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एक आंख, सुनने-बोलने में असमर्थ... फिर भी नहीं मानी हार, हरियाणा के अमन जिनागल ने शूटिंग में रचा प्रेरणादायक इतिहास
झज्जर के युवा निशानेबाज ने कठिन शारीरिक चुनौतियों के बावजूद जीते 15 पदक, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने का सपना
हरियाणा के झज्जर जिले के अमन जिनागल की कहानी साहस, संघर्ष और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। जन्म से कई शारीरिक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने पिस्टल शूटिंग में 15 पदक जीतकर अपनी अलग पहचान बनाई और अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
संघर्ष से सफलता तक: अमन जिनागल की प्रेरणादायक यात्रा
हरियाणा के झज्जर जिले के गोरिया गांव के रहने वाले अमन जिनागल ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने शारीरिक चुनौतियां भी छोटी पड़ जाती हैं। जन्म से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करने वाले अमन आज पिस्टल शूटिंग में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं।
कड़ी मेहनत और परिवार के निरंतर सहयोग से उन्होंने अब तक 15 पदक अपने नाम किए हैं और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है।
जन्म से ही कई गंभीर शारीरिक चुनौतियों का सामना
अमन का जन्म वर्ष 2003 में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) और ग्लूकोमा जैसी आंखों की गंभीर समस्याओं के साथ हुआ था।महज दो वर्ष की उम्र तक उनकी चार सर्जरी करनी पड़ीं। डॉक्टरों को उनकी एक आंख निकालनी पड़ी ताकि दूसरी आंख की रोशनी बचाई जा सके।
इसके बाद तीन वर्ष की उम्र में यह भी पता चला कि अमन सुन और बोल भी नहीं सकते।
माता-पिता ने नहीं छोड़ा हौसला
इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद अमन के पिता करणपाल और माता हेमलता ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी।
उन्होंने हर चुनौती का सामना करते हुए अमन की शिक्षा, देखभाल और बेहतर भविष्य के लिए लगातार प्रयास किए। परिवार का यही विश्वास आगे चलकर अमन की सफलता की सबसे बड़ी ताकत बना।
शूटिंग अकादमी से बदली जिंदगी
जब अमन 19 वर्ष के हुए तो उनके माता-पिता उन्हें रेवाड़ी स्थित एक शूटिंग अकादमी लेकर गए।
हेमलता के अनुसार, हरियाणा के खिलाड़ियों की ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता से प्रेरित होकर उनकी बेटी प्रिया शूटिंग सीखना चाहती थीं। इसी दौरान अमन का भी अकादमी में दाखिला कराया गया।
कुछ ही दिनों के प्रशिक्षण के बाद अमन की शूटिंग में गहरी रुचि विकसित हो गई और उन्होंने पूरे समर्पण के साथ अभ्यास शुरू कर दिया।
15 पदक जीतकर बनाई नई पहचान
अमन के कोच रमन राव के अनुसार, गंभीर शारीरिक चुनौतियों के बावजूद अमन ने अब तक 15 पदक जीते हैं।
उन्होंने राज्य स्तरीय शूटिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक हासिल किया, राष्ट्रीय स्तर तक अपनी जगह बनाई और इंटरनेशनल डेफलंपिक्स के चयन ट्रायल के लिए भी क्वालिफाई किया।
कोच का कहना है कि अमन की मेहनत, अनुशासन और खेल के प्रति समर्पण असाधारण है।
दृढ़ इच्छाशक्ति बनी सबसे बड़ी ताकत
अमन जिनागल की उपलब्धियां यह दिखाती हैं कि यदि परिवार का साथ, सही मार्गदर्शन और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता हासिल की जा सकती है।
उनकी कहानी आज युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
Key Highlights
- झज्जर के अमन जिनागल ने कठिन शारीरिक चुनौतियों के बावजूद शूटिंग में बनाई पहचान।
- जन्म से आंखों की गंभीर बीमारी और सुनने-बोलने में असमर्थ।
- बचपन में चार सर्जरी, एक आंख निकालनी पड़ी।
- 19 वर्ष की उम्र में शुरू की पिस्टल शूटिंग।
- अब तक जीत चुके हैं 15 पदक।
- राज्य स्तर पर कांस्य पदक और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व।
- इंटरनेशनल डेफलंपिक्स चयन ट्रायल के लिए भी हुए क्वालिफाई।
FAQ Section
Q1. अमन जिनागल कौन हैं?
उत्तर: अमन जिनागल हरियाणा के झज्जर जिले के युवा पिस्टल शूटर हैं, जिन्होंने गंभीर शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेल में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
Q2. अमन को बचपन में किन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा?
उत्तर: उनका जन्म मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के साथ हुआ था। बचपन में कई सर्जरी हुईं और उनकी एक आंख निकालनी पड़ी। बाद में पता चला कि वे सुन और बोल भी नहीं सकते।
Q3. अमन ने शूटिंग कब शुरू की?
उत्तर: उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में रेवाड़ी की एक शूटिंग अकादमी में प्रशिक्षण शुरू किया।
Q4. अमन ने अब तक कितनी उपलब्धियां हासिल की हैं?
उत्तर: उन्होंने 15 पदक जीते हैं, राज्य स्तर पर कांस्य पदक हासिल किया है और इंटरनेशनल डेफलंपिक्स चयन ट्रायल के लिए भी क्वालिफाई किया है।
Q5. अमन की सफलता में किसका सबसे बड़ा योगदान रहा?
उत्तर: उनके माता-पिता का निरंतर सहयोग, कोच का मार्गदर्शन और उनकी अपनी मेहनत एवं दृढ़ संकल्प उनकी सफलता की प्रमुख वजह रहे हैं।
Conclusion
अमन जिनागल की कहानी केवल खेल उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साहस, संघर्ष और अटूट आत्मविश्वास का प्रेरणादायक उदाहरण भी है। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से यह साबित किया कि सफलता परिस्थितियों से नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयासों से हासिल होती है। उनकी यात्रा आने वाली पीढ़ियों और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

