धर्मशाला में 14वें दलाई लामा के राज्याभिषेक की 86वीं वर्षगांठ मनाई गई

त्सुगलाखांग मंदिर में विशेष प्रार्थनाएं, कैलाश सत्यार्थी मुख्य अतिथि रहे

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निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों ने मैक्लोडगंज स्थित त्सुगलाखांग मंदिर में 14वें दलाई लामा के राज्याभिषेक की 86वीं वर्षगांठ विशेष प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाई।

निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों ने रविवार को मैक्लोडगंज स्थित Tsuglagkhang Temple में 14वें Dalai Lama के राज्याभिषेक की 86वीं वर्षगांठ श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई।

इस अवसर पर भिक्षु, भिक्षुणियां और तिब्बती समुदाय के सदस्य मुख्य मंदिर परिसर में एकत्रित हुए और विश्व शांति के लिए विशेष प्रार्थनाएं कीं। समारोह में Central Tibetan Administration के वरिष्ठ अधिकारी, स्थानीय प्रतिनिधि और श्रद्धालु उपस्थित रहे। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित Kailash Satyarthi मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए।

14वें दलाई लामा का औपचारिक राज्याभिषेक 22 फरवरी 1940 को ल्हासा में हुआ था, जब उन्हें अपने पूर्ववर्ती का पुनर्जन्म मान्यता दी गई। वर्ष 1935 में तिब्बत में ल्हामो थोंडुप के रूप में जन्मे दलाई लामा ने कम आयु में ही मठवासी शिक्षा प्रारंभ कर दी थी, उस समय देश का शासन एक रीजेंट के हाथों में था।

सन् 1950 में चीन के तिब्बत में प्रवेश के बाद उन्होंने सर्वोच्च सांसारिक जिम्मेदारियां संभालीं। 1959 के असफल विद्रोह के पश्चात वे भारत आ गए और तब से मैक्लोडगंज में निवास कर रहे हैं, जो तिब्बती निर्वासित सरकार का मुख्यालय है।

इस अवसर पर जारी बयान में काशाग ने दलाई लामा की “अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग की नीति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता” को श्रद्धांजलि दी। बयान में कहा गया कि उनका राज्याभिषेक तिब्बती इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में उनके असाधारण नेतृत्व की याद दिलाता है। उनके मार्गदर्शन में निर्वासन के दौरान तिब्बती पहचान, संस्कृति और लोकतांत्रिक संस्थाओं को संरक्षित और सशक्त बनाया गया है।Screenshot_1434

Edited By: Karan Singh

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