IDFC बैंक फ्रॉड मामले में हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ पुलिस से पूछा—CBI जांच के बाद किस अधिकार से जारी किए पत्र?

फ्रीज खातों को रिलीज करने संबंधी बैंक पत्राचार पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जताई नाराज़गी

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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कथित बहु-करोड़ IDFC फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी मामले में चंडीगढ़ पुलिस से सवाल किया कि जब जांच CBI को सौंप दी गई थी, तब पुलिस किस अधिकार से बैंकों को फ्रीज खातों को रिलीज करने संबंधी पत्र भेज रही थी। अदालत ने UT प्रशासन से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है।

 

Punjab and Haryana High Court ने सोमवार को कथित बहु-करोड़ IDFC First Bank धोखाधड़ी मामले में चंडीगढ़ पुलिस से सवाल किया कि जांच Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंपे जाने के बाद भी वह बैंकों को फ्रीज खातों को रिलीज करने के लिए पत्र क्यों भेज रही थी।

पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि जब 27 अप्रैल को जांच CBI को स्थानांतरित हो चुकी थी, तब यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि चंडीगढ़ पुलिस या यूटी प्रशासन किस अधिकार के तहत फ्रीज खातों के संबंध में पत्राचार जारी रखे हुए थे।

यह मामला एक याचिका की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता Randeep Rai ने दलील दी कि FIRs को CBI को ट्रांसफर किए जाने और केंद्रीय एजेंसी द्वारा RC दर्ज करने के बावजूद चंडीगढ़ पुलिस “अत्यधिक उत्साह” में बैंकों को उन खातों से लगी रोक हटाने के लिए पत्र लिख रही है, जिनके माध्यम से कथित रूप से धन का गबन किया गया था।

राय ने अधिवक्ता रुबीना विरमानी के साथ बैंक की ओर से अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय पहले ही चंडीगढ़ पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज संबंधित FIRs को CBI को सौंपने के लिए “नो ऑब्जेक्शन” दे चुका है। उन्होंने 27 अप्रैल को CBI निदेशक को भेजे गए उस पत्र का उल्लेख किया, जिसमें IDFC फर्स्ट बैंक की सेक्टर-32 शाखा से जुड़े कथित वित्तीय धोखाधड़ी मामलों को ट्रांसफर करने की बात कही गई थी।

राय ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद 2 मई और 8 मई को चंडीगढ़ पुलिस द्वारा बैंकों को पत्र भेजे गए। उनका कहना था कि जांच CBI को ट्रांसफर होने के बाद स्थानीय पुलिस का मामले पर नियंत्रण समाप्त हो चुका था, फिर भी वह फ्रीज खातों को रिलीज करने का दबाव बना रही थी।

उन्होंने अदालत में कहा, “वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ट्रांसफर प्रक्रिया के दौरान ये रोक आदेश कहीं गायब हो जाएं।” उन्होंने बताया कि इस मामले में लगभग 50 से 70 खाते शामिल हैं और कथित धोखाधड़ी में करीब 700 करोड़ रुपये की बैंक राशि शामिल है।

हाईकोर्ट ने बार-बार यूटी प्रशासन से पूछा कि इन पत्रों को जारी करने का कानूनी आधार क्या था। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा, “अब यह जांच CBI को ट्रांसफर हो चुकी है और CBI ही जांच कर रही है।”

चंडीगढ़ पुलिस द्वारा पत्राचार जारी रखने पर अदालत ने आगे टिप्पणी की, “ट्रांसफर के बाद यूटी प्रशासन के पास यह पत्र जारी करने का कौन-सा अधिकार था?”

पीठ ने यूटी प्रशासन के वकील को निर्देश दिया कि वह विशेष रूप से 2 मई और 8 मई के पत्रों के संबंध में निर्देश प्राप्त करें, खासकर 27 अप्रैल के ट्रांसफर आदेश के संदर्भ में।

सुनवाई के दौरान रंदीप राय ने साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल अरेस्ट घोटालों से जुड़े स्वतः संज्ञान मामलों में Supreme Court of India द्वारा हाल ही में दिए गए निर्देशों का भी हवाला दिया।

उन्होंने दिसंबर 2025 में तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए आदेश का उल्लेख किया, जिसमें साइबर अपराध से जुड़े धन को FIR दर्ज किए बिना भी फ्रीज करने की अनुमति दी गई थी। साथ ही उन्होंने फरवरी 2026 में गृह मंत्रालय द्वारा तैयार देशव्यापी SOP को मंजूरी मिलने के बाद जारी निर्देशों का भी हवाला दिया, जिनमें साइबर धोखाधड़ी शिकायतों से निपटने, संदिग्ध लेन-देन फ्रीज करने और पीड़ितों की राशि वापस दिलाने की प्रक्रिया शामिल है।Screenshot_1222

Edited By: Karan Singh

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