2012 मूर्ति विसर्जन दंगा मामले में बीजेपी विधायक रामचंद्र यादव को हाईकोर्ट से राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकदमा वापस लेने की राज्य सरकार की याचिका खारिज करने वाला निचली अदालत का आदेश रद्द किया

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 2012 के मूर्ति विसर्जन दंगा मामले में भाजपा विधायक रामचंद्र यादव के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की राज्य सरकार की मांग को मंजूरी दे दी है। अदालत ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या जिले की रुदौली सीट से भाजपा विधायक Ram Chander Yadav को बड़ी राहत देते हुए 2012 के मूर्ति विसर्जन दंगा मामले में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे को वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका को मंजूरी दे दी है।

हाईकोर्ट ने उस ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार की अभियोजन वापसी की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

न्यायमूर्ति Rajeev Singh की एकल पीठ ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि लोक अभियोजक द्वारा ट्रायल कोर्ट में दायर आवेदन “रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के सावधानीपूर्वक अध्ययन और सद्भावना” के आधार पर किया गया था।

यह आदेश 4 मई को पारित किया गया। अदालत में यह सुनवाई विधायक रामचंद्र यादव द्वारा दायर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत याचिका और उत्तर प्रदेश सरकार की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर हुई।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता VK Shahi ने पक्ष रखा।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 24 अक्टूबर 2012 को मूर्ति विसर्जन के लिए जा रहे ट्रैक्टरों के कारण रुदौली थाने के सामने जाम लग गया था। पुलिस द्वारा आगे बढ़ने के निर्देश दिए जाने के बावजूद ट्रैक्टर चालक आगे नहीं बढ़े।

आरोप था कि रामचंद्र यादव ने उन्हें निर्देश दिया था कि वे मूर्तियों के साथ वहीं रुकें, जब तक वह स्वयं मौके पर न पहुंच जाएं। इसके बाद वहां बड़ी संख्या में भीड़ जमा हो गई।

बताया गया कि मौके पर पहुंचने के बाद यादव ने पुलिस को बताया कि जुलूस जब एक मस्जिद के पास से गुजर रहा था, तब दूसरे समुदाय के एक युवक पर गलती से रंग लग गया, जिसके बाद विवाद हो गया और इस दौरान एक मूर्ति क्षतिग्रस्त हो गई।

एफआईआर में आरोप लगाया गया कि यादव ने आक्रामक बयान देते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और कहा कि कार्रवाई होने तक जुलूस आगे नहीं बढ़ेगा।

हालांकि बाद में उनके कहने पर ट्रैक्टर आगे बढ़ गए, लेकिन तब तक वहां करीब 2,000 से 3,000 लोगों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी।

एफआईआर में यह भी आरोप लगाया गया कि उनके उकसावे के बाद लगभग 250-300 लोग उस गांव की ओर बढ़े जहां विवाद हुआ था। वहां उन्होंने दूसरे समुदाय के लोगों पर पथराव किया और पुलिसकर्मियों पर हमला किया, जिससे कई लोग घायल हो गए।

इसके बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

जून 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में अभियोजन वापस लेने का आदेश जारी किया था, लेकिन अक्टूबर 2021 में ट्रायल कोर्ट ने लोक अभियोजक की अर्जी खारिज कर दी थी। अब हाईकोर्ट ने उस आदेश को निरस्त कर दिया है।

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Edited By: Karan Singh

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