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एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को किया तलब
हाईकोर्ट ने मांगा ठोस नीति ढांचा, कहा- सिर्फ एकमुश्त मुआवजा नहीं, आजीवन सहायता जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और सहायता को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने राज्य के गृह और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिवों को 25 मई को पेश होने का निर्देश दिया है।
एसिड अटैक पीड़ितों के लिए नीति न बनने पर हाईकोर्ट नाराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और दीर्घकालिक सहायता को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि घटना के नौ साल बाद भी राज्य सरकार पीड़ितों के लिए कोई व्यापक और संरचित सहायता प्रणाली तैयार नहीं कर सकी है।
कोर्ट ने राज्य के गृह विभाग और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिवों को 25 मई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है।
मुआवजे के साथ आजीवन सहायता पर जोर
खंडपीठ ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों की जिंदगी केवल एकमुश्त आर्थिक सहायता से सामान्य नहीं हो सकती। पीड़ितों को आजीवन चिकित्सा, मानसिक सहयोग, शिक्षा और रोजगार सहायता की आवश्यकता होती है।कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि पीड़ितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि को चोट की गंभीरता और आजीवन प्रभाव के आधार पर किस तरह तार्किक बनाया जाएगा।
पुनर्वास के लिए मांगा विस्तृत रोडमैप
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सरकार से एक विस्तृत नीति ढांचा पेश करने को कहा है।
Court ने इन बिंदुओं पर मांगी जानकारी:
- मुआवजा नीति का पुनर्गठन
- चिकित्सा उपचार की व्यवस्था
- रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की सुविधा
- काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता
- शिक्षा और रोजगार सहायता
- दीर्घकालिक पुनर्वास योजना
सरकार की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
14 मई के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद सरकार संतोषजनक जवाब देने में असफल रही है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तक ऐसा कोई ठोस प्रयास नजर नहीं आया, जिससे यह लगे कि राज्य सरकार एसिड अटैक पीड़ितों के लिए समयबद्ध और प्रभावी नीति बनाने को गंभीरता से ले रही है।
पीड़िता की याचिका पर हो रही सुनवाई
यह मामला एक एसिड अटैक सर्वाइवर द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। पीड़िता ने राज्य सरकार से पुनर्वास और दीर्घकालिक सहायता की मांग की थी।
कोर्ट ने माना कि एसिड अटैक पीड़ितों को केवल आर्थिक मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से पुनर्स्थापित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
महिलाओं की सुरक्षा और पुनर्वास पर बढ़ी बहस
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि पीड़ितों के लिए स्थायी सहायता नीति समय की जरूरत है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
Key Highlights:
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई फटकार
- एसिड अटैक पीड़ितों के लिए व्यापक नीति न होने पर नाराजगी
- गृह और महिला कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव तलब
- कोर्ट ने मांगा पुनर्वास और मुआवजा नीति का रोडमैप
- चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार सहायता पर जोर
- 25 मई को अधिकारियों को पेश होने का आदेश
FAQ Section:
Q1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस मामले में सख्ती दिखाई है?
कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और सहायता नीति को लेकर सख्ती दिखाई है।
Q2. किन अधिकारियों को तलब किया गया है?
गृह विभाग और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिवों को तलब किया गया है।
Q3. कोर्ट ने सरकार से क्या मांगा है?
कोर्ट ने मुआवजा, पुनर्वास, चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार सहायता की विस्तृत नीति मांगी है।
Q4. यह सुनवाई किस याचिका पर हो रही है?
यह सुनवाई एक एसिड अटैक सर्वाइवर द्वारा दाखिल पुनर्वास याचिका पर हो रही है।
Q5. कोर्ट ने सरकार की किस बात पर नाराजगी जताई?
कोर्ट ने कहा कि नौ साल बाद भी सरकार व्यापक सहायता प्रणाली तैयार नहीं कर सकी।
Conclusion:
इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और सहायता व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल आर्थिक मदद पर्याप्त नहीं, बल्कि पीड़ितों के लिए दीर्घकालिक और संरचित सहायता प्रणाली आवश्यक है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार कोर्ट के निर्देशों के बाद क्या ठोस कदम उठाती है।

