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हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व बदलाव की चर्चा तेज, हुड्डा के बाद अगली पीढ़ी को मौका देने की उठी मांग
बीरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र हुड्डा को सक्रिय चुनावी राजनीति से हटने की सलाह दी, रणदीप सुरजेवाला की टिप्पणी से भी सामने आया नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा
हरियाणा कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्गठन के बीच पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव को लेकर बहस तेज हो गई है। बीरेंद्र सिंह और रणदीप सुरजेवाला की हालिया टिप्पणियों के बाद वरिष्ठ बनाम नई पीढ़ी के नेतृत्व का सवाल फिर चर्चा में है।
चंडीगढ़: हरियाणा कांग्रेस में संगठन के पुनर्गठन के बीच नेतृत्व की अगली पीढ़ी को आगे लाने को लेकर चर्चा तेज होती दिखाई दे रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हरियाणा कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रह चुके बीरेंद्र सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं विधानसभा में विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सक्रिय चुनावी राजनीति से अलग होकर युवा नेताओं के लिए जगह बनाने की सलाह दी है। इसी मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला की हालिया टिप्पणी ने भी पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की बहस को हवा दी है।
बीरेंद्र सिंह ने हुड्डा को दी अगली पीढ़ी को जगह देने की सलाह
हुड्डा के 79वें जन्मदिन पर बीरेंद्र सिंह ने कहा कि वह उन्हें पहले भी चुनावी राजनीति से हटने की सलाह दे चुके हैं और आगे भी यही सुझाव देंगे। उन्होंने खुद का उदाहरण देते हुए कहा कि वह 75 वर्ष की उम्र में चुनावी राजनीति से अलग हो गए थे और इसके बाद उनके बेटे बृजेंद्र सिंह को हिसार से चुनाव लड़ने का अवसर मिला।
बीरेंद्र सिंह और हुड्डा लंबे समय से राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के करीबी रहे हैं। बीरेंद्र सिंह की उम्र हुड्डा से करीब डेढ़ वर्ष अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा बहस केवल उम्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति के बदलते स्वरूप और नई पीढ़ी की राजनीतिक आकांक्षाओं से भी जुड़ी है।सुरजेवाला की ‘पे-बैक’ टिप्पणी से भी बढ़ी चर्चा
हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी संजय दत्त के पदभार संभालने के बाद चंडीगढ़ में हुई राज्यस्तरीय बैठक में भी नेतृत्व और संगठन को लेकर चर्चा हुई। बैठक के दौरान हुड्डा ने नेताओं से अपने हाथ मजबूत करने की अपील की थी।
इस पर रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि वह करीब 20 वर्षों से हुड्डा के साथ खड़े रहे हैं और अब “पे-बैक” का समय है। इस टिप्पणी को पार्टी के भीतर नेतृत्व और जिम्मेदारियों को लेकर चल रही चर्चा के संदर्भ में देखा जा रहा है।
हरियाणा कांग्रेस में हुड्डा की भूमिका
भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। वह 2005 और 2009 में राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 2014, 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में भी वह कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में रहे।
वहीं 2024 के विधानसभा चुनाव में हुड्डा ने गढ़ी सांपला-किलोई सीट से जीत दर्ज की थी। चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने इस सीट से 2009, 2014, 2019 और 2024 में जीत हासिल की।
संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी भी बड़ा मुद्दा
हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा ऐसे समय हो रही है जब पार्टी के भीतर संगठन और गुटबाजी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। जुलाई 2026 में नए प्रदेश प्रभारी संजय दत्त की बैठक में कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए थे। दत्त ने संगठन को मजबूत करने, समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच बढ़ाने और एकजुट होकर काम करने पर जोर दिया था।
पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि कांग्रेस के पास संभावित नेतृत्व की कमी नहीं है, बल्कि जरूरत संतुलित और नए सिरे से मजबूत संगठनात्मक ढांचे की है। युवा नेता कृष्ण सत्रोद ने कहा कि एक ही राजनीतिक तरीके को बार-बार दोहराने का असर पार्टी के लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हार के रूप में सामने आया।
राजनीतिक विशेषज्ञ ने उम्र के साथ ‘प्रासंगिकता’ को भी अहम बताया
महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के राजनीति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर राजेंद्र शर्मा ने इस बहस को हरियाणा की बदलती राजनीति के संदर्भ में देखने की बात कही।
उनके अनुसार, 2005 में हुड्डा के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद हरियाणा की राजनीति में काफी बदलाव आया है। उन्होंने विशेष रूप से BJP की पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के एक हिस्से पर केंद्रित राजनीतिक शैली को राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरण से जोड़ा। शर्मा ने कहा कि नेतृत्व के सवाल में केवल उम्र नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रासंगिकता भी महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस में कई नेताओं के नाम चर्चा में
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व के संभावित विकल्पों को लेकर अलग-अलग नामों की चर्चा होती रही है। इनमें कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, दीपेंद्र हुड्डा, बृजेंद्र सिंह और कैप्टन अजय यादव जैसे नेता शामिल हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं के अनुसार, इन नेताओं की अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों में राजनीतिक पकड़ को संगठन के भविष्य के लिहाज से देखा जाता है।
बृजेंद्र सिंह की ‘सद्भाव यात्रा’ को भी संगठनात्मक सक्रियता के संदर्भ में देखा गया है। यह यात्रा हरियाणा की सभी 90 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी और करीब 2,800 किलोमीटर का सफर तय करने का दावा किया गया था।
Key Highlights:
- हरियाणा कांग्रेस में पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बहस तेज हुई।
- बीरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र हुड्डा को अगली पीढ़ी के नेताओं के लिए जगह बनाने की सलाह दी।
- रणदीप सुरजेवाला की ‘पे-बैक’ टिप्पणी भी चर्चा में रही।
- हुड्डा 2005 और 2009 में हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे हैं।
- 2014, 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में हुड्डा कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में रहे।
- पार्टी के भीतर संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी भी चर्चा का विषय है।
- राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार नेतृत्व के सवाल में उम्र के साथ राजनीतिक प्रासंगिकता भी महत्वपूर्ण है।
- कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच कई वरिष्ठ और युवा नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चा जारी है।
FAQ Section:
Q. हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा क्यों हो रही है?
पार्टी के पुनर्गठन के बीच वरिष्ठ नेता बीरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र हुड्डा को अगली पीढ़ी के नेताओं के लिए जगह बनाने की सलाह दी है। रणदीप सुरजेवाला की हालिया टिप्पणी ने भी इस बहस को प्रमुखता दी है।
Q. बीरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र हुड्डा से क्या कहा?
उन्होंने हुड्डा को सक्रिय चुनावी राजनीति से अलग होने और अगली पीढ़ी के नेताओं को आगे आने का अवसर देने की सलाह दी।
Q. रणदीप सुरजेवाला ने हुड्डा की अपील पर क्या प्रतिक्रिया दी?
सुरजेवाला ने कहा कि वह 20 वर्षों से हुड्डा के साथ खड़े रहे हैं और अब “पे-बैक” का समय है।
Q. हरियाणा कांग्रेस में संगठन को लेकर क्या स्थिति है?
पार्टी के नए प्रभारी संजय दत्त ने संगठन को मजबूत करने, एकता, अनुशासन और मेहनत पर जोर दिया है। वहीं पार्टी की बैठकों में आंतरिक मतभेद भी सामने आए हैं।
Conclusion:
हरियाणा कांग्रेस में संगठनात्मक पुनर्गठन के साथ नेतृत्व की अगली पीढ़ी को आगे लाने का सवाल भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। बीरेंद्र सिंह की हुड्डा को दी गई सलाह और सुरजेवाला की टिप्पणी ने इस बहस को सार्वजनिक रूप दिया है। हालांकि, पार्टी में हुड्डा की भूमिका और प्रभाव अभी भी महत्वपूर्ण है। आने वाले संगठनात्मक फैसलों में वरिष्ठ नेताओं के अनुभव और नई पीढ़ी की भूमिका के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है, यह कांग्रेस के लिए प्रमुख संगठनात्मक मुद्दा रहेगा।
