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हरियाणा में औषधीय पौधों पर मंडराया संकट, मोरनी पहाड़ियों और अरावली की वनस्पति घटने की चेतावनी
MDU रोहतक के प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव के शोध में सामने आई चिंता, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से घट रही औषधीय पौधों की विविधता।
हरियाणा में औषधीय पौधों की समृद्ध प्राकृतिक विरासत पर संकट बढ़ रहा है। महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU), रोहतक के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह यादव के शोध के अनुसार, अनियोजित शहरीकरण, प्राकृतिक आवासों का क्षरण, अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण औषधीय पौधों की विविधता प्रभावित हो रही है। प्रो. यादव को Elsevier और अमेरिका की Stanford University द्वारा जारी World's Top 2% Scientists List 2026 में भी शामिल किया गया है।
हरियाणा की पहचान केवल कृषि और औद्योगिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां औषधीय पौधों की भी समृद्ध प्राकृतिक विरासत मौजूद है। हालांकि, अब यह विरासत कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने, अनियोजित शहरीकरण, पौधों के अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य में औषधीय वनस्पतियों की विविधता लगातार प्रभावित हो रही है।
यह जानकारी महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU), रोहतक के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह यादव के शोध में सामने आई है। प्रो. यादव को हाल ही में Elsevier और अमेरिका की Stanford University की ओर से जारी World's Top 2% Scientists List 2026 में शामिल किया गया है।
मोरनी पहाड़ियों और अरावली में औषधीय पौधों की समृद्ध विरासत
प्रो. यादव के शोध में हरियाणा के मोरनी हिल्स, अरावली पर्वतमाला और गांवों के सामुदायिक वन क्षेत्रों, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘बानी’ कहा जाता है, की औषधीय वनस्पतियों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
इन क्षेत्रों में आज भी कई ऐसी वनस्पति प्रजातियां मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल स्थानीय लोग पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल और सामान्य बीमारियों के उपचार के लिए करते हैं। शोध में इन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उनके महत्व को समझने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
अश्वगंधा से गिलोय तक, कई औषधीय पौधों का होता है इस्तेमाल
प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव के अनुसार, हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में कई औषधीय पौधे पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाते हैं। इनमें अश्वगंधा, बहेड़ा, गिलोय, गुग्गुल, गोखरू, हरड़, खेजड़ी, निर्गुंडी, पुनर्नवा और वासा जैसे पौधे शामिल हैं।
इन पौधों का उपयोग स्थानीय समुदाय सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के पारंपरिक उपचार में करते हैं। हालांकि, इनकी उपलब्धता और विविधता पर बढ़ता पर्यावरणीय दबाव चिंता का विषय है।
औषधीय पौधों की विविधता घटने के प्रमुख कारण
प्रो. यादव ने औषधीय पौधों के प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कई कारण बताए हैं।
1. प्राकृतिक आवासों का क्षरण: जंगलों और अन्य प्राकृतिक क्षेत्रों में बदलाव से औषधीय पौधों के पनपने की परिस्थितियां प्रभावित होती हैं।
2. अनियोजित शहरीकरण: शहरी विस्तार के कारण प्राकृतिक वनस्पतियों वाले क्षेत्रों पर दबाव बढ़ता है।
3. पौधों का अत्यधिक दोहन: औषधीय पौधों की जरूरत से ज्यादा कटाई या संग्रहण से उनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
4. जलवायु परिवर्तन: तापमान और मौसम में बदलाव से पौधों के विकास और प्राकृतिक वितरण पर असर पड़ सकता है।
5. प्रदूषण और विदेशी प्रजातियां: प्रदूषण तथा बाहरी आक्रामक पौधों की प्रजातियों का प्रसार स्थानीय वनस्पतियों के लिए चुनौती बन सकता है।
संरक्षण के लिए वैज्ञानिक शोध और सामुदायिक भागीदारी जरूरी
प्रो. यादव ने औषधीय पौधों को बचाने के लिए कई उपाय सुझाए हैं। उनके अनुसार, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना और औषधीय पौधों को उनके प्राकृतिक आवासों में संरक्षित करना जरूरी है।
उन्होंने हर्बल गार्डन में पौधों के आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखने और संकटग्रस्त प्रजातियों की खेती को प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, औषधीय पौधों का व्यापक डेटाबेस तैयार करना और वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देना संरक्षण प्रयासों को अधिक प्रभावी बना सकता है।
प्रो. यादव के मुताबिक, हरियाणा की समृद्ध औषधीय विरासत के बावजूद राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में औषधीय पौधों की भूमिका को लेकर व्यापक शोध सीमित रहा है।
World’s Top 2% Scientists List 2026 में शामिल हुए प्रो. यादव
प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव ने वर्ष 2007 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से वनस्पति विज्ञान में पीएचडी की थी। उन्हें वनस्पति विज्ञान में शोध, वैज्ञानिक प्रकाशनों और शोध पत्रों के उद्धरणों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है।
उनकी प्रमुख शोध रुचियों में जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान के आधार पर पौधों के उपयोग का दस्तावेजीकरण और औषधीय पौधों की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन शामिल है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रो. यादव 100 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं। उनके शोध कार्यों को 2,900 से अधिक उद्धरण मिले हैं। उनका H-index 28 और i10-index 43 है। वे 10 पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर चुके हैं और 94 स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को शोध एवं अकादमिक कार्यों में मार्गदर्शन दिया है।
उन्होंने DST, UGC और MoEFCC जैसी सरकारी संस्थाओं से वित्तपोषित पांच प्रमुख शोध परियोजनाएं भी पूरी की हैं।
Key Highlights:
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हरियाणा में औषधीय पौधों की विविधता पर पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है।
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MDU रोहतक के प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव के शोध में औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया गया है।
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मोरनी हिल्स, अरावली और गांवों की सामुदायिक वन भूमि में कई औषधीय पौधे पाए जाते हैं।
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अश्वगंधा, गिलोय, गुग्गुल, हरड़ और पुनर्नवा जैसे पौधे स्थानीय पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल में इस्तेमाल होते हैं।
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प्राकृतिक आवासों का क्षरण, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन प्रमुख चुनौतियां हैं।
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प्रो. यादव को World's Top 2% Scientists List 2026 में शामिल किया गया है।
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औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए प्राकृतिक आवास बहाली, हर्बल गार्डन, संकटग्रस्त प्रजातियों की खेती और वैज्ञानिक शोध पर जोर दिया गया है।
FAQ Section:
सवाल 1: हरियाणा में औषधीय पौधों की विविधता क्यों घट रही है?
जवाब: शोध के अनुसार, प्राकृतिक आवासों का क्षरण, अनियोजित शहरीकरण, अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और बाहरी आक्रामक पौधों की प्रजातियां इसके प्रमुख कारण हैं।
सवाल 2: हरियाणा में औषधीय पौधे किन क्षेत्रों में पाए जाते हैं?
जवाब: मोरनी पहाड़ियों, अरावली पर्वतमाला और गांवों के सामुदायिक वन क्षेत्रों, जिन्हें बानी कहा जाता है, में औषधीय पौधों की विविधता दर्ज की गई है।
सवाल 3: हरियाणा में कौन-कौन से औषधीय पौधे पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होते हैं?
जवाब: अश्वगंधा, बहेड़ा, गिलोय, गुग्गुल, गोखरू, हरड़, खेजड़ी, निर्गुंडी, पुनर्नवा और वासा जैसे पौधों का स्थानीय समुदाय पारंपरिक रूप से उपयोग करते हैं।
सवाल 4: औषधीय पौधों को बचाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
जवाब: प्राकृतिक आवासों को बहाल करना, पौधों का उनके मूल क्षेत्रों में संरक्षण, हर्बल गार्डन में आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखना, संकटग्रस्त प्रजातियों की खेती और सामुदायिक जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण कदम हैं।
सवाल 5: प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव को किस उपलब्धि के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है?
जवाब: उन्हें वनस्पति विज्ञान में शोध, वैज्ञानिक प्रकाशनों और उद्धरणों में योगदान के लिए Elsevier और Stanford University द्वारा जारी World's Top 2% Scientists List 2026 में शामिल किया गया है।
Conclusion:
हरियाणा के औषधीय पौधे राज्य की प्राकृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन पर्यावरणीय बदलाव और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण इनके संरक्षण की जरूरत पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। प्रो. सुरेंद्र सिंह यादव के शोध के अनुसार, प्राकृतिक आवासों की बहाली, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए इस विरासत को सुरक्षित रखने के प्रयासों को मजबूत किया जा सकता है।

