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कुरुक्षेत्र में बनेगा 10,000 वर्षों की विरासत दर्शाने वाला संग्रहालय
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन पर ‘कुरुक्षेत्र म्यूजियम’ की परिकल्पना
‘कुरुक्षेत्र: थ्रू द एजेज’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन पर एक भव्य संग्रहालय बनाने की योजना सामने आई, जो क्षेत्र के 10,000 वर्षों के इतिहास को दर्शाएगा।
‘कुरुक्षेत्र: थ्रू द एजेज’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुक्रवार को समापन हुआ। इस अवसर पर “कुरुक्षेत्र म्यूजियम” की परिकल्पना प्रस्तुत की गई, जिसका उद्देश्य क्षेत्र की लगभग 10,000 वर्षों पुरानी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत को समेटना है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोम नाथ सचदेवा ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने के लिए संस्थान की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।
सम्मेलन निदेशक प्रो. भगत सिंह ने बताया कि प्रस्तावित संग्रहालय में कुरुक्षेत्र के इतिहास को दो प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाएगा—महाभारत काल से पहले के 5,000 वर्ष और उसके बाद के 5,000 वर्ष।
भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने कहा कि इस तरह का संग्रहालय कुरुक्षेत्र की वैश्विक पहचान को और मजबूत करेगा। उन्होंने इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत की प्राचीन विरासत से जुड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
विजन कुरुक्षेत्र के अध्यक्ष मदन मोहन छाबड़ा ने भी इस परियोजना में सहयोग का भरोसा जताया और कहा कि यह संग्रहालय देश-विदेश के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
कार्यक्रम के समापन दिवस पर उपस्थित कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि कुरुक्षेत्र का इतिहास गौरवशाली रहा है और यह भूमि ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। उन्होंने कहा कि इसी पवित्र भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था, जो मानव जीवन को कर्तव्य, धर्म और शांति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
गीता विद्वान स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि कुरुक्षेत्र की समृद्ध संस्कृति और विरासत को संरक्षित करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री के ओएसडी भारत भूषण भारती, स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े अर्थशास्त्री सतीश कुमार, देश भगत विश्वविद्यालय के प्रो-वाईस चांसलर प्रो. अमरजीत सिंह और कर्नल अरुण वशिष्ठ सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
विश्वविद्यालय के जनसंपर्क उपनिदेशक डॉ. जिमी शर्मा ने बताया कि सम्मेलन में व्यापक शैक्षणिक भागीदारी देखने को मिली। कुल 900 पंजीकरण हुए, जिनमें 770 ऑनलाइन थे। 24 सत्रों में 400 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जो प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृत, आधुनिक इतिहास, विधि और पंजाबी विषयों पर आधारित थे।
