बच्चों में बढ़ रहे एलर्जी और अस्थमा के मामले, डॉक्टरों ने समय पर इलाज पर दिया जोर

विशेषज्ञ बोले—जल्दी पहचान और सही उपचार से रोकी जा सकती हैं गंभीर जटिलताएं

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बच्चों में सांस संबंधी एलर्जी और अस्थमा के बढ़ते मामलों को लेकर डॉक्टरों ने चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश एलर्जी का समय रहते सही इलाज किया जाए तो उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में गंभीर समस्याओं से बचाव संभव है।

बच्चों में श्वसन संबंधी एलर्जी और अस्थमा के मामलों में लगातार वृद्धि को देखते हुए डॉक्टरों ने समय पर पहचान और उचित उपचार की आवश्यकता पर जोर दिया है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में होने वाली एलर्जी आमतौर पर त्वचा, नाक और छाती को प्रभावित करती है। विशेषज्ञ इसे “एलर्जिक मार्च” कहते हैं, जिसमें शिशु अवस्था का एक्जिमा आगे चलकर फूड एलर्जी, एलर्जिक राइनाइटिस और अंततः अस्थमा का रूप ले सकता है।

एक्जिमा हो सकता है पहला संकेत

Naresh Grover ने बताया कि एक्जिमा अक्सर एलर्जी का शुरुआती संकेत होता है।

उन्होंने कहा, “त्वचा की सुरक्षा परत कमजोर होने पर एलर्जी पैदा करने वाले तत्व शरीर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं, जिससे भविष्य में अन्य एलर्जी होने का खतरा बढ़ जाता है। इस चक्र को रोकने के लिए शुरुआती त्वचा देखभाल, एलर्जी जांच और उपचार बेहद जरूरी है।”

एलर्जी के लक्षणों को अक्सर किया जाता है नजरअंदाज

बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार एलर्जी के लक्षणों को सामान्य मौसमी संक्रमण समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

डॉ. ग्रोवर ने कहा, “बार-बार छींक आना, नाक बंद रहना, मुंह से सांस लेना, खर्राटे लेना, बार-बार सर्दी होना और बच्चों में नाक से खून आना एलर्जिक राइनाइटिस के संकेत हो सकते हैं, जो दुनिया भर में सबसे आम एलर्जी में से एक है।”

सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में लगभग 25 प्रतिशत किशोर एलर्जिक राइनाइटिस से प्रभावित हैं।

समय पर इलाज न होने पर बढ़ सकता है खतरा

डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि यदि बच्चों में एलर्जिक राइनाइटिस का इलाज समय पर नहीं किया जाए, तो इससे एडिनॉइड्स बढ़ना, नींद में परेशानी, पढ़ाई में ध्यान की कमी और साइनस, कान या आंखों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे लगभग 40 से 50 प्रतिशत बच्चों में आगे चलकर अस्थमा विकसित हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सही एलर्जी जांच और इलाज, जैसे नेजल स्प्रे और दवाओं के इस्तेमाल से कई बच्चों को अनावश्यक एडिनॉइड सर्जरी से बचाया जा सकता है।

प्रदूषण से बढ़ रहे अस्थमा के मामले

शहर के फेफड़ा रोग विशेषज्ञों ने बताया कि खराब वायु गुणवत्ता, वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, धुआं और बदलते मौसम के कारण अस्थमा के मामलों में वृद्धि हो रही है।

उन्होंने कहा कि बच्चे, बुजुर्ग और बाहर काम करने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

Sandeep Aggarwal ने कहा कि रात में बार-बार खांसी आना, सांस में सीटी जैसी आवाज आना और खेलने या दौड़ने के दौरान सांस लेने में तकलीफ अस्थमा या छाती की एलर्जी के संकेत हो सकते हैं।

उन्होंने बताया कि कई मरीज तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते, जब तक बीमारी गंभीर न हो जाए।

इनहेलर को लेकर भ्रांतियां दूर करने की जरूरत

इनहेलर को लेकर फैली गलत धारणाओं पर डॉ. नरेश ग्रोवर ने कहा कि लोग अक्सर इनहेलर के इस्तेमाल से डरते हैं, जबकि सही तरीके से उपयोग किए जाने पर यह अस्थमा नियंत्रण का सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।

डॉक्टरों ने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों में एलर्जी या अस्थमा के शुरुआती लक्षण दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके।

 
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Edited By: Karan Singh

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