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तेजा सिंह समुंदरी को श्रद्धांजलि, पुस्तक विमोचन में याद की गई उनकी विरासत
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में कार्यक्रम, त्याग और सिद्धांतों पर आधारित जीवन को किया गया याद
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में अकाली नेता तेजा सिंह समुंदरी को उनकी अडिग प्रतिबद्धता और बलिदान के लिए याद किया गया। इस अवसर पर उनके जीवन और योगदान पर आधारित पुस्तक का विमोचन किया गया।
अकाली नेता Teja Singh Samundri को हाल ही में Guru Nanak Dev University में आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान श्रद्धांजलि दी गई। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया गया, जिन्होंने समझौता करने के बजाय मृत्यु को स्वीकार किया।
समुंदरी ने ब्रिटिश शासन के दौरान सशर्त रिहाई को ठुकरा दिया था और 1926 में 43 वर्ष की आयु में लाहौर सेंट्रल जेल में उनका निधन हो गया। उनका यह साहसिक निर्णय आज भी इतिहास में अमिट छाप के रूप में दर्ज है।

यह पुस्तक Piar Singh द्वारा लिखी गई है और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद विश्वविद्यालय के कुलपति Karamjeet Singh ने किया है। यह पुस्तक समुंदरी के जीवन, उनके विचारों और उनके संघर्षों को विस्तार से प्रस्तुत करती है।
तेजा सिंह समुंदरी को एक विद्वान और विचारक के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। उन्होंने Gurdwara Reform Movement में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सिख पहचान तथा सामुदायिक प्रबंधन के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया।
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि समुंदरी की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने युवाओं को ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से परिचित कराने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिन्होंने सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
उन्होंने ‘संगत’ और ‘पंगत’ जैसी भारतीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ये समानता और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक हैं, जहां अमीर-गरीब या ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं होता।
अपने दादा को श्रद्धांजलि देते हुए तरनजीत सिंह संधू ने इस आयोजन को केवल एक ऐतिहासिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मूल्यों की विरासत पर गहन चिंतन बताया। उन्होंने गुरु का बाग और कीज़ मोर्चा जैसे आंदोलनों की याद दिलाई, जिनकी अहिंसक और अनुशासित प्रकृति की प्रशंसा Mahatma Gandhi जैसे नेताओं ने भी की थी।
उन्होंने कहा कि संस्था निर्माण की विरासत आज भी प्रासंगिक है और बदलती दुनिया में ईमानदारी, जवाबदेही और निःस्वार्थ सेवा के मूल्यों को आगे बढ़ाना जरूरी है।
कुलपति करमजीत सिंह ने इस पुस्तक को एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक योगदान बताया, जो अब अंग्रेज़ी अनुवाद के माध्यम से अधिक व्यापक पाठकों तक पहुंच सकेगी।

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