दिल्ली की सड़कों पर जिंदगी खींचता एक जज़्बा: रिक्शा चालक लखी साहू की कहानी

करीब 70 वर्ष की उम्र में भी मेहनत, जिम्मेदारियों और उम्मीद के सहारे जीवन जी रहे हैं दरभंगा के लखी साहू

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दिल्ली में 1984 से रिक्शा चला रहे लखी साहू ने अपने जीवन के संघर्ष, परिवार, आस्था और गांव से जुड़े भावनात्मक रिश्ते को साझा किया। आर्थिक परेशानियों और बढ़ती उम्र के बावजूद उनका हौसला आज भी कायम है।

“मैंने अपनी जिंदगी का ज़्यादातर हिस्सा दिल्ली में बिताया है। लेकिन अगर सच में कहीं रहना चाहूँ, तो अपने गांव दरभंगा में। इंसान का दिल आखिर अपनी मिट्टी में ही बसता है,” कहते हैं लखी साहू।

करीब चार दशक से दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चला रहे लखी साहू अपने यात्रियों के साथ-साथ जिंदगी का बोझ भी ढोते आए हैं। निजी नुकसान, परिवार की बीमारियों और आर्थिक तंगी के बावजूद उनके शब्दों में शिकायत नहीं, बल्कि संघर्ष से जन्मी मजबूती दिखाई देती है।

लगभग 70 वर्षीय लखी साहू मूल रूप से बिहार के दरभंगा के रहने वाले हैं। उन्हें सबसे ज्यादा दुख अपने पुश्तैनी जमीन के खोने का है। वे कहते हैं, “गांव की जमीन छिन जाने का दुख मेरी शख्सियत का हिस्सा बन चुका है।”

अपने जीवन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत के रूप में वे अपनी पत्नी सुशीला देवी का नाम लेते हैं। उनके अनुसार, “वह बहुत पूजा-पाठ करती हैं, व्रत रखती हैं। मेरी जिंदगी चाहे मुश्किलों से भरी हो, लेकिन मैं चाहता हूं कि उनकी जिंदगी में दुख न हो।”

खुशी की उनकी परिभाषा बेहद सरल है। वे कहते हैं कि जब उन्हें अपने भीतर भगवान की उपस्थिति महसूस होती है, तभी सच्ची खुशी मिलती है। वहीं दुख उनके लिए रोजमर्रा की चिंता है — पैसों की चिंता, परिवार की बीमारी और इलाज का खर्च।

हाल ही में उनकी पत्नी के पैर में चोट लग गई और उन्हें लगातार खांसी की भी समस्या रहती है। लखी साहू बताते हैं कि जो भी कमाई होती है, उसका बड़ा हिस्सा गांव में दवाइयों और इलाज पर चला जाता है।

एक दिन में 600 रुपये कमाने के बाद भी 140 रुपये का खाना उन्हें भारी लगता है, क्योंकि हर रुपये के पीछे परिवार की जरूरतें जुड़ी होती हैं।

जब उनसे पूछा गया कि उन्हें कौन-सी प्राकृतिक प्रतिभा चाहिए, तो उन्होंने धन-दौलत नहीं मांगी। उनका जवाब था — “बस इस बूढ़े शरीर में इतनी ताकत बनी रहे कि मैं रिक्शा खींचता रहूं।”

लखी साहू की कहानी उन लाखों प्रवासी मजदूरों की सच्चाई को सामने लाती है, जो शहरों की रफ्तार को चलाते हैं, लेकिन खुद गुमनामी और संघर्ष भरी जिंदगी जीते हैं।

 
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Edited By: Karan Singh

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