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इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती के बीच यूपी में हूटर और प्रेशर हॉर्न पर पुरानी नाकाम नीति फिर चर्चा में
2014 की प्रस्तावित सख्त व्यवस्था अब तक लागू नहीं, अवैध हूटर और शोर प्रदूषण पर कमजोर कार्रवाई पर अदालत ने मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवैध हूटर और प्रेशर हॉर्न के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए यूपी सरकार से पिछले पांच वर्षों की कार्रवाई का ब्यौरा मांगा है। इससे 2014 की अधूरी रह गई सख्त नियामक योजना फिर चर्चा में आ गई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी, जिसमें अवैध हूटर और प्रेशर हॉर्न के व्यापक इस्तेमाल पर चिंता जताई गई है, ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के दशक पुराने लेकिन कमजोर रूप से लागू किए जा रहे नियामक ढांचे को उजागर कर दिया है। इसमें 2014 में तैयार की गई एक महत्वाकांक्षी योजना भी शामिल है, जो अब तक लागू नहीं हो सकी।
सख्त प्रवर्तन की आवश्यकता पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि शोर प्रदूषण पर नियंत्रण अब बेहद जरूरी हो गया है। इस संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 16 मार्च को अधिकारियों से पिछले पांच वर्षों में अवैध हूटर और संशोधित साइलेंसर/प्रेशर हॉर्न के निर्माण और बिक्री पर की गई कार्रवाई का विवरण मांगा।
सूत्रों के अनुसार, इस व्यवस्था के कमजोर प्रवर्तन का एक कारण यह भी माना जाता है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों में कुछ लोग वही होते हैं जो इन नियमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
हाईकोर्ट की टिप्पणी उस चिंता से मेल खाती है, जिसके चलते राज्य परिवहन विभाग ने 2014 में एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया था। यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में दायर एक विशेष याचिका के बाद आया था, जिसमें वीआईपी वाहनों के नियमों के सख्त पालन की मांग की गई थी।
उस समय सरकार ने एक व्यापक योजना बनाई थी, जिसका उद्देश्य केवल प्रतिबंध लागू करना ही नहीं, बल्कि हूटर, बीकन और इसी तरह के उपकरणों की बिक्री और खरीद को नियंत्रित करना भी था। माना गया था कि खुले बाजार में इनकी उपलब्धता से दुरुपयोग बढ़ रहा है।
प्रस्ताव के अनुसार, हूटर और बीकन केवल राज्य कर्मचारी कल्याण निगम के डिपो के माध्यम से ही बेचे जाने थे, और खरीददारों को क्षेत्रीय सहायक परिवहन अधिकारी (ARTO) से अनुमति पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होता।
इसके अलावा, जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समितियां बनाने की योजना थी, जो बिक्री और इंस्टॉलेशन की निगरानी करतीं और उल्लंघन पर कार्रवाई करतीं। साथ ही राज्य स्तर पर एक उच्च स्तरीय समिति भी प्रस्तावित थी, जो गृह, परिवहन, यातायात और सामान्य प्रशासन विभागों के बीच समन्वय स्थापित करती।
उस समय अधिकारियों ने स्वीकार किया था कि बिना अनुमति के हूटर के उपयोग को रोकना मुश्किल हो रहा था, खासकर उन लोगों द्वारा जो नियमों के पात्र नहीं थे, जबकि सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे उल्लंघनों पर सख्त रुख अपना चुका था।
हालांकि मंशा के बावजूद यह प्रस्ताव कभी लागू नहीं हो सका और राज्य में प्रवर्तन केवल रूटीन जांच और कभी-कभार की जाने वाली कार्रवाई तक सीमित रह गया, जबकि खुले बाजार में इन उपकरणों की बिक्री जारी रही।
पूर्व अतिरिक्त परिवहन आयुक्त (प्रवर्तन) ए.के. पांडे ने याद करते हुए कहा कि हूटर और बीकन की बिक्री को नियंत्रित करने का प्रस्ताव चर्चा में आया था, लेकिन अंततः इसे कानून का रूप नहीं दिया जा सका।
10 जनवरी 2017 को तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर ने एक सरकारी आदेश जारी कर कहा था कि प्रेशर हॉर्न और मल्टी-टोन हॉर्न पूरी तरह प्रतिबंधित हैं और इन्हें सरकारी वाहनों से हटाने का निर्देश दिया गया था, साथ ही उल्लंघन पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
इसके पहले 10 मार्च 2014 को सरकार ने एक आदेश में स्पष्ट किया था कि हूटर केवल आपातकालीन वाहनों जैसे एम्बुलेंस, फायर सर्विस, आपदा प्रबंधन और पुलिस व परिवहन विभाग के वाहनों के लिए ही आपात स्थिति में उपयोग किए जा सकते हैं, नियमित उपयोग के लिए नहीं।
हालांकि इन आदेशों का सीमित अनुपालन ही हुआ और सड़कों पर हूटर और प्रेशर हॉर्न का दुरुपयोग जारी रहा, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर होती गई।
