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बद्दी का औद्योगिक विस्तार गांवों पर पड़ा भारी: भूजल 25 मीटर तक गिरा, सिरसा नदी में जहरीले कचरे की चेतावनी
सोलन जिले के 3,256 हेक्टेयर क्षेत्र में किए गए माइक्रो-वॉटरशेड अध्ययन ने औद्योगिकीकरण, भूजल संकट और ग्रामीण पर्यावरण पर गंभीर प्रभावों की तस्वीर पेश की।
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में बद्दी औद्योगिक क्षेत्र के तेजी से विस्तार पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन में आसपास के गांवों में भूजल स्तर में भारी गिरावट और सिरसा नदी में औद्योगिक प्रदूषण की गंभीर स्थिति सामने आई है। अध्ययन के अनुसार यह प्रदूषण आगे पंजाब के रोपड़ रामसर वेटलैंड तक पहुंचने की आशंका पैदा करता है।
सोलन: हिमाचल प्रदेश के शिवालिक क्षेत्र में स्थित बद्दी औद्योगिक बेल्ट का तेज विस्तार आसपास के ग्रामीण इलाकों और पर्यावरण पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन में भूजल के तेजी से घटने, पारंपरिक खेती के प्रभावित होने और औद्योगिक व अन्य जहरीले अपशिष्ट के सिरसा नदी तंत्र तक पहुंचने की गंभीर तस्वीर सामने आई है।
3,256 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड के अध्ययन के अनुसार औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच टकराव बढ़ रहा है। रिपोर्ट में 21 गांवों और करीब 12,000 लोगों को अध्ययन के दायरे में शामिल किया गया है।
21 गांवों और करीब 12 हजार लोगों पर अध्ययन
यह अध्ययन पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के पूर्व निदेशक डॉ. एस.एस. ग्रेवाल ने किया है। रिपोर्ट में बद्दी औद्योगिक क्षेत्र के विस्तार से स्थानीय जल संसाधनों, खेती और ग्रामीण आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत आकलन किया गया।अध्ययन में कहा गया है कि औद्योगिक बोरवेल और सरकारी ट्यूबवेलों से भूजल का दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में कहीं अधिक तेजी से हो रहा है। इनमें से कई ट्यूबवेल और बोरवेल बारहमासी जल निकासी मार्गों के आसपास स्थापित किए गए हैं।
15 वर्षों में कृषि बोरवेलों का जलस्तर 8 से 25 मीटर तक नीचे गया
रिपोर्ट के अनुसार पिछले 15 वर्षों के दौरान किसानों के कृषि बोरवेलों में भूजल स्तर 8 से 25 मीटर तक नीचे चला गया है।
अध्ययन के दौरान 55 कृषि ट्यूबवेलों का सर्वेक्षण किया गया। इनमें से कई ट्यूबवेल सूख चुके हैं, जबकि अन्य में पानी तक पहुंचने के लिए गहरे पाइप और अधिक क्षमता वाले मोटरों की जरूरत पड़ रही है।
किसानों पर बढ़ रहा है आर्थिक बोझ
रिपोर्ट में कहा गया है कि भूजल स्तर में गिरावट के कारण किसानों की खेती की लागत बढ़ रही है। किसानों को अपने बोरवेल और ट्यूबवेल चालू रखने के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार दासौरा, कोटला और झाड़ माजरा जैसे गांवों में भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई किसान अपने जल स्रोतों को चालू रखने के लिए लाखों रुपये खर्च करने को मजबूर हैं।
जल पुनर्भरण से अधिक हो रहा है भूजल का दोहन
वार्षिक जल संतुलन के आकलन में स्थिति और भी चिंताजनक बताई गई है। अध्ययन के अनुसार क्षेत्र में करीब 1,014 हेक्टेयर-मीटर जल का पुनर्भरण हो रहा है, जबकि कुल जल दोहन लगभग 1,278 हेक्टेयर-मीटर तक पहुंच चुका है।
इस प्रकार क्षेत्र में लगभग 264 हेक्टेयर-मीटर का वार्षिक जल घाटा सामने आया है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि वर्तमान स्तर पर भूजल का उपयोग लंबे समय तक जारी रहने पर जल संकट और गंभीर हो सकता है।
सिरसा नदी में पहुंच रहा प्रदूषित पानी
अध्ययन में जल प्रदूषण को भी गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कोटला चोए और अन्य जल निकासी मार्गों से निकलने वाला गहरे रंग और दुर्गंधयुक्त अपशिष्ट जल बालद नदी के रास्ते सिरसा नदी में पहुंच रहा है।
इस अपशिष्ट में आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, निकल और बेरियम जैसे भारी धातु तत्व होने की बात भी अध्ययन में दर्ज की गई है।
सिरसा नदी का यह जल तंत्र आगे पंजाब की ओर बढ़ता है और अंततः सतलुज नदी प्रणाली से जुड़ता है। रिपोर्ट में इस प्रदूषण के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी जताई चिंता
अध्ययन ऐसे समय सामने आया है, जब पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के संबंधित प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों को पत्र लिखकर सिरसा नदी में औद्योगिक और अन्य जहरीले कचरे से हो रहे व्यापक प्रदूषण का मुद्दा उठाया है।
बोर्ड ने चिंता जताई है कि सिरसा नदी में पहुंचने वाला प्रदूषण आगे पंजाब में सतलुज नदी तक पहुंच सकता है। इससे नदी तंत्र और उससे जुड़े जल स्रोतों पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
रोपड़ रामसर वेटलैंड तक पहुंच सकता है प्रदूषण
अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार सिरसा नदी में पहुंचने वाला प्रदूषित जल आगे पंजाब के रोपड़ रामसर वेटलैंड के पर्यावरणीय तंत्र के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है।
रिपोर्ट ने औद्योगिक विकास के साथ भूजल संरक्षण, अपशिष्ट जल प्रबंधन और ग्रामीण पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपायों की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
Key Highlights:
- बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड का क्षेत्रफल 3,256 हेक्टेयर है।
- अध्ययन में 21 गांव और करीब 12,000 लोगों को शामिल किया गया।
- पिछले 15 वर्षों में कृषि बोरवेलों का जलस्तर 8 से 25 मीटर तक गिरा।
- 55 कृषि ट्यूबवेलों का सर्वेक्षण किया गया।
- कई ट्यूबवेल सूख गए, जबकि कई में गहरे पाइप और अधिक क्षमता वाले मोटरों की जरूरत पड़ी।
- वार्षिक जल पुनर्भरण करीब 1,014 हेक्टेयर-मीटर दर्ज किया गया।
- कुल भूजल दोहन लगभग 1,278 हेक्टेयर-मीटर रहा।
- क्षेत्र में करीब 264 हेक्टेयर-मीटर का जल घाटा सामने आया।
- सिरसा नदी तंत्र में भारी धातुओं वाले प्रदूषित पानी की चिंता जताई गई।
- प्रदूषण का असर आगे पंजाब के सतलुज नदी तंत्र और रोपड़ रामसर वेटलैंड तक पहुंचने की आशंका है।
FAQ Section:
Q1. बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड अध्ययन किस क्षेत्र से संबंधित है?
यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में शिवालिक की तलहटी में स्थित 3,256 हेक्टेयर क्षेत्र वाले बद्दी माइक्रो-वॉटरशेड से संबंधित है।
Q2. भूजल स्तर में कितनी गिरावट दर्ज की गई?
अध्ययन के अनुसार पिछले 15 वर्षों के दौरान किसानों के कृषि बोरवेलों में भूजल स्तर 8 से 25 मीटर तक नीचे गया है।
Q3. अध्ययन में कितने गांव शामिल किए गए?
रिपोर्ट में 21 गांवों और करीब 12,000 निवासियों को अध्ययन के दायरे में शामिल किया गया।
Q4. सिरसा नदी में किस प्रकार का प्रदूषण पहुंचने की बात कही गई है?
अध्ययन में औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट जल के साथ आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, निकल और बेरियम जैसी भारी धातुओं के सिरसा नदी तंत्र में पहुंचने की बात दर्ज की गई है।
Q5. भूजल संकट का किसानों पर क्या असर पड़ रहा है?
जलस्तर नीचे जाने से किसानों को गहरे पाइप लगाने, अधिक क्षमता वाले मोटर इस्तेमाल करने और अपने ट्यूबवेलों को चालू रखने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
Conclusion:
बद्दी औद्योगिक बेल्ट के तेजी से विस्तार और उसके साथ बढ़ते भूजल दोहन तथा प्रदूषण ने सोलन जिले के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गंभीर पर्यावरणीय चुनौती पैदा की है। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में भूजल का अधिक दोहन हो रहा है, जबकि प्रदूषित जल सिरसा नदी के माध्यम से पंजाब के जल तंत्र तक पहुंचने की चिंता भी बढ़ रही है। ऐसे में औद्योगिक विकास के साथ प्रभावी जल संरक्षण, भूजल प्रबंधन और औद्योगिक अपशिष्ट के सख्त नियंत्रण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
