से जुड़ा है। सरकार और किसान संगठनों के बीच संवाद ही इस विवाद का स्थायी समाधान निकाल सकता है।Screenshot_2201

Edited By: Karan Singh

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