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‘टाइगर अभी ज़िंदा है’: बिहार चुनाव परिणामों से पहले JDU में जश्न, पार्टी ऑफिस में लगा पोस्टर

‘टाइगर अभी ज़िंदा है’: बिहार चुनाव परिणामों से पहले JDU में जश्न, पार्टी ऑफिस में लगा पोस्टर बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों का इंतज़ार अब ख़त्म होने वाला है। शुक्रवार सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी और शाम तक अंतिम परिणाम घोषित किए जाएंगे। हालांकि, नतीजे आने से पहले ही जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) के दफ्तरों में उत्साह और खुशी का माहौल देखने को मिल रहा है। ज़्यादातर एग्ज़िट पोल्स ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार बनने की संभावना जताई है, जिसमें जेडीयू को भी मजबूत स्थिति में दिखाया गया है। इन रुझानों से जेडीयू कार्यकर्ता और समर्थक बेहद उत्साहित हैं और परिणाम आने से पहले ही जश्न मनाना शुरू कर चुके हैं। ‘टाइगर अभी ज़िंदा है’ पोस्टर से गूंजा JDU दफ्तर पटना स्थित जेडीयू राज्य मुख्यालय के बाहर एक बड़ा और आकर्षक पोस्टर लगाया गया है, जिसमें लिखा है —“टाइगर अभी ज़िंदा है।”यह पोस्टर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थन में लगाया गया है। पोस्टर पर यह भी लिखा गया है कि “नीतीश कुमार दलितों, महादलितों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, ऊंची जातियों और अल्पसंख्यकों के रक्षक हैं।”यह पोस्टर जेडीयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रणजीत सिन्हा की ओर से लगाया गया है। NDA खेमे में खुशी की लहर एग्ज़िट पोल के सकारात्मक रुझानों से पूरे एनडीए कैंप में जश्न का माहौल है। भाजपा और जेडीयू दोनों ही दलों के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी को लेकर आत्मविश्वास से भरे दिख रहे हैं। जेडीयू दफ्तरों में ढोल-नगाड़ों और पटाखों के साथ जश्न मनाया जा रहा है। महागठबंधन का दावा, ‘नतीजों में आएगा उलटफेर’ दूसरी ओर महागठबंधन के नेता और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने एग्ज़िट पोल्स को पूरी तरह खारिज कर दिया है। तेजस्वी यादव का कहना है कि उनकी पार्टी और गठबंधन असली नतीजों में बेहतर प्रदर्शन करेगा। अब सबकी निगाहें शुक्रवार को आने वाले आधिकारिक चुनाव परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि बिहार की सत्ता पर किसका कब्ज़ा होगा।
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बिहार का चेहरा क्यों हैं नीतीश कुमार, जनता के मन में कितना समाए हैं

बिहार का चेहरा क्यों हैं नीतीश कुमार, जनता के मन में कितना समाए हैं एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि बिहार में एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व एनडीए की सरकार बनने जा रही है. रंजन ऋतुराज बता रहे हैं कि आखिर बिहार में हर हाल में नीतीश कुमार ही चेहरा क्यों हैं. पटना: सिर्फ एग्जिट पोल के आंकड़े ही नहीं बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर रखने वाले राजनीतिक पत्रकारों और विश्लेषकों का भी मानना है कि इस बार एक बार फिर नीतीश कुमार ही विजेता होने चाहिए. आखिर ऐसा क्यों है? उम्र के इस पड़ाव पर भी बिहार में नीतीश कुमार क्यों अहमियत रखते हैं? 20 सालों के लंबे शासन के बाद भी नीतीश कुमार सबसे मजबूत विकल्प क्यों हैं? तमाम आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद नीतीश कुमार ही चेहरा क्यों हैं? आखिरकार किस हद तक नीतीश कुमार बिहार की जनता के मन में समाए हुए हैं?  नीतीश कुमार की राजनीति नीतीश कुमार की व्यक्तिगत राजनीति को देखें तो उनपर हमलावर प्रशांत किशोर तक उन्हें एक व्यक्तिगत भ्रष्टाचार मुक्त नेता मानते हैं .दूसरी प्रमुख बात है उनकी सामान्य प्रशासन पर पकड़. तीसरी सबसे प्रमुख बात नीतीश पर महिला वोटरों का विश्वास.यह तीन ऐसे फैक्टर हैं, जिसका काट पक्ष और विपक्ष में अभी तक तैयार नहीं हुआ है. स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि बीजेपी को अपने कार्यालय में भी नीतीश कुमार के चेहरे वाले पोस्टर लगाने पड़े. नीतीश कुमार के पास हर धर्म और जाति के वोट हैं. इस चुनाव में हर वर्ग में उनके लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर देखा गया. माना जाता है कि मुस्लिम समाज एनडीए को वोट नहीं देता है फिर भी कई जगहों पर मुस्लिम महिलाओं का वोट नीतीश को मिला है. यह प्रतिशत बहुत कम हो सकता है, लेकिन मिला है. नीतीश कुमार का असल जादू 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में देखा गया था, जब यादव समाज ने भी उन्हें वोट दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि लालू यादव की पार्टी महज 22 सीटों पर सिमट गई थी. यह उनका व्यक्तिगत करिश्मा ही था. यह नीतीश कुमार का विकास ही था. यह नीतीश कुमार का सफल प्रशासन और उनकी जबरदस्त स्वीकृति ही थी जिसपर सवार होकर भी बीजेपी राज्य में अपना कोई नेता नहीं बना सकी.  नीतीश बीजेपी के साथ जाते हैं तो सत्ता का सुख बीजेपी भोगती है.नीतीश तेजस्वी के साथ जाते हैं तो सत्ता का सुख तेजस्वी भोगते हैं. नीतीश रूठते हैं तो हस्तिनापुर में हड़कंप मच जाता है. नीतीश पैदल तेजस्वी के घर जाते हैं तो वहां दिवाली मनाई जाती है. जब नीतीश कुमार अकेले गए थे चुनाव में इसके साथ यह भी एक सच है कि जब 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार अकेले जाते हैं तो केवल दो सीटें जीत पाते हैं. लेकिन उस चुनाव में लोगों ने मोदी को चुना था. इस शर्त के साथ की 2015 में वो सभी वोटर वापस नीतीश के साथ फिर लौट आएंगे. लेकिन नीतीश कुमार धैर्य खो बैठे और भय में वापस लालू कैंप चले गए. नीतीश कुमार का वापस लालू कैम्प में जाना तेजस्वी के लिए वरदान साबित हुआ. यह एक ऐसा वरदान साबित हुआ कि आज तेजस्वी अकेले एक हेलीकॉप्टर में हैं, तो उनके पीछे एनडीए ने 30 हेलीकॉप्टर लगा रखे हैं.  खैर, अब 14 नवंबर को पता चलेगा कि मीडिया हाउस के एग्जिट और हम जैसों के आकलन सच में नीतीश को विजेता बनाते हैं या फिर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है. लेकिन किसी भी सूरत में फिलहाल कागज पर नीतीश कुमार ही हैं. इसमें तो कोई दो राय नहीं होनी चाहिए. लेकिन लोकतंत्र में जनता ही भाग्य विधाता है.   
राष्ट्रीय  उत्तर प्रदेश 

बस के ड्राइवर और कंडक्टर को मिला रुपयों से भरा बैग, दोनों ने किया ऐसा काम की हो रही है जमकर तारीफ

बस के ड्राइवर और कंडक्टर को मिला रुपयों से भरा बैग, दोनों ने किया ऐसा काम की हो रही है जमकर तारीफ राजस्थान के एक बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने ईमानदारी की मिसाल पेश करते हुए एक बुजुर्ग यात्री का रुपयों से भरा बैग वापस कर दिया. इससे खुश हुए यात्री ने दोनों का माला और साफा पहनाकर सम्मानित किया. उसने उन्हें नगद इनाम भी दिया. दौसा: लोगों को आए दिन बेईमानी और ठगी के किस्से सुनने को मिलते हैं, वहीं राजस्थान के दौसा जिले में एक बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने ईमानदारी की मिसाल पेश की. डीग से जयपुर जा रही राजस्थान लोक परिवहन सेवा की बस में एक बुजुर्ग यात्री का दो लाख 35 हजार रुपए से भरा बैग छूट गया था. इससे बुजुर्ग यात्री परेशान हो गए. उन्होंने किसी तरह से बस के कंडक्टर और ड्राइवर से संपर्क साधा. दोनों ने अगले दिन इस बुजुर्ग यात्री को उसका रुपयों से भरा बैग वापस कर दिया. खुश बुजुर्ग ने कंडक्टर और ड्राइवर को माला और साफा पहनाकर स्वागत किया. उन्होंने दोनों को ईनाम के रूप में 11 सौ रुपये देकर सम्मानित किया.  बस ड्राइवर और कंडक्टर का सम्मान मिली जानकारी के मुताबिक रेवडमल ग्राम खोचपुरी निवासी एक बुजुर्ग मंगलवार सुबह करीब आठ बजे जयपुर जाने के लिए बस में सवार हुए. उनके पास पैसों से भरा बैग था. इसे वे सीट पर रखकर उतरते समय भूल गए. बाद में जब उन्हें याद आया तो उन्होंने तुरंत बस स्टैंड और आसपास के लोगों से पूछताछ शुरू की. इस दौरान महवा बस अड्डे पर बस संचालन देख रहे कमल राम मीणा को सूचना दी गई. उन्होंने तत्परता दिखाते हुए संबंधित बस के ड्राइवर दिगंबर मीणा और कंडक्टर बबलू मीणा से संपर्क किया. उन्होंने बताया कि बस में छोड़ा गया बैग उनके पास सुरक्षित है. बुधवार सुबह बस के महवा लौटने पर  बबलू मीणा ने वह बैग जस का तस बुजुर्ग को सौंप दिया. अपना खोया हुआ बैग पाकर बुजुर्ग की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने भावुक होकर कहा, ''आज भी इंसानियत जिंदा है.जिन लोगों ने मेरे इतने पैसे लौटाए,वे मेरे लिए फरिश्ता हैं.''  रेवडमल में बुधवार को ग्रामीणों की मौजूदगी में बुजुर्ग ने दिगंबर मीणा और कंडक्टर बबलू मीणा का माला और साफा पहनाकर स्वागत किया. बुजुर्ग ने उन्हें इनाम के रूप में 11 सौ रुपये दिए. उन्होंने कमल राम मीणा को भी सम्मानित किया. इस घटना की दौसा जिले में चर्चा है. लोगों ने दिगंबर मीणा और कंडक्टर बबलू मीणा की ईमानदारी की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कर्मठ और सच्चे कर्मचारी ही समाज के लिए प्रेरणा हैं. 
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बिहार में रैलियों का हुआ रैला,नेताओं ने की कम से कम 1,530 रैलियां और रोड शो, जानिए किस नेता ने की कितनी सभा

बिहार में रैलियों का हुआ रैला,नेताओं ने की कम से कम 1,530 रैलियां और रोड शो, जानिए किस नेता ने की कितनी सभा बिहार के इस चुनाव में जो शब्द सबसे अधिक बार बोला गया वो था जंगलराज फिर महाजंगलराज भी आया वहीं विपक्ष ने जुमलेबाज शब्द का भी इस्तेमाल किया. पटना: बिहार में दूसरे चरण का प्रचार खत्म होने के बाद अब यह आकलन किया जा रहा है कि सभी दलों ने अपनी-अपनी जो ताकत झोंकी है उसका परिणाम क्या होगा. बिहार में यदि सभी प्रमुख नेताओं की रैलियों की संख्या को जोड़ दिया जाए तो यह एक हजार से अधिक है.कहने का मतलब है कि जिस बिहार चुनाव के लिए यह कहा जा रहा था कि कम वक्त मिला है,चुनाव गर्माया नहीं है,छठ की वजह से चुनाव प्रचार जोड़ नहीं पकड़ रहा है,दो ही चरण का चुनाव है वैगरह-वैगरह.मगर आंकड़े कुछ और ही कहते हैं दरअसल सभी राजनीतिक दलों ने पूरा जोड़ लगा दिया इस चुनाव में. प्रधानमंत्री ने 14 सभाएं की तो राहुल गांधी ने 16. पुराने तेवर में दिखे नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री ने 84 मीटिंग की जिसमें 11 सड़क मार्ग से. सभी नेताओं ने सड़क मार्ग से सभांए की क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान 2-3 दिन मौसम खराब रहा जब हेलीकॉप्टर उड़ नहीं पाए.एनडीए की तरफ से तमाम बड़े नेताओं के साथ साथ बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी जम कर रैलियां की है जिसमें उत्तरप्रदेश ,दिल्ली ,मध्यप्रदेश और असम के मुख्यमंत्री शामिल हैं. एनडीए की तरफ से प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्टार कैंपेनर रहे नीतीश कुमार ने करीब एक हजार किलोमीटर की सड़क यात्रा भी की है..लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने भी कई बार पटना और अन्य जगहों पर रात्रि विश्राम किया.गृहमंत्री अमित शाह ने 24,रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 13 और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने 11 रैलियों को संबोधित किया.इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कई नामांकन में शामिल हुईं और कुल मिलाकर 18 मीटिंग की. उसी तरह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बिहार में बहुत डिमांड थी उन्होंने 30 रैलियां और एक रोड शो किया , मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने भी रैलियों को संबोधित किया. एनडीए के तरफ से चिराग पासवान ने भी पूरी ताकत झोंक दी चिराग की पार्टी भले ही 29 सीटों पर लड़ रही थी मगर चिराग ने 186 सभांए की तो जीतन राम मांझी ने 32 और उपेन्द्र कुशवाहा ने 46 जन सभाओं को संबोधित किया दोनों केवल 6-6 सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे हैं.  राहुल गांधी ने कितनी रैली की? जबकि महागठबंधन की तरफ से राहुल गांधी ने 16 और प्रियंका गांधी ने 13 सभाओं को संबोधित किया वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 3 रैली की. महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव ने सबसे ज्यादा 183 सभाएं की 55 घंटे हेलिकॉप्टर से यात्रा की ,एक दिन में 18 सभाएं भी की,कई रोड शो किए.आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल और आरजेडी के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भी 50-50 सभाएं की हैं. महागठबंधन और वीआईपी पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने 161 सभाओं को संबोधित किया. महागठबंधन के एक और प्रमुख घटक वाम मोर्चे के तरफ से माले के नेताओं ने 149, सीपीआई के 113 तो सीपीएम के नेताओं ने 78 सभाओं को संबोधित किया. इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि समाजवादी पार्टी जिसका बिहार में एक भी उम्मीदवार नहीं था उसके नेता अखिलेश यादव ने महागठबंधन के लिए 25 रैलियां की है, उन्हीं की पार्टी की सांसद इकरा हसन ने भी सीमांचल में कुछ रैलियां की है. इमरान प्रतापगढ़ी भी थे डिमांड में कांग्रेस के तरफ से इमरान प्रतापगढ़ी के सभाओं की भी बहुत मांग थी क्योंकि वो अच्छा बोलते हैं और उनके भाषण में शेरों शायरी भी रहती है. इमरान प्रतापगढ़ी ने भी 55 सभाओं को संबोधित किया जिसमें रोड शो भी है..वहीं जनसुराज के नेता प्रशांत किशोर लगातार तीन महीने से सभाएं और रोड शो कर रहे है मगर चुनाव की घोषणा के बाद से 160 रैलियों को संबोधित कर चुके हैं. क्या थे चुनावी मुद्दे? अब बात करते हैं मुद्दों की बिहार का यह चुनाव शुरू हुआ था वोट चोरी को लेकर फिर प्रधानमंत्री की मां को लेकर कहे गए अपशब्द से होता हुआ जब चुनाव की घोषणा हुई तब नौकरी रोजगार पर बात आई तेजस्वी ने पढ़ाई,दवाई,सिंचाई की बात शुरू की मगर बाद में ओसामा और कट्टा पर आकर खत्म हुई. नेताओं ने एक दूसरे पर निजी हमले किए एक दूसरे के परिवार को घसीटा,एक दूसरे को देशद्रोही,झूठा,भ्रष्ट और अपराधियों का संरक्षक बताया यानि अमर्यादित बयानों की भरमार रही और यह सब मंच से लेकर सोशल मीडिया के रील्स तक में छाया रहा. बिहार के इस चुनाव में जो शब्द सबसे अधिक बार बोला गया वो था जंगलराज फिर महाजंगलराज भी आया वहीं विपक्ष ने जुमलेबाज शब्द का भी इस्तेमाल किया. बिहार का इस बार का चुनाव प्रचार कनपट्टी पर कट्टा से लेकर सिक्सर की छह गोली छाती में मार देंगे के लिए भी याद किया जाएगा.यही नहीं अप्पू,पप्पूऔर टप्पू जैसी टिप्पणियों का उपयोग हुआ.चुनाव के बीच में बिहार का महापर्व छठ भी आया तो चुनाव प्रचार में भी उसका जिक्र हुआ और छठी मैया के अपमान का मुद्दा उठा तो छठ के लिए ट्रेनों में ठूंस ठूंसकर लौटते लोगों का भी जिक्र हुआ.वक्फ से लेकर नमाजवादी तक कह कर वोट मांगे गए. गायब रहे असली मुद्दे मगर पूरे चुनाव में बिहार के असली मुद्दे गायब रहे नौकरियों के वादे दोनों तरफ से किए गए मगर रोजगार,पलायन,शिक्षा,स्वास्थ्य,किसानों की हालत,उद्योग और कानून व्यवस्था पर अधिक चर्चा नहीं हुई.किसी ने यह नहीं सेचा कि पिछले 20 साल के शासन का कोई रिपोर्ट कार्ड दिया जाए .यह बिहार का दुर्भाग्य है नेता अपनी बात कह कर चले जाते हैं और असली मुद्दा गुम हो जाता है.बिहार के लोग बाहर जाकर खूब सफल होते हैं मगर अपने घर में बदहाली के लिए मजबूर हैं.बिहार का समाज आज भी जातियों में बंटा है जिसका फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं और अंत  में बिहार के लोग अपने आप को ठगा महसूस करते हैं  
उत्तर प्रदेश 

यूपी के सभी स्कूलों में वंदे मातरम को करेंगे अनिवार्य, सीएम योगी का ऐलान

यूपी के सभी स्कूलों में वंदे मातरम को करेंगे अनिवार्य, सीएम योगी का ऐलान सीएम योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "अगर देश में कोई दोबारा जिन्ना पैदा होने की कोशिश करता है, तो उसे हम यहीं जिंदा दफन कर देंगे." उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं." उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के सभी स्कूलों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को अनिवार्य करने का ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का विरोध न केवल अनुचित है, बल्कि यह भारत के विभाजन के पीछे एक दुर्भाग्यपूर्ण कारण भी रहा है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब प्रदेश के हर स्कूल में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य रूप से किया जाएगा. योगी आदित्यनाथ ने कहा, "यह वही लोग हैं जो सरदार पटेल की जयंती में शामिल नहीं होते, लेकिन जिन्ना को सम्मान देने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हैं." उन्होंने वंदे मातरम के विरोध को राष्ट्रविरोधी मानसिकता का प्रतीक बताया और कहा कि ऐसे विचारों को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सीएम योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "अगर देश में कोई दोबारा जिन्ना पैदा होने की कोशिश करता है, तो उसे हम यहीं जिंदा दफन कर देंगे." उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं. कांग्रेस के हर अधिवेशन में वंदे मातरम गाया जाता था: योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री ने आरोप लगाते हुए कहा, 'वंदे मातरम के खिलाफ विषवमन हो रहा है. जिस कांग्रेस के अधिवेशन में 1896-97 में स्वयं गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने पूरे वंदे मातरम का गायन किया था और 1896 से लेकर 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन में वंदे मातरम का गायन होता था लेकिन 1923 में जब मोहम्मद अली जौहर कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो वंदे मातरम का गायन शुरू होते ही वह उठकर चले गए. उन्होंने वंदे मातरम गाने से इनकार कर दिया. वंदे मातरम का इस प्रकार का विरोध भारत के विभाजन का दुर्भाग्यपूर्ण कारण बना था.'आदित्यनाथ ने कहा कि कांग्रेस ने अगर उस समय मोहम्मद अली जौहर को अध्यक्ष पद से बेदखल करके वंदे मातरम के माध्यम से भारत की राष्ट्रीयता का सम्मान किया होता तो भारत का विभाजन नहीं होता. उन्होंने दावा किया, 'बाद में कांग्रेस ने वंदे मातरम में संशोधन करने के लिए एक कमेटी बनाई. 1937 में रिपोर्ट आई और कांग्रेस ने कहा कि इसमें कुछ ऐसे शब्द हैं जो भारत माता को दुर्गा के रूप में, लक्ष्मी के रूप में, सरस्वती के रूप में प्रस्तुत करते हैं, इनको संशोधित कर दिया जाए.'  
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विकास बनाम बुर्के की शरारत.. योगी, आदित्यनाथ ने आरजेडी-कांग्रेस पर साधा निशाना

विकास बनाम बुर्के की शरारत.. योगी, आदित्यनाथ ने आरजेडी-कांग्रेस पर साधा निशाना बिहार विधानसभा चुनाव में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस और आरेजडी को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा कि बिहार के विकास को रोकने के लिए आरजेडी और कांग्रेस ने फिर शरारत शुरू कर दी है. बिहार विधानसभा चुनाव में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस और आरेजडी को आड़े हाथों लिया है. सीएम योगी ने कहा कि बिहार के विकास को रोकने के लिए आरजेडी और कांग्रेस ने फिर एक शरारत शुरू की है. विकास बनाम बुर्के की शरारत शुरू की गई है.ऐसा तब है जब बिहार विकास की बात कर रहा है. जब बिहार के नौजवानों के मुंह पर विकास की चर्चा है, तब यहां पर बुर्के को लेकर कांग्रेस और आरजेडी ने नई बहस को आगे बढ़ाया है. मुझे बताइए क्या इनको फर्जी पोलिंग करने का अधिकार देना चाहिए. क्या विदेश घुसपैठियों को बिहार आकर यहां के नागरिकों के अधिकार में डकैती डालने की छूठ देनी चाहिए. आरजेडी और कांग्रेस फर्जी पोलिंग की कोशिश में जुटी है. सीएम योगी ने कहा, 'ये लोग दुष्प्रचार का सहारा ले रहे हैं. दुनिया में कहीं भी जाने पर अपनी पहचान दिखानी पड़ती है. चेहरा दिखाना पड़ता है. लेकिन ये लोग चाहते हैं कि बिना चेहरा और पहचान पत्र देखे, जिसकी मर्जी आए वह वोट डाल दे. इसीलिए यह चाहते हैं कि ईवीएम  मशीन न रहे. ये लोग जबर्दस्ती मतदान कर गरीब के हक पर डाका डालते थे. फिर वही करने की कोशिश की जा रही है.' विकास बनाम बुर्के की शरारत  पटना से सटे दानापुर में चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए योगी ने कहा कि राज्य में अभी विकास बनाम बुर्के की शरारत शुरू की गई है. उन्होंने कहा कि ऐसा तब है जब बिहार विकास की बात कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब बिहार के नौजवानों के मुंह पर विकास की चर्चा है तब यहां पर बुर्के को लेकर कांग्रेस और आरजेडी ने नई बहस को आगे बढ़ाया है. योगी ने पूछा, मुझे बताइए क्या इनको फर्जी पोलिंग करने का अधिकार देना चाहिए. क्या विदेशी घुसपैठियों को बिहार आकर यहां के नागिरकों के अधिकार में डकैती डालने की छूट देनी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि आरजेडी और कांग्रेस फर्जी पोलिंग की कोशिश में जुटी है. कौटिल्य और मौर्य का जिक्र  सीएम योगी ने भाषण की शुरुआत आचार्य कौटिल्य, चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक महान का जिक्र करते हुए कहा. उन्होंने कहा कि ऐसे महाप्रतापी राष्ट्र शिल्पियों को देने वाला हमारा यह राज्य गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की पावन जन्मभूमि के लिए जाना जाता है. गुरु गोविंद सिंह को जब पटना साहिब से बाहर जाना हुआ था, तो पहला पड़ाव दानापुर ही बना था.   
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025: आबादी से अधिक दिया टिकट, नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग की समझिए ABC

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: आबादी से अधिक दिया टिकट, नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग की समझिए ABC बिहार विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में किन सामाजिक समीकरणों का जेडीयू ने रखा है ध्यान. किस वर्ग और जाति की मिले हैं, कितने टिकट, जाने सब कछ इस कहानी में. जेडीयू ने अपने सभी 101 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है. एनडीएन ने हुए सीट बंटवारे में उसे 101 सीटें मिली हैं. जेडीयू ने दो हिस्सों में अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की. उम्मीदवारों के चयन में जेडीयू ने जाति समीकरणों का ध्यान रखा है. आधे से अधिक टिकट उसने पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग को दिए हैं. लेकिन बात जब मुसलमानों को टिकट देने की आई तो नीतीश को पार्टी ने अपने हाथ थोड़े पीछे खींच लिए हैं. जेडीयू ने पिछले चुनाव में 10 मुसलमानों को टिकट दिए थे. लेकिन इस बार केवल चार मुसलमानों को ही टिकट दिए हैं. आइए देखते हैं कि नीतीश की पार्टी ने टिकट वितरण में किस तरह की सोशल इंजीनियरिंग की है.   जेडीयू ने क्या सोशल इंजीनियरिंग की है अगर हम जेडीयू की सूची देखें तो उसके कुल 101 उम्मीदवारों में पिछड़ा वर्ग के 37, अति पिछड़ा वर्ग के 22, सामान्य वर्ग से 22, अनुसूचित जाति के 15, अल्पसंख्यक वर्ग के चार, अनुसूचित जनजाति का एक और 13 महिलाएं शामिल हैं.  जेडीयू ने 101 में से 59 टिकट पिछड़ों और अति पिछड़ों को दिए हैं. साल 2023 में हुए जातिय सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार में पिछड़ा वर्ग की आबादी 27.12 फीसदी और अति पिछड़ा वर्ग की आबादी 36.01 फीसदी है. लेकिन जेडीयू ने पिछड़ा वर्ग के 37 और अति पिछड़ा वर्ग के 22 लोगों को टिकट दिया है. इससे एक बात साफ है कि नीतीश ने टिकट देने में आबादी का ख्याल नहीं रखा है. वहीं पिछड़े वर्ग के लोगों को टिकट देने में नीतीश ने अपने लव-कुश फार्मूले का ख्याल रखा है. उन्होंने पिछड़े वर्ग में दिए 37 में से 33 टिकट तो केवल कुशवाहा, कुर्मी और यादवों को दिए हैं. बाकी के चार टिकट में पिछड़े वर्ग की बाकी की 27 जातियों में से दिए गए हैं. वहीं 112 जातियों वाली अति पिछड़ी जातियों के हिस्से में 22 टिकट आए हैं.  जेडीयू ने दलितों में कैसे बांटी हैं सीटें जेडीयू के हिस्से में अनुसूचित जाति वर्ग की 38 में से 15 सीटें आई हैं. बिहार में अनुसूचित जाति की सूची में 23 जातियां हैं. लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी ने 15 टिकट केवल छह जातियों में बांट दिए हैं. जेडीयू की सूची के मुताबिक जेडीयू ने मुसहर-मांझी को पांच, रविदास (चमार) को पांच, पासी को दो, पासवान (दुसाध) को एक, धोबी को एक और डोम (बसफोर) को एक टिकट दिया है. अनुसूचित जाति के टिकट बांटने में सबसे अधिक टिकट मुसहर और रविदास को दिए हैं. इन दो जातियों को 15 में से 10 टिकट मिले हैं. इसमें सबसे अधिक आबादी रविदास की है. वहीं बिहार में जनसंख्या के मामले की दूसरी सबसे बड़ी जाति पासवान (दुसाध) को केवल एक टिकट मिला है. दुसाध को टिकट देने के मामले में नीतीश कुमार की चिराग पासवान से अदावत का असर देखा जा सकता है.   
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प्रयागराज में कहां है अमिताभ बच्चन का घर, इलाहाबाद में कहां से की पढ़ाई

अमिताभ बच्चन का नाता उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले से है, जिसे पहले इलाहाबाद कहा जाता था. हरिवंशराय बच्चन यहां अपने परिवार के साथ काफी वक्त तक रहे. अमिताभ बच्चन परिवार समेत लंबे समय से मायानगरी मुंबई में रह रहे हैं, लेकिन सबको पता है कि उनका कनेक्शन यूपी से है. छोरा गंगा किनारे वाला यानी अमिताभ बच्चन का जन्म प्रयागराज में हुआ था. वहां आज भी उनका पुश्तैनी बंगला है. प्रयागराज में क्लाइव रोड का 17 नंबर बंगला वो जगह है, जहां अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ था. अमिताभ अपने पिता हरिवंश राय बच्चन के साथ इसी बंगले पर रहा करते थे. सिविल लाइंस के क्लाइव रोड में यह बंगला करीब 10 बीघे में बना था इस बंगले में हरिवंश राय बच्चन परिवार के साथ किराये पर रहते थे. नगर निगम ने ये बंगला महानिर्वाणी अखाड़े को बेचा था और अमिताभ के परिवार समेत  13 किरायेदार थे. इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन का जन्महरिवंश राय बच्चन के साथ अमिताभ बच्चन करीब 9 साल तक यहां इसी घर में रहे. अमिताभ बच्चन के इस घर को 10 द्वार वाला बंगला भी कहा जाता था. वैसे इसका नाम सूर्यभेदी भवन भी था. इसका वास्तुकला इतनी बेहतरीन थी कि प्रत्येक कोने कोने तक सूर्य की रोशनी सीधे पहुंचती थी. इस बंगले में करीब 30 कमरे थे और एक बड़ा सा मैदान भी था.  कमरों और छत के लिए दोनों साइड से शानदार सीढ़ी बनी हुई थी. अब यह बंगला एक ट्रस्ट की निगरानी में है. कटघर इलाके में अमिताभ का पैतृक घरप्रयागराज के कटघर इलाके में भी उनका पैतृक घर था. जमुना क्रिश्चियन इंटर कॉलेज गेट के सामने अमिताभ बच्चन और तेजी बच्चन का ये पैतृक आवास था. इसे बॉलीवुड के महानायक के दादा प्रताप नारायण ने लगभग 120 साल पहले बनवाया था. 60 वर्ग गज बना यह मकान अब जीर्ण शीर्ण स्थिति में है. अमिताभ के पिता हरिवंशराय बच्चन के भांजे रामचंद्र के बेटे अनूप उसी मकान में रहते थे. इसी मकान में हरिवंशराय बच्चन ने अपना चर्चित काव्य मधुशाला की रचना की थी. इलाहाबाद के कॉन्वेट स्कूल से पढ़ाईअमिताभ बच्चन ने अपनी शुरुआती पढ़ाई इलाहाबाद के सबसे पुराने कान्वेंट स्कूल सिविल लाइंस के बॉयज हाईस्कूल से की थी. फिर आगे की पढ़ाई उन्होंने शेरवुड कॉलेज नैनीताल और दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज से की. वो अवधी, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार हैं. उन्होंने 1962 में किरोड़ी मल कॉलेज से बीएससी की. अमिताभ कांग्रेस परिवार में राजीव गांधी और संजय गांधी के दोस्त भी थे. उन्होंने इलाहाबाद से ही हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें हरा दिया. ऑल इंडिया रेडियो में नहीं मिली जॉब अमिताभ ने शुरुआती दौर में ऑल इंडिया रेडियो में न्यूजरीडर की जॉब के लिए आवेदन दिया, लेकिन रिजेक्ट हो गए. फिर वो कोलकाता की एक कंपनी बिजनेस एक्जीक्यूटिव बन गए. लेकिन अभिनय का जुनून उनके अंदर था और उनकी मां का भी इसके पीछे काफी प्रोत्साहन था. उन्होंने 1969 में मृणाल सेन की फिल्म भुवन शोमे में वाइस नैरेशन दिया. सात हिन्दुस्तानी उनकी पहली फिल्म थी, उनका शुरुआती करियर अच्छा नहीं था.बांबे टू गोवा और आनंद के बाद बी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिली, लेकिन प्रकाश मेहरा की जंजीर का रोल जब कई बड़े ऐक्टरों ने ठुकरा दिया तो अमिताभ को ये किरदार मिला और इसने उनका करियर बदल दिया. फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पूर्वजों का नाता प्रतापगढ़ के बाबूपट्टी इलाके सेहरिवंश राय बच्चन के पूर्वज प्रतापगढ़ जिले की रानीगंज तहसील के बाबूपट्टी इलाके से आकर इलाहाबाद में बसे थे. उनकी पत्नी तेजी बच्चन पंजाबी सिख खत्री थीं और पंजाब के लायलपुर इलाके से ताल्लुक रखती थीं, यह इलाका आज पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फैसलाबाद में है.अमिताभ के छोटे भाई अजिताभ उनसे 5 साल छोटे हैं. अमिताभ बच्चन ने 3 जून 1973 को जया भादुड़ी से शादी की थी. इंकलाब नाम रखना चाहता था परिवारब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन के दौर में मां-बाप पहले उनका नाम इंकलाब रखने वाले थे. लेकिन तब के मशहूर कवि सुमित्रानंदन पंत के सुझाव पर उनका नाम अमिताभ रखा गया. कायस्थ परिवार से ताल्लुक रखने वाले हरिवंशराय बच्चन जातिगत व्यवस्था के खिलाफ थे. उनकी हर साहित्यिक रचना में श्रीवास्तव की जगह बच्चन नाम का इस्तेमाल किया और यही सरनेम अमिताभ को भी मिला. हरिवंशराय बच्चन का निधन 2003 में और तेजी बच्चन का देहावसान 2007 में हुआ.
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बिहार की जनता से किए वादे और उनकी उम्मीदों पर कितने खरे उतरेंगे पीके की पार्टी के उम्मीदवार

प्रशांत किशोर ने नया बिहार बनाने का संकल्प लिया है. उनकी उम्मीदवारों की लिस्ट भी उनके इसी संकल्प से मेल खाती है. उन्होंने सबसे पहले प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है. भारतीय राजनीति के विशाल ताने-बाने में बहुत कम लोग ही सियासी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर जैसी महत्वाकांक्षा और जमीनी हकीकत की जटिलता को इतनी साफगोई सामने रखते हैं. इतिहास, संस्कृति और अनगिनत सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों से भरे बिहार की उनकी हालिया यात्रा न केवल उनकी चुनावी सफलता के लक्ष्य को सामने रखती है, बल्कि बिहार की जनता की आशाओं और सपनों के साथ उनके गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती है.जनसुराज पार्टी का गठन 2 अक्टूबर 2024 को हो गया था, लेकिन वो पहली पार्टी है, जिसने बिहार में अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. जबकि अन्य दल अभी भी सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे को लेकर उलझे हुए हैं. जन सुराज ने 9 अक्टूबर को 26 जिलों के 51 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. पीके ने अपनी यात्रा के दौरान जो वादे किए हैं, उसने दूसरे दलों को इस पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है और यह भी कि क्या उनके वादे अब मतदाताओं के सामने मौजूद विकल्पों के अनुरूप हैं या नहीं.  प्रशिक्षण से रणनीतिकार और स्वभाव से दूरदर्शी पीके ने अपनी दो साल लंबी यात्रा कई प्रतिबद्धताओं के साथ शुरू की थी. इस यात्रा ने बिहार में लंबे समय से राजनीतिक जड़ता के बोझ तले दबे लोगों की आकांक्षाओं से खुद को जोड़ा. उन्होंने सुशासन और पारदर्शिता से लेकर सामाजिक न्याय और युवा सशक्तीकरण तक के वादे किए. उन्होंने बिहार के पुनरुद्धार की बात जोरदार तरीके से की.एक ऐसा राज्य जो अभी अक्सर खुद को दूसरे संपन्न राज्यों के पीछे पाता है. उनके अभियान का मूल विचार इस विचार में निहित था कि बिहार और अधिक का हकदार है, ज्यादा सुर्खियों का, अधिक संसाधन और अधिक अवसरों का. ऐसे बेहतर नेता सामने आएं जो वंशवादी न हों, अपराधी या बाहुबली न हों, राजनीतिक गिरगिट की तरह बार-बार अपनी पार्टी न बदलते रहें और न ही वो भ्रष्ट राजनेता जो अपने निजी हितों के लिए जनता का पैसा लूटते हों. आगामी विधानसभा चुनावों के लिए उनके उम्मीदवारों की सूची का विश्लेषण किया जाए तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि उनका चयन प्रशांत किशोर की यात्रा के दौरान बुने गए उनके नैरेटिव से कितना मेल खाता है. उस सूची का हर नाम सिर्फ एक राजनीतिक विकल्प नहीं है; यह उन आदर्शों का आईना है, जिन्हें पीके ने अपनी यात्राओं के दौरान सामने रखा था. क्या ये उम्मीदवार उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें मजबूत बनाने का संकल्प पीके ने लिया था? क्या वे उस सामाजिक न्याय का प्रतीक हैं, जिसे कायम करने का उन्होंने वादा किया था? क्या वे मजबूत क्षमता वाले और विश्वसनीय नेता हैं? क्या पीके के चयन में उम्मीदवारों की सामाजिक विविधता और समावेशी झलक मिलती है. उनके उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि जैसे जाति या धर्म की बात करें तो क्या ये बिहार की जनसंख्या के अनुपात को दिखाता है? 51 उम्मीदवारों की सूची की सामाजिक विविधता काबिलेगौर है. इस सूची में 17 अत्यंत पिछड़ा वर्ग, 11 अन्य पिछड़ा वर्ग, 7 मुस्लिम, 7 अनुसूचित जाति (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से) और 9 सामान्य वर्ग से शामिल हैं. बिहार जाति जनगणना सर्वेक्षण 2023 के अनुसार बिहार में ईबीसी का अनुपात सबसे अधिक 36 प्रतिशत और ओबीसी का 27.12 प्रतिशत है. इन दोनों श्रेणियों के सबसे अधिक उम्मीदवार हैं. 17.7 प्रतिशत मुस्लिमों आबादी के हिसाब से 7 उम्मीदवार हैं. सामान्य वर्ग की जनसंख्या 15.52 प्रतिशत है और उन्हें 9 सीटें आवंटित की गई हैं. महिला उम्मीदवारों की संख्या बहुत कम है. हालांकि उम्मीदवारों की पूरी सूची घोषित होने के बाद ये अनुपात बदल सकता  है. अतीत में पीके ने तर्क दिया था कि कुछ हजार परिवारों ने बिहार की पूरी राजनीति पर कब्जा कर रखा है. या तो वे राजनीतिक वंशवादी हैं, माफिया (बाहुबली) हैं, या बस ऐसे व्यक्ति हैं, जो एक राजनीतिक दल से दूसरे राजनीतिक दल में जाते रहते हैं, यानी बिहार की राजनीति के पलटू राम या आया गया राम. पीके के अनुसार, या तो वो जोकि बहुत भ्रष्ट हैं, घोटालेबाज हैं और जिन पर कई आरोप लगे हैं या तो आपराधिक प्रकृति के लोग हैं. इसलिए जोर एक वास्तविक विकल्प पर है, जो सुशासन प्रदान करेगा. लिहाजा उनकी लिस्ट में ऐसा कोई भी उम्मीदवार शामिल नहीं होना चाहिए जो या तो किसी राजनीतिक खानदान से हो या पहले किसी अन्य राजनीतिक दल से आया हो या जिसका आपराधिक रिकॉर्ड हो. नतीजतन, उनके लगभग सभी 51 उम्मीदवार नए चेहरे हैं. डॉक्टर, ईमानदार पुलिस अधिकारी, ईमानदार नौकरशाह, शिक्षाविद, वकील, एक गायक, एक ट्रांसजेंडर और पेशेवर लोग इसमें शामिल हैं. किसी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, कोई भी पार्टी बदलने वाला नहीं है, कोई भी राजनीतिक खानदान से ताल्लुक नहीं रखता है. हालांकि कर्पूरी ठाकुर की पोती जागृति ठाकुर समस्तीपुर के मोरवा से चुनाव लड़ेंगी. शायद राजनीतिक वंशवाद का एकमात्र अपवाद जननायक और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पोती जागृति ठाकुर ही हैं. कर्पूरी ठाकुर हज्जाम (नाई) जाति से थे और उन्होंने 1978 से 1980 के बीच अपने शासन के दौरान पिछड़े वर्गों खासकर अत्यंत पिछड़े (36 फीसदी EBC) के लिए पहली बार आरक्षण शुरू किया था.  पीके ने बताया कि जागृति नाम शामिल होने का एक कारण सामान्य तौर पर महिला उम्मीदवारों की कमी था. साथ ही उनका सार्वजनिक सेवा का एक असाधारण रिकॉर्ड रहा है. 1989 के भागलपुर दंगों पर काबू पाने वाले तत्कालीन एसपी आर के मिश्रा दरभंगा से उम्मीदवार हैं. आर के मिश्रा 1986 बैच के बेहतरीन पूर्व आईपीएस अधिकारी रहे हैं, जिन्हें 1989 में दो महीने से ज्यादा समय तक चले भागलपुर सांप्रदायिक दंगों के दौरान जिले का पुलिस अधीक्षक बनाया गया था. एनडीटीवी के साथ अपने पहले साक्षात्कार में मिश्रा ने दरभंगा शहर की मुख्य समस्याओं का जिक्र किया. इसमें  लगातार बाढ़ और सड़कों पर जलभराव, भयानक ट्रैफिक जाम के साथ पब्लिक पार्किंग और जनहित की सुविधाओं की कमी का उन्होंने उल्लेख किया था. इस ऐतिहासिक शहर में पहले दरभंगा राज के आधा दर्जन भव्य महल थे और आज यहां ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का परिसर है. आरके मिश्रा ने वादा किया है कि अगर वह चुने जाते हैं, तो जलभराव खत्म करने, ट्रैफिक जाम खत्म करने और कारों और अन्य वाहनों के लिए पार्किंग स्थल बनाने का गंभीर प्रयास करेंगे. लिस्ट में एक और बड़ा नाम 2000 बैच के आईपीएस अधिकारी जय प्रकाश सिंह का भी है. उन्होंने एडीजीपी (सीआईडी) के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है. उन्हें छपरा से मैदान में उतारा गया है. जन सुराज पार्टी की सूची में प्रसिद्ध गणितज्ञ केसी सिन्हा का नाम शामिल है, जो पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भी रह चुके हैं. सूची के अन्य नामों में ईमानदार नौकरशाह और उच्च सम्मानित शिक्षाविद शामिल हैं. ये पार्टी की रणनीति को दिखाता है कि कैसे वो पारंपरिक पार्टियों से अलग है. पारंपारिक दल जो जाति, धर्म और वंशवाद पर टिके हुए हैं. जन सुराज ने योग्यता, जन कल्याण और सुशासन पर जोर दिया है. पार्टी ने जाति, धर्म और वंशवाद के बजाय काम करने की क्षमता और ईमानदारी पर केंद्रित पॉलिटिकल नैरेटिव का संकेत दिया है.  डॉक्टरों की सूची में सात नाम हैं. मुजफ्फरपुर से डॉक्टर अमित कुमार दास, गोपालगंज से डॉक्टर शशि शेखर सिन्हा, ढाका विधानसभा सीट से डॉक्टर लाल बाबू प्रसाद, वाल्मिकी नगर से डॉक्टर नारायण प्रसाद, इमामगंज से डॉक्टर अजीत कुमार, मटिहानी से डॉक्टर अरुण कुमार और भोजपुर से और डॉ. विजय कुमार गुप्ता का नाम है. पटना मेडिकल कॉलेज एंड हास्पिटल के पूर्व छात्र डॉ. अमित कुमार दास ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपने काम के लिए जाने जाते हैं. दास और उनकी डॉक्टर पत्नी मुजफ्फरपुर में एक अस्पताल चलाते हैं और उन्हें स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में जमीनी बदलाव लाने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. इस सूची में एक और प्रमुख नाम पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वाईबी गिरि का है. गिरि भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और बिहार के एडिशनल एडवोकेट जनरल रह चुके हैं. गिरि मांझी से चुनाव लड़ रहे हैं और जन सुराज पार्टी के प्रवक्ता रह चुके हैं. ट्रांसजेंडर और सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति किन्नर गोपालगंज की भोरे सीट से चुनाव लड़ेंगी. उन्होंने दलितों के लिए खूब काम किया है और उन्होंने पीके को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया है. बिहार की सामाजिक जातीय और सामुदायिक विविधता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जहां जाति, वर्ग और समुदाय जटिल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. पीके की लिस्ट में उम्मीदवारों को इसी विविधता को पेश करते हुए प्रतिनिधित्व का ऐसा मिश्रण प्रस्तुत करना चाहिए जो बिहारी नागरिकों के तमाम अनुभवों को दिखाती हो. अपने भाषणों में प्रशांत किशोर ने समावेशी राजनीति और एक ऐसे राजनीतिक माहौल को जमीन पर उतारने पर जोर दिया है, जो बिहार की बहुआयामी पहचान का आईना बने. लिहाजा चुनौती केवल इन उम्मीदवारों की योग्यता में ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से जुड़ने और हाशिए पर खड़े लोगों की आशाओं और युवाओं की आकांक्षाओं को साकार करने की क्षमता में भी निहित है. इसके अलावा प्रशांत किशोर का प्रचार अभियान नया बिहार की मुखर आवाज की एक आपात जरूरत की भावना से भरा रहा है. उम्मीदवारों की सूची में यही भावना दिखनी चाहिए और केवल बयानबाजी के बजाय लागू हो सकने वाले बदलाव के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करनी चाहिए. मतदाता तेजी से समझदार हो रहे हैं; वे केवल वादे नहीं, बल्कि ठोस योजनाओं और ऐसे भरोसेमंद नेता चाहते हैं, जो उन वादों को पूरा कर सकें. इस मायने में प्रशांत किशोर के पहले किए वादों के साथ उम्मीदवारों का तालमेल उनके विजन के लिए लिटमस टेस्ट बन गया है. चुने गए उम्मीदवारों पर विचार करें तो इन विकल्पों के व्यापक प्रभावों पर भी विचार करना जरूरी हो जाता है. क्या ये प्रत्याशी बिहार जैसे राज्य में समर्थन जुटा पाएंगे, जहां राजनीतिक निष्ठा रेत की तरह बदलती रहती हैं? क्या वे बिहार के राजनीतिक इकोसिस्टम के जटिल ढांचे को समझने के योग्य हैं, जहां लंबे समय से विरासत और समकालीन चुनौतियां आपस में गुंथी हुई हैं? सबसे बड़ी बात है कि क्या वे चुनाव जीत सकते हैं? निष्कर्ष के तौर पर प्रशांत किशोर की यात्रा महज एक राजनीतिक अभियान नहीं थी; यह बिहार की आत्मा को छूने वाली यात्रा थी और इसकी संभावनाओं और कमियों की तलाश थी. 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए उन्होंने जिन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, वे उनकी सोच को आगे ले जाने वाले और उनके वादों के संरक्षक होंगे. मतदाता जब वोट डालने की तैयारी कर रहे हैं तो वे इस बात पर गहरी नजर रखेंगे कि क्या उन वादों का सम्मान किया गया है और क्या किशोर का 'नए बिहार' का विजन उनके चयनित उम्मीदवारों के जरिये साकार किया जा सकता है. आखिरकार यह सिर्फ राजनीतिक रणनीति का मामला नहीं है, बल्कि उस उम्मीद, लचीलेपन और अटूट भरोसे का मामला है कि बिहार का एक बेहतर भविष्य संभव है.
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बिहार महागठबंधन में बनी बात, आ गया सीट शेयरिंग फॉर्मूला!, RJD-कांग्रेस के पास कितनी सीटें

सीमांचल की एक-दो सीटों को लेकर भी कांग्रेस और आरजेडी में उलझन है. आरजेडी के रवैए से कांग्रेस असहज है, लेकिन उसके पास कोई और विकल्प नहीं है. बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज है. इंडिया गठबंधन में भी अब तक सीटों पर मुहर नहीं लगी थी. लेकिन अब सभी दलों के बीच सीट बंटवारे पर सहमति बन गई है. सूत्रों के मुताबिक अंतिम चरण की बातचीत का फॉर्मूला तय हो गया है. आरजेडी, कांग्रेस समेत अन्य दलों के खाते में कितनी सीटें आएंगी, ये तय हो गया है. महागठबंधन सीट शेयरिंग फॉर्मूला- सूत्र RJD : 134-35 INC : 54-55 CPI ML : 21-22 CPI : 6 CPI : 4 VIP : 15-16 JMM, RLJP, IIP को मिलाकर : 6-7 ·        तेजस्वी हो सकते हैं महागठबंधन के सीएम फेस महागठबंधन तेजस्वी को सीएम उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही तीन उप मुख्यमंत्रियों का ऐलान भी कर सकता है. शनिवार रात इस पर आपसी सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी. अगर बात बनी तो रविवार सुबह वरना मंगलवार को इसका आधिकारिक ऐलान किया जा सकता है. महागठबंधन में  95% सीटों पर बनी बात- सूत्र महागठबंधन में करीब एक दर्जन सीटों को छोड़कर 95% सीटों पर बात बन गई है. संख्या से ज़्यादा सीटों की अदलाबदली पर पेंच फंसा हुआ है.  कांग्रेस की सीट पर आरजेडी ने दावा किया है. वहीं बदले में  बिस्फी सीट मांगी है, जो आरजेडी की सीट है.  इन सीटों पर RJD-कांग्रेस और माले का दावा कांग्रेस की परंपरागत सीट कहलगांव (भागलपुर) पर आरजेडी अपना दावा कर रही है. वहीं कांग्रेस की बेनीपट्टी (मधुबनी) सीट पर माले ने दावा किया है. बाराचट्टी (गया) आरजेडी की सीट है, लेकिन माले जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष धनंजय को यहां से लड़वाना चाहती है.   माले अपने कोटे की औराई–गायघाट (मुजफ्फरपुर) सीट को छोड़ना चाहती है, लेकिन इसपर कांग्रेस और वीआईपी दोनों का दावा है. वह इसके बदले माले गायाघाट सीट चाहती है, जहां से आरजेडी के विधायक हैं. सीमांचल की एक-दो सीटों को लेकर भी कांग्रेस और आरजेडी में उलझन है. आरजेडी के रवैए से कांग्रेस असहज है, लेकिन उसके पास कोई और विकल्प नहीं है.    
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ग्रेटर नोएडा के गुर्जर गांव की शेरी सिंह कौन हैं, जिन्होंने फिलीपींस में जीता मिसेज यूनिवर्स 2025 का खिताब

ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के छोटे से गांव मकौड़ा की रहने वाली गुर्जर समाज की बेटी शेरी सिंह ने मिसेज यूनिवर्स 2025 का प्रतिष्ठित खिताब जीतकर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है. ब्यूटी कॉन्टेस्ट के इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर भारत ने वह इतिहास रच दिया है, जिसका इंतजार देश वर्षों से कर रहा था. उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के छोटे से गांव मकौड़ा की रहने वाली गुर्जर समाज की बेटी शेरी सिंह ने मिसेज यूनिवर्स 2025 का प्रतिष्ठित खिताब जीतकर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है. यह जीत सिर्फ एक ताज नहीं, बल्कि भारतीय विवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और दृढ़ता का वैश्विक ऐलान है. मकौड़ा से मनीला तक का स्वर्णिम सफर फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित हुई मिसेज यूनिवर्स 2025 की भव्य प्रतियोगिता में दुनिया भर के 122 से अधिक देशों की प्रभावशाली महिलाओं ने भाग लिया था. इन सभी को पीछे छोड़ते हुए, शेरी सिंह ने अपनी बुद्धिमत्ता, शालीनता और आत्मविश्वास के दम पर यह ऐतिहासिक ताज अपने नाम किया. सबसे खास बात यह है कि मिसेज यूनिवर्स का खिताब जीतने वाली शेरी सिंह पहली भारतीय महिला हैं.  शेरी सिंह ने अपनी जीत के बाद महिला सशक्तिकरण और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के अपने मजबूत संदेश से जजों का दिल जीत लिया. उनकी यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि यह हर उस भारतीय विवाहित महिला के लिए प्रेरणा है, जिसने अपने सपनों को सीमाओं से परे देखने का साहस किया है. दबंग राजनीतिक विरासत की बेटी शेरी सिंह का संबंध ग्रेटर नोएडा के मकौड़ा गांव के एक प्रतिष्ठित गुर्जर परिवार से है, जिसकी दबंग राजनीतिक विरासत रही है. उनके दादा, स्वर्गीय महेंद्र सिंह भाटी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक कद्दावर नेता थे और दादरी विधानसभा से विधायक भी रह चुके थे. उनके पिता, समीर भाटी, भी उत्तर प्रदेश की दादरी विधानसभा सीट से पूर्व विधायक रह चुके हैं. इस राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाली शेरी सिंह ने सौंदर्य के मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाकर न सिर्फ़ अपने परिवार, बल्कि पूरे गुर्जर समाज और उत्तर प्रदेश को विश्व मानचित्र पर गौरव दिलाया है. जश्न में देश और समाज शेरी सिंह के मिसेज यूनिवर्स चुने जाने की खबर आते ही पूरे देश में और खासकर ग्रेटर नोएडा व गुर्जर समाज में खुशी की लहर दौड़ गई है। देश भर के भारतीयों ने अपनी 'बहू' और 'बेटी' की इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जाहिर की है. यह जीत दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प और आत्म-विश्वास से ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाएं भी वैश्विक स्तर पर बड़े से बड़े मुकाम हासिल कर सकती हैं. शेरी सिंह का यह ऐतिहासिक कदम आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं को प्रेरित करेगा कि वे विवाह और मातृत्व के साथ भी अपने सपनों को उड़ान दे सकती हैं और दुनिया को दिखा सकती हैं कि सच्ची सुंदरता ताकत, दया और अदम्य साहस में निहित होती है.
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अलीनगर से BJP विधायक मिश्रीलाल यादव ने पार्टी से दिया इस्तीफा

बिहार के अलीनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक मिश्रीलाल यादव ने बीजेपी से इस्‍तीफा देते हुए कहा कि बीजेपी हमेशा से गरीबों, दलितों और पिछड़ों की विरोधी रही है और उनके हितों के लिए कभी काम नहीं किया. भारतीय जनता पार्टी के दरभंगा जिले के अलीनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक मिश्रीलाल यादव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया और पार्टी पर तीखा हमला बोला है. मिश्रीलाल यादव ने कहा कि उनके लिए अब बीजेपी में बने रहना संभव नहीं है, क्योंकि पार्टी में गरीबों और पिछड़ों का कोई सम्मान नहीं है.   मिश्रीलाल यादव ने पार्टी से इस्‍तीफा देते हुए कहा कि बीजेपी हमेशा से गरीबों, दलितों और पिछड़ों की विरोधी रही है और उनके हितों के लिए कभी काम नहीं किया. इसलिए अब मैं पार्टी में नहीं रहना चाहता हूं.    मिश्रीलाल यादव ने कहा कि अलीनगर में एनडीए पहली बार उनके कारण चुनाव जीता और वे एक संघर्षशील यादव परिवार से आते हैं. उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत मुखिया चुनाव जीतकर राजनीति की शुरुआत की और दरभंगा से दो बार एमएलसी रहने के बाद वर्तमान में अलीनगर से विधायक हैं.  यादव ने कहा कि वे हमेशा गरीबों के मान-सम्मान की रक्षा करते रहे हैं और खुद को एक समाजवादी और सेक्युलर विचारधारा वाला व्यक्ति मानते हैं.
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