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53 साल बाद अपने गांव लौटी पंजाबी लेखक सुखबीर सिंह संधू की किताब ‘पायल’, हर घर तक पहुंची गजल संग्रह की प्रति
कालसियां खुर्द गांव में हुआ ‘पायल’ का दोबारा विमोचन, ग्रामीणों ने पूरे गांव को सजाकर साहित्यकार की विरासत का मनाया जश्न
पंजाबी लेखक सुखबीर सिंह संधू की 1973 में प्रकाशित किताब ‘पायल’ 53 साल बाद उनके पैतृक गांव कालसियां खुर्द में दोबारा प्रकाशित हुई। इस मौके पर हर घर तक किताब की प्रति पहुंचाई गई।
53 साल बाद अपने पैतृक गांव लौटी ‘पायल’
पंजाबी साहित्य के लिए एक भावुक और यादगार पल उस समय देखने को मिला, जब लेखक सुखबीर सिंह संधू की किताब ‘पायल’ प्रकाशन के 53 साल बाद उनके पैतृक गांव कालसियां खुर्द में दोबारा जारी की गई। वर्ष 1973 में पहली बार प्रकाशित हुई यह किताब गजलों का संग्रह है।
इस आयोजन को सिर्फ पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रखा गया। सेवानिवृत्त ईटीओ सुरजीत सिंह संधू ने इसे पूरे गांव की साझा साहित्यिक विरासत के उत्सव में बदलने की पहल की। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किताब की एक प्रति गांव के हर घर तक पहुंचे।पंजाबी लोक विरासत अकादमी ने कराया पुनर्प्रकाशन
‘पायल’ के पुनर्प्रकाशन की पहल लुधियाना की पंजाबी लोक विरासत अकादमी ने की। 53 साल बाद किताब को दोबारा प्रकाशित किए जाने की खबर जब गांव के लोगों तक पहुंची तो ग्रामीणों ने इसे अपने लिए गौरव का अवसर माना।
सुरजीत सिंह संधू ने आयोजन को यादगार बनाने के लिए गांव को विशेष रूप से सजाया। पूरे गांव में शामियाने लगाए गए और माहौल को उत्सव जैसा रूप दिया गया।
हर घर तक पहुंची किताब की प्रति
इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि गांव के प्रत्येक परिवार को ‘पायल’ की एक प्रति उपलब्ध कराई गई। इस तरह किताब का पुनर्विमोचन केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम न रहकर पूरे गांव की सामूहिक भागीदारी वाला समारोह बन गया।
गांव के लोगों ने बड़ी संख्या में कार्यक्रम में पहुंचकर अपने गांव से जुड़े साहित्यकार की उपलब्धि का जश्न मनाया।
सुखबीर सिंह संधू की गजल को पाकिस्तान के प्रसिद्ध गायकों ने भी गाया
वर्ष 1932 में जन्मे सुखबीर सिंह संधू पंजाबी साहित्य में अपनी गजलों के लिए जाने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध गजल “उस बेवफा दी याद विच रोया करां के ना” को कई चर्चित पाकिस्तानी गायकों ने भी अपनी आवाज दी।
इस गजल को नुसरत फतेह अली खान, नजाकत अली, मर्तब अली, नसीबो लाल और अकरम राही समेत कई प्रसिद्ध गायकों ने प्रस्तुत किया।
गांव के लिए साहित्यकार की उपलब्धि बनी साझा विरासत
किताब के पुनर्विमोचन के अवसर पर सुरजीत सिंह संधू ने कहा कि गांव के लिए यह गर्व की बात है कि इसी मिट्टी में जन्मे लेखक की किताब को उनके अपने गांव के लोगों के सामने दोबारा प्रस्तुत किया गया।
उन्होंने कहा कि जब किसी गांव की मिट्टी से निकला व्यक्ति अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य में पहचान बनाता है, तो उसकी उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, बल्कि पूरे गांव की साझा विरासत बन जाती है।
Key Highlights:
• ‘पायल’ पहली बार वर्ष 1973 में प्रकाशित हुई थी।
• 53 साल बाद किताब का दोबारा प्रकाशन किया गया।
• इसका पुनर्प्रकाशन पंजाबी लोक विरासत अकादमी, लुधियाना ने कराया।
• किताब को सुखबीर सिंह संधू के पैतृक गांव कालसियां खुर्द में दोबारा जारी किया गया।
• ‘पायल’ गजलों का संग्रह है।
• आयोजन में गांव के हर घर तक किताब की प्रति पहुंचाई गई।
• सुखबीर सिंह संधू का जन्म वर्ष 1932 में हुआ था।
• उनकी प्रसिद्ध गजल “उस बेवफा दी याद विच रोया करां के ना” को कई पाकिस्तानी गायकों ने गाया है।
FAQ Section:
‘पायल’ किताब कब प्रकाशित हुई थी?
सुखबीर सिंह संधू की किताब ‘पायल’ पहली बार वर्ष 1973 में प्रकाशित हुई थी।
‘पायल’ का 53 साल बाद दोबारा विमोचन कहां हुआ?
किताब का पुनर्विमोचन लेखक के पैतृक गांव कालसियां खुर्द में किया गया।
‘पायल’ किस प्रकार की किताब है?
‘पायल’ पंजाबी गजलों का संग्रह है।
‘पायल’ को दोबारा किस संस्था ने प्रकाशित किया?
लुधियाना की पंजाबी लोक विरासत अकादमी ने 53 साल बाद किताब को दोबारा प्रकाशित कराया।
सुखबीर सिंह संधू की प्रसिद्ध गजल कौन सी है?
उनकी प्रसिद्ध गजलों में “उस बेवफा दी याद विच रोया करां के ना” शामिल है, जिसे कई प्रसिद्ध पाकिस्तानी गायकों ने भी प्रस्तुत किया।
Conclusion:
सुखबीर सिंह संधू की ‘पायल’ का 53 साल बाद उनके पैतृक गांव में लौटना केवल एक किताब का पुनर्प्रकाशन नहीं, बल्कि साहित्यिक विरासत से जुड़ने का भावुक अवसर रहा। ग्रामीणों ने पूरे गांव को सजाकर और हर घर तक किताब पहुंचाकर यह साबित किया कि किसी लेखक की उपलब्धि उसके गांव और समाज की साझा धरोहर बन सकती है। कालसियां खुर्द में हुआ यह आयोजन पंजाबी साहित्य और अपनी जड़ों से जुड़ाव की एक अनूठी मिसाल बन गया।
