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DBRANLU में राष्ट्रीय सम्मेलन: जस्टिस एचआर खन्ना की संवैधानिक विरासत और न्यायिक स्वतंत्रता पर मंथन
'50 Years of the Constitutional Dissent' विषय पर देशभर के न्यायविद, शिक्षाविद और शोधार्थी हुए एक मंच पर एकत्रित
डॉ. बीआर अंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (DBRANLU) में जस्टिस एचआर खन्ना की ऐतिहासिक असहमति (Dissent) और संवैधानिक मूल्यों पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में न्यायिक स्वतंत्रता, कानून के शासन और भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर विस्तृत चर्चा हुई।
DBRANLU में जस्टिस एचआर खन्ना की विरासत पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन
डॉ. बीआर अंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (DBRANLU) ने गुरुवार को "50 Years of the Constitutional Dissent: Revisiting Justice HR Khanna’s Legacy" विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया।
सम्मेलन का उद्देश्य जस्टिस एचआर खन्ना की ऐतिहासिक असहमति (Dissenting Opinion), न्यायिक स्वतंत्रता, कानून के शासन (Rule of Law) और भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक मूल्यों पर सार्थक अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना था।
इस कार्यक्रम में देशभर से न्यायविद, विधि विशेषज्ञ, शिक्षाविद, शोधार्थी और छात्र शामिल हुए।पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आदर्श कुमार गोयल रहे मुख्य अतिथि
सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) आदर्श कुमार गोयल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
विशिष्ट अतिथियों में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के कुलपति प्रो. (डॉ.) जीएस बाजपेयी तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज के सहायक प्रोफेसर डॉ. दीपक शर्मा उपस्थित रहे।
'संविधान केवल दस्तावेज नहीं, न्याय और स्वतंत्रता की नींव'
मुख्य वक्तव्य देते हुए जस्टिस (सेवानिवृत्त) आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानव गरिमा की आधारशिला है।
उन्होंने कहा कि जस्टिस एचआर खन्ना का ऐतिहासिक असहमति वाला फैसला न्यायिक साहस, संवैधानिक नैतिकता और कानून के शासन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
आपातकाल का किया उल्लेख
जस्टिस गोयल ने कहा कि आपातकाल के दौरान जस्टिस एचआर खन्ना ने यह सिद्ध किया कि किसी भी न्यायाधीश का सर्वोच्च दायित्व राज्य की सत्ता नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना होता है।
उन्होंने कानून के विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे विधि शिक्षा को केवल करियर का माध्यम न मानें, बल्कि इसे न्याय, ईमानदारी, सार्वजनिक सेवा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का साधन समझें।
कुलपति ने बताई कानूनी शिक्षा की जिम्मेदारी
DBRANLU के कुलपति डॉ. देविंदर सिंह ने कहा कि जस्टिस एचआर खन्ना का जीवन और उनकी न्यायिक सोच आज भी संवैधानिक नैतिकता, न्यायिक स्वतंत्रता और नैतिक साहस के मूल्यों के माध्यम से नई पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
उन्होंने कहा कि विधि शिक्षा संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को ऐसे महान न्यायविदों के आदर्शों और संवैधानिक मूल्यों से परिचित कराएं।
Key Highlights:
- ● DBRANLU में "50 Years of the Constitutional Dissent" विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित।
- ● जस्टिस एचआर खन्ना की न्यायिक विरासत और संवैधानिक मूल्यों पर चर्चा।
- ● पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस (सेवानिवृत्त) आदर्श कुमार गोयल मुख्य अतिथि रहे।
- ● न्यायिक स्वतंत्रता, कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए।
- ● कानून के छात्रों से संविधान और न्याय के मूल्यों को प्राथमिकता देने का आह्वान।
FAQ Section:
Q1. राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किस विश्वविद्यालय ने किया?
उत्तर: डॉ. बीआर अंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (DBRANLU) ने सम्मेलन आयोजित किया।
Q2. सम्मेलन का मुख्य विषय क्या था?
उत्तर: "50 Years of the Constitutional Dissent: Revisiting Justice HR Khanna’s Legacy"।
Q3. सम्मेलन के मुख्य अतिथि कौन थे?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और NGT के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) आदर्श कुमार गोयल।
Q4. सम्मेलन में किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
उत्तर: न्यायिक स्वतंत्रता, संविधान, कानून का शासन, संवैधानिक नैतिकता और भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों पर विस्तृत चर्चा की गई।
Conclusion:
DBRANLU द्वारा आयोजित यह राष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय संविधान, न्यायिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर अकादमिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बना। जस्टिस एचआर खन्ना की न्यायिक विरासत और उनके सिद्धांत आज भी विधि छात्रों, शिक्षाविदों और न्यायपालिका के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।

