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पाकिस्तान के लय्याह से पानीपत तक पहुंची 85 साल पुरानी परंपरा, 10 हजार युवा निभा रहे ‘हनुमान स्वरूप’ की तपस्या
विभाजन के बाद पानीपत की पहचान बनी ‘हनुमान स्वरूप’ परंपरा, 3,500 से अधिक हनुमान सभाएं दशहरा समितियों से जुड़ीं
पानीपत में ‘हनुमान स्वरूप’ की 85 साल पुरानी परंपरा आज भी पूरी आस्था और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है। हजारों युवा 40 दिन तक तपस्या करते हैं और दशहरे से पहले नगर भ्रमण निकालते हैं।
त्योहारों का मौसम शुरू होते ही पानीपत में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। यहां दशहरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि विभाजन के बाद पाकिस्तान के लय्याह जिले से पानीपत तक पहुंची करीब 85 साल पुरानी परंपरा का भी प्रतीक है।
‘हनुमान स्वरूप’ की यह परंपरा अब पानीपत की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। कभी यहां केवल दो-तीन हनुमान स्वरूपों से शुरू हुई यह परंपरा आज इतनी व्यापक हो गई है कि करीब 10 हजार युवा इससे सीधे जुड़े हुए हैं। वहीं, 3,500 से अधिक हनुमान सभाएं दशहरा आयोजन समितियों से जुड़ी हुई हैं।
40 दिन तक तपस्या करते हैं युवा
हनुमान स्वरूप बनने वाले कई छोटे बच्चे और युवा करीब 40 दिनों के लिए अपने घर छोड़कर मंदिर या धर्मशाला के परिसर में रहते हैं। इस दौरान वे साधु जैसा जीवन जीते हुए कठिन अनुशासन का पालन करते हैं।इस अवधि में वे दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं। इसके साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ, श्रीराम नाम का जाप और श्रीरामचरितमानस का पाठ किया जाता है। कई युवा पूरे 40 दिनों तक नंगे पैर रहने का संकल्प भी निभाते हैं।
दशहरे से पहले निकलता है नगर भ्रमण
हनुमान स्वरूप धारण करने वाले युवाओं के लिए दशहरे से करीब आठ दिन पहले नगर भ्रमण शुरू होता है। इस दौरान वे हनुमान सेवकों के साथ शहर के विभिन्न हिस्सों में जाते हैं और धार्मिक वातावरण का निर्माण करते हैं।
इन हनुमान स्वरूपों के साथ पांच फीट से अधिक ऊंची हनुमान प्रतिमाएं होती हैं। उनकी पीठ पर लंबे बांस की पूंछ बांधी जाती है। शरीर पर सिंदूर और तिल का तेल लगाया जाता है तथा पारंपरिक रूप से लंगोट धारण किया जाता है।
दशहरे के दिन सभी हनुमान सभाएं अपने हनुमान स्वरूपों के साथ ढोल और डीजे की धुनों के बीच दशहरा मैदान की ओर बढ़ती हैं। इसके बाद शहर की सड़कों पर धार्मिक जुलूस देर रात तक चलता है।
लय्याह से पानीपत पहुंची परंपरा की कहानी
लय्याह समुदाय से जुड़े और आज भी हनुमान प्रतिमाएं बनाने वाले राजेश नंदा के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत लय्याह जिले में वर्ष 1941 में हुई थी।
उनके परदादा भगत धालू राम ने वहां पहली हनुमान भगत सभा स्थापित की थी। उन्होंने ही भगवान हनुमान के स्वरूप के लिए पहला विशेष मुखौटा और प्रतिमा तैयार की थी।
विभाजन के दौरान प्रतिमा को पानीपत लाया गया
भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय धालू राम अपने परिवार के साथ हनुमान प्रतिमा को एक बड़े बक्से में रखकर पानीपत ले आए थे। नंदा के मुताबिक, परिवार के पास आज भी वह पहली हनुमान प्रतिमा सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि उनके पिता प्रकाश लाल ने अपने दादा धालू राम से प्रतिमा बनाने की कला सीखी। इसके बाद उन्होंने भी अपने पिता से यह पारंपरिक हुनर सीखा।
शुरुआत में हनुमान प्रतिमाएं केवल इसी परिवार द्वारा तैयार की जाती थीं। समय के साथ इस काम से करीब 50-60 अन्य लोग भी जुड़ गए और अब पानीपत में कई कारीगर इन प्रतिमाओं को तैयार करते हैं।
200 रुपये से 40 हजार रुपये तक पहुंची प्रतिमा की लागत
समय के साथ हनुमान प्रतिमा बनाने की लागत में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले एक प्रतिमा करीब 200 रुपये में तैयार हो जाती थी, जबकि अब इसकी कीमत लगभग 35,000 से 40,000 रुपये तक पहुंच गई है।
इसके अलावा कई लोग प्रतिमा की सजावट पर 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक खर्च करते हैं।
प्रतिमा तैयार करने में लगते हैं ढाई महीने
पारंपरिक हनुमान प्रतिमा को तैयार करने में कम से कम दो से ढाई महीने का समय लगता है। इसे मुख्य रूप से बांस, लकड़ी, कागज और कपड़े की मदद से तैयार किया जाता है।
कारीगरों के लिए यह केवल रोजगार या शिल्प नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है, जिसे आज भी उसी परंपरा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
Key Highlights:
- पानीपत में ‘हनुमान स्वरूप’ की करीब 85 साल पुरानी परंपरा जारी।
- परंपरा की शुरुआत 1941 में पाकिस्तान के लय्याह जिले में हुई थी।
- विभाजन के दौरान हनुमान प्रतिमा को परिवार पानीपत लेकर आया।
- करीब 10 हजार युवा इस परंपरा से सीधे जुड़े हैं।
- 3,500 से अधिक हनुमान सभाएं दशहरा आयोजन समितियों से जुड़ी हैं।
- युवा 40 दिनों तक मंदिर या धर्मशाला में रहकर तपस्या करते हैं।
- दशहरे से आठ दिन पहले हनुमान स्वरूपों का नगर भ्रमण शुरू होता है।
- पारंपरिक हनुमान प्रतिमा बनाने में दो से ढाई महीने लगते हैं।
- प्रतिमा की मौजूदा कीमत करीब 35,000 से 40,000 रुपये तक है।
- सजावट पर लोग 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक खर्च करते हैं।
- यह परंपरा अब हरियाणा के कई जिलों के अलावा दिल्ली, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब तक फैल चुकी है।
FAQ Section:
Q1. पानीपत की हनुमान स्वरूप परंपरा कितनी पुरानी है?
यह परंपरा करीब 85 साल पुरानी है और इसकी शुरुआत वर्ष 1941 में लय्याह जिले में हुई थी।
Q2. हनुमान स्वरूप बनने वाले युवा कितने दिनों तक तपस्या करते हैं?
हनुमान स्वरूप बनने वाले युवा करीब 40 दिनों तक तपस्या करते हैं और इस दौरान विशेष धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं।
Q3. हनुमान स्वरूपों का नगर भ्रमण कब शुरू होता है?
दशहरा पर्व से करीब आठ दिन पहले हनुमान स्वरूपों का नगर भ्रमण शुरू होता है।
Q4. हनुमान प्रतिमा बनाने में कितना समय लगता है?
पारंपरिक तरीके से हनुमान प्रतिमा तैयार करने में कम से कम दो से ढाई महीने का समय लगता है।
Q5. हनुमान प्रतिमा की कीमत कितनी होती है?
वर्तमान में एक प्रतिमा की कीमत लगभग 35,000 से 40,000 रुपये तक बताई गई है। इसकी सजावट पर अलग से 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक खर्च किया जा सकता है।
Conclusion:
पाकिस्तान के लय्याह जिले से विभाजन के दौरान पानीपत पहुंची ‘हनुमान स्वरूप’ की परंपरा आज धार्मिक आस्था के साथ-साथ शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा हजारों युवाओं और सैकड़ों कारीगरों को जोड़ रही है। दशहरे के दौरान निकलने वाले हनुमान स्वरूपों के नगर भ्रमण से पानीपत का धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल खास बन जाता है।
