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आजादी के 80 साल बाद भी लाहौर की यादें नहीं भूले 100 वर्षीय कुंदन सिंह माडान, 19 की उम्र में छोड़ा था घर
1947 में एक हफ्ते में लौटने की उम्मीद लेकर निकला था परिवार, दंगे और बंटवारे ने बदल दी जिंदगी; रेलवे की नौकरी ने जालंधर में दी नई स्थिरता
देश आज 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, लेकिन 100 वर्षीय कुंदन सिंह माडान के जेहन में 1947 का विभाजन आज भी ताजा है। 19 साल की उम्र में लाहौर में अपना घर और दो किराना दुकानें छोड़कर भारत आए माडान फिर कभी अपने पुश्तैनी घर नहीं लौट सके।
देश जब 80वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहा है, वहीं 100 वर्षीय कुंदन सिंह माडान के लिए आजादी का दिन आठ दशक पुरानी यादों को फिर से सामने ले आता है। वर्ष 1947 में महज 19 साल की उम्र में लाहौर स्थित अपना घर और दो किराना दुकानें छोड़कर भारत आए माडान को उस समय उम्मीद थी कि हिंसा खत्म होने के बाद वह एक सप्ताह के भीतर वापस लौट जाएंगे। लेकिन वह एक सप्ताह आठ दशकों में बदल गया और वह अपने उस घर में दोबारा कभी नहीं लौट सके।
कुंदन सिंह माडान अब जालंधर में रहते हैं। विभाजन के समय लाखों लोगों की तरह उन्हें भी अपना घर-बार छोड़कर भारत आना पड़ा था। आजादी और विभाजन की उस त्रासदी की यादें आज भी उनके साथ हैं।
लाहौर में बीता बचपन, पड़ोसियों से थे अच्छे संबंध
कुंदन सिंह माडान का जन्म 1 जुलाई 1926 को तत्कालीन लाहौर जिले की कसूर तहसील में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उनका परिवार मुस्लिम बहुल इलाके में रहता था और वहां उनका अपना मकान तथा दो किराना दुकानें थीं।माडान आठ भाई-बहनों के साथ वहीं बड़े हुए। उन्होंने बताया कि इलाके में हिंदू परिवारों की संख्या कम थी, लेकिन स्थानीय मुस्लिम परिवारों के साथ उनके संबंध अच्छे थे। सभी लोग आपसी सौहार्द के साथ रहते थे और सामान्य जीवन जीते थे।
आजादी से करीब एक सप्ताह पहले बदले हालात
माडान के मुताबिक, स्वतंत्रता दिवस से करीब एक सप्ताह पहले इलाके में दंगे शुरू हो गए। हिंसा बढ़ने के बाद उनके परिवार ने भारत में रहने वाले एक रिश्तेदार के घर जाने का फैसला किया।
एक मुस्लिम पड़ोसी ने भी परिवार को जल्द से जल्द वहां से निकल जाने की सलाह दी थी, क्योंकि इलाके में हालात तेजी से बिगड़ रहे थे।
14 अगस्त 1947 को छोड़ा घर
कुंदन सिंह माडान ने बताया कि उनका करीब 15 सदस्यों वाला परिवार 14 अगस्त 1947 को मवेशियों और कुछ जरूरी सामान के साथ पास के एक गांव में रिश्तेदार के घर के लिए रवाना हुआ था।
उस समय परिवार को उम्मीद थी कि हालात शांत होने के बाद वह एक सप्ताह में वापस लौट आएगा। लेकिन अगले ही दिन आजादी की घोषणा के बाद उन्हें पता चला कि उनका इलाका अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका है।
इसके बाद घर और दोनों दुकानें पीछे छूट गईं और परिवार के लिए वापस लौटने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया।
नंगे पैर भारत पहुंचा परिवार
लाहौर से विस्थापित होकर माडान का परिवार भारत के बरनाला के राजियां गांव पहुंचा। करीब 15 सदस्यों के इस परिवार ने रिश्तेदार के घर शरण ली। वहां उन्हें कपड़े, भोजन और रहने की जगह उपलब्ध कराई गई।
करीब आठ दिन बाद रिश्तेदार के घर अधिक समय तक रहना संभव नहीं रहा। इसके बाद परिवार पास के उस गांव में चला गया, जिसे पाकिस्तान जा चुके मुस्लिम परिवारों ने छोड़ दिया था।
वहां माडान के परिवार ने एक खाली कच्चे मकान में रहकर नए सिरे से जिंदगी शुरू की।
परिवार चलाने के लिए ठेला लगाया
विस्थापन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कठिन थी। परिवार का सहारा बनने के लिए कुंदन सिंह माडान ने किराए पर ठेला लिया और उस पर साबुन तथा सोडा बेचने लगे।
करीब तीन महीने तक परिवार के सदस्यों ने अलग-अलग छोटे-मोटे काम करके गुजारा किया। नवंबर में उनके मामा के परिवार के लोगों को उनके बारे में पता चला। इसके बाद माडान और उनके परिवार ने फिरोजपुर जाने का फैसला किया, जहां उनके रिश्तेदार रहते थे।
रेलवे में मिली नौकरी ने बदली जिंदगी
माडान ने बताया कि उस समय सरकार ने शरणार्थियों को फिरोजपुर, लुधियाना, जालंधर और पूर्वी पंजाब के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने के लिए ट्रेनों में अतिरिक्त डिब्बों की व्यवस्था की थी।
फिरोजपुर पहुंचने के बाद रिश्तेदारों की मदद से माडान को रेलवे में नौकरी मिल गई। करीब दो साल बाद उनका तबादला जालंधर कर दिया गया। इसके बाद जालंधर ही उनका स्थायी घर बन गया।
उन्होंने रेलवे विभाग में करीब 37 वर्षों तक सेवा की और 30 जून 1984 को सेवानिवृत्त हुए।
रेलवे ने परिवार को दी आर्थिक स्थिरता
विभाजन के दौरान सब कुछ खोने के बाद माडान के लिए रेलवे की नौकरी जिंदगी में स्थिरता लेकर आई। उनके अनुसार, नौकरी ने न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करने में मदद की, बल्कि विस्थापन के बाद नए जीवन को संभालने का आधार भी दिया।
लेकिन आर्थिक स्थिरता के बावजूद लाहौर में छूटा घर, दो दुकानें और बचपन की यादें उनके मन में आज भी जीवित हैं।
Key Highlights:
- 100 वर्षीय कुंदन सिंह माडान आज जालंधर में रहते हैं।
- 19 साल की उम्र में उन्होंने 1947 में लाहौर का घर छोड़ा था।
- परिवार की लाहौर में दो किराना दुकानें भी थीं।
- परिवार को उम्मीद थी कि एक सप्ताह बाद वापस लौट जाएंगे।
- विभाजन के बाद यह वापसी कभी नहीं हो सकी।
- करीब 15 सदस्यों का परिवार भारत आया था।
- परिवार ने बरनाला के राजियां गांव में शरण ली।
- माडान ने परिवार के लिए ठेले पर साबुन और सोडा बेचा।
- बाद में उन्हें रेलवे में नौकरी मिली।
- उन्होंने रेलवे में करीब 37 साल सेवा की।
- 30 जून 1984 को वह सेवानिवृत्त हुए।
- जालंधर बाद में उनका स्थायी घर बन गया।
FAQ Section:
- कुंदन सिंह माडान कौन हैं?
कुंदन सिंह माडान 100 वर्षीय विभाजन पीड़ित हैं, जो 1947 में लाहौर से विस्थापित होकर भारत आए थे और अब जालंधर में रहते हैं। - कुंदन सिंह माडान ने लाहौर कब छोड़ा था?
उन्होंने 14 अगस्त 1947 को अपने परिवार के साथ लाहौर क्षेत्र में अपना घर छोड़ा था। - लाहौर में माडान के परिवार के पास क्या था?
उनके परिवार के पास एक घर और दो किराना दुकानें थीं। - भारत आने के बाद परिवार कहां रहा?
परिवार पहले बरनाला के राजियां गांव में रिश्तेदार के घर रहा और बाद में एक खाली कच्चे मकान में रहने लगा। - माडान को रेलवे में नौकरी कैसे मिली?
फिरोजपुर पहुंचने के बाद रिश्तेदारों की मदद से उन्हें रेलवे में नौकरी मिली। - माडान ने रेलवे में कितने वर्षों तक सेवा की?
उन्होंने रेलवे विभाग में करीब 37 वर्षों तक सेवा की और 30 जून 1984 को सेवानिवृत्त हुए।
Conclusion:
कुंदन सिंह माडान की कहानी भारत के विभाजन की उस पीड़ा को सामने लाती है, जिसे लाखों परिवारों ने झेला था। 19 वर्ष की उम्र में एक सप्ताह में लौटने की उम्मीद लेकर लाहौर से निकले माडान के लिए वह सफर कभी खत्म नहीं हुआ। आठ दशक बाद भी अपने घर और दुकानों की यादें उनके साथ हैं। हालांकि रेलवे की नौकरी ने उन्हें जालंधर में स्थिर जीवन दिया, लेकिन 1947 में छूटी जन्मभूमि की यादें आज भी उनके जीवन का अहम हिस्सा हैं।
