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पंजाब में बच्चों में अस्थमा बना आपात स्थिति: डॉक्टरों की चेतावनी
वर्ल्ड अस्थमा डे पर विशेषज्ञ बोले—स्कूलों को बनाना होगा पहली रक्षा पंक्ति
लुधियाना की डॉक्टर पुनित औलख पूनी ने चेतावनी दी है कि पंजाब में हजारों बच्चे बिना निदान के अस्थमा से जूझ रहे हैं, जिसे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट माना जा रहा है।
World Asthma Day के अवसर पर, लुधियाना फोरम ‘Doctors for Clean Air and Climate Action’ की मानद कार्यकारी सदस्य डॉ. पुनित औलख पूनी ने चेतावनी दी है कि पंजाब में बच्चों के बीच अस्थमा एक गंभीर आपात स्थिति का रूप ले चुका है। हजारों बच्चे बिना सही पहचान (डायग्नोसिस) के इस बीमारी से जूझ रहे हैं और स्कूलों व खेल के मैदानों में बिना इलाज और सहायता के संघर्ष कर रहे हैं।
डॉ. पूनी, जो Dayanand Medical College and Hospital में बाल रोग विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख तथा पीडियाट्रिक क्रिटिकल केयर फेलोशिप कार्यक्रम की निदेशक हैं, ने कहा कि इस संकट से निपटने में स्कूलों को अग्रिम भूमिका निभानी होगी। उन्होंने जोर देकर कहा, “हर स्कूल को अस्थमा अटैक से निपटने की जानकारी होनी चाहिए और जिन बच्चों में लक्षण दिखें, उन्हें समय पर जांच और इलाज के लिए मार्गदर्शन मिलना चाहिए।”

चिंताजनक बात यह है कि अस्थमा से पीड़ित 88% बच्चों को अपनी बीमारी की जानकारी ही नहीं थी, जबकि केवल 3% बच्चे इनहेलर का उपयोग कर रहे थे।
डॉ. पूनी ने कहा, “यह सिर्फ जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर विफलता है। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जिसे सांस लेने में दिक्कत को सामान्य समझने की आदत हो गई है, जबकि ऐसा नहीं है।”
उन्होंने बताया कि कई बच्चे रोज खांसी से परेशान रहते हैं, रात में सांस फूलने के कारण जाग जाते हैं और खेल-कूद से बचते हैं। बिना स्कूल-आधारित हस्तक्षेप के यह समस्या और बढ़ सकती है।
पंजाब में बढ़ता प्रदूषण—जैसे वाहनों का धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण की धूल और मौसम के अनुसार प्रदूषण में वृद्धि—हवा की गुणवत्ता को खतरनाक स्तर तक ले जा चुका है।
डॉ. पूनी ने यह भी चेतावनी दी कि घर के अंदर का प्रदूषण भी उतना ही खतरनाक है। सिगरेट का धुआं, अगरबत्ती, मच्छर भगाने वाली कॉइल, सीलन, फफूंदी और खराब वेंटिलेशन वाले रसोईघर से निकलने वाला धुआं अस्थमा के दौरे को बढ़ा सकता है।
उन्होंने कहा कि हवा में मौजूद महीन कण (फाइन पार्टिकुलेट मैटर) बच्चों के विकसित हो रहे फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर बीमारी को और गंभीर बना देते हैं।
डॉ. पूनी ने यह भी बताया कि कई परिवारों में अभी भी यह गलत धारणा है कि इनहेलर की आदत पड़ जाती है या यह सुरक्षित नहीं होते। इस वजह से इलाज में देरी होती है और बच्चे बार-बार एंटीबायोटिक, कफ सिरप और अस्पताल के चक्कर लगाने को मजबूर हो जाते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया, “सच्चाई यह है कि इनहेलर अस्थमा के दौरे को रोकते हैं, फेफड़ों की क्षमता को सुरक्षित रखते हैं और बच्चों को सामान्य जीवन जीने में मदद करते हैं।”
उन्होंने पंजाब में बड़े स्तर पर श्वसन संबंधी शोध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि इस समस्या की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सके और प्रभावी समाधान तैयार किए जा सकें।
अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि इस मुद्दे पर समय रहते कदम उठाना जरूरी है, क्योंकि बच्चों का स्वास्थ्य और भविष्य दांव पर है।

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