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खालसा कॉलेज फॉर वूमेन में 11वें अमृतसर साहित्य उत्सव का शुभारंभ
विद्वानों ने अकादमिक शोध के स्तर को बेहतर बनाने और साहित्यिक सिद्धांतों पर गहन अध्ययन की जरूरत पर दिया जोर
छात्र और शोधार्थियों द्वारा संचालित संस्था ‘नाद परगास’ की ओर से आयोजित 11वां अमृतसर साहित्य उत्सव खालसा कॉलेज फॉर वूमेन में शुरू हुआ। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने लोकप्रिय साहित्य और अकादमिक शोध के स्तर पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
छात्रों और शोधार्थियों द्वारा संचालित संस्था ‘नाद परगास’ द्वारा आयोजित 11वें अमृतसर साहित्य उत्सव का हाल ही में खालसा कॉलेज फॉर वूमेन में शुभारंभ हुआ।
उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के प्रोफेसर अक्षय कुमार ने अपने विचार रखते हुए कहा कि लोकप्रिय साहित्य अपने आप नहीं उभरता, बल्कि इसे ऐसे लेखक तैयार करते हैं जिनमें अकादमिक जिम्मेदारी और साहित्य की गहरी समझ की कमी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी बड़े सिद्धांत को अंतिम सत्य मानकर उसी आधार पर शोध करने की प्रवृत्ति भी गलत है।
इसी सत्र में पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. राजेश शर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि पंजाब की विश्वविद्यालयों को वर्तमान लोकप्रिय रुझानों और सुविधाओं से आगे बढ़कर अकादमिक शोध के स्तर को ऊंचा उठाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर कलात्मक या साहित्यिक कृति का अपना एक अंतर्निहित सिद्धांत या ढांचा होता है, लेकिन उसे समझना कठिन होने के कारण हम अक्सर उसे बाहरी सैद्धांतिक दृष्टिकोण से पढ़ने की कोशिश करते हैं।
दिन के दूसरे कार्यक्रम में दर्शनशास्त्र के मूलभूत प्रश्नों पर आधारित एक सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें तीन शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के डॉ. उदय रत्न ने ‘हाबरमास और अंबेडकर के विचार’, हंसराज कॉलेज, दिल्ली के डॉ. रोनाल्ड ने ‘ग्राउंडलेस ग्राउंड’ की अवधारणा और हंसराज कॉलेज, दिल्ली के ही डॉ. लखवीर सिंह ने ‘मिशेल फूको के विचार’ पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
तीसरा कार्यक्रम साहित्य की सैद्धांतिक स्थिति पर आधारित एक पैनल चर्चा थी, जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने भाग लिया। अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. दीपिंदरजीत रंधावा ने कहा कि समकालीन दौर में किसी भी सैद्धांतिक दृष्टिकोण को अंतिम नहीं माना जा सकता और सभी दृष्टिकोणों को समान मान्यता दी जाती है।
