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कारगिल विजय दिवस: 27 साल बाद भी अमर है शहीद ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया की वीरता, परिवार की आंखें आज भी हो जाती हैं नम
फतेहाबाद के धानी दौलत गांव के शहीद ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया ने ऑपरेशन विजय के दौरान देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, परिवार आज भी उनके नाम पर भव्य स्मारक की मांग कर रहा है।
कारगिल विजय दिवस पर फतेहाबाद के धानी दौलत गांव के शहीद ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया की वीरगाथा एक बार फिर लोगों की स्मृतियों में ताजा हो गई। 1999 के कारगिल युद्ध में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सपूत को आज भी उनका परिवार गर्व और भावुकता के साथ याद करता है।
कारगिल विजय दिवस पर फिर ताजा हुई शहीद मनोहर लाल मवालिया की यादें
हर वर्ष कारगिल विजय दिवस के अवसर पर फतेहाबाद जिले के धानी दौलत गांव में शहीद ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया की यादें फिर जीवंत हो उठती हैं। उनके परिवार के लिए यह दिन गर्व के साथ-साथ भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। शहादत के 27 वर्ष बाद भी माता-पिता उस पल को नहीं भूल पाए हैं, जब उनका बेटा तिरंगे में लिपटकर अंतिम बार घर लौटा था।
परिजनों का कहना है कि मनोहर लाल बचपन से ही देश सेवा का सपना देखते थे और उसी संकल्प ने उन्हें भारतीय सेना तक पहुंचाया।
बचपन से था सेना में जाने का सपना

परिवार उनके विवाह की तैयारियों में जुटा हुआ था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। देश सेवा का उनका सपना अंततः सर्वोच्च बलिदान में बदल गया।
ऑपरेशन विजय के दौरान दिया सर्वोच्च बलिदान
13 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय में द्रास सेक्टर में दुश्मन से मुकाबला करते हुए ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया वीरगति को प्राप्त हो गए।
शहादत के पांच दिन बाद परिवार को उनका लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति पत्र मिला। यह पल परिवार के लिए एक ओर गर्व का था तो दूसरी ओर अपार दुख लेकर आया।
परिवार के लिए आज भी प्रेरणा हैं शहीद मनोहर लाल
शहीद के छोटे भाई राजेश कुमार मवालिया और अन्य परिजनों का कहना है कि मनोहर लाल आज भी पूरे परिवार के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा हैं।
परिवार के सदस्य प्रतिदिन उनकी तस्वीर के सामने दीप जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके आदर्शों को याद करते हैं।
सरकार ने किया सम्मान, अब भी भव्य स्मारक की मांग
परिवार ने बताया कि सरकार ने शहीद के सम्मान में गैस एजेंसी आवंटित की और उनके छोटे भाई को सरकारी नौकरी प्रदान की।
इसके अलावा धानी दौलत के सरकारी विद्यालय का नाम शहीद मनोहर लाल मवालिया के नाम पर रखा गया है तथा एक पुस्तकालय भी उनके नाम से संचालित है।
हालांकि परिवार की लंबे समय से मांग है कि फतेहाबाद जिला मुख्यालय में शहीद की स्मृति में एक भव्य स्मारक, पार्क या शैक्षणिक संस्थान स्थापित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें।
कारगिल के वीरों का बलिदान हमेशा रहेगा अमर
कारगिल विजय दिवस केवल एक ऐतिहासिक जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि उन वीर सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को नमन करने का अवसर भी है, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। शहीद मनोहर लाल मवालिया की वीरता आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
Key Highlights:
- कारगिल विजय दिवस पर शहीद मनोहर लाल मवालिया को श्रद्धांजलि।
- 13 जून 1999 को द्रास सेक्टर में ऑपरेशन विजय के दौरान हुए थे शहीद।
- शहादत के पांच दिन बाद परिवार को मिला लेफ्टिनेंट पद का नियुक्ति पत्र।
- सरकार ने गैस एजेंसी, सरकारी नौकरी और स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा।
- परिवार आज भी फतेहाबाद में भव्य स्मारक या शैक्षणिक संस्थान की मांग कर रहा है।
FAQ Section:
प्रश्न 1: शहीद मनोहर लाल मवालिया किस जिले के रहने वाले थे?
उत्तर: वे हरियाणा के फतेहाबाद जिले के धानी दौलत गांव के निवासी थे।
प्रश्न 2: उन्होंने कब शहादत दी?
उत्तर: 13 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय में द्रास सेक्टर में लड़ते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।
प्रश्न 3: शहादत के बाद परिवार को क्या मिला?
उत्तर: शहादत के पांच दिन बाद परिवार को उनका लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्ति पत्र प्राप्त हुआ।
प्रश्न 4: सरकार ने उनके सम्मान में क्या कदम उठाए?
उत्तर: सरकार ने परिवार को गैस एजेंसी आवंटित की, छोटे भाई को सरकारी नौकरी दी, सरकारी स्कूल और एक पुस्तकालय का नाम उनके नाम पर रखा।
प्रश्न 5: परिवार की वर्तमान मांग क्या है?
उत्तर: परिवार फतेहाबाद जिला मुख्यालय में शहीद के नाम पर भव्य स्मारक, पार्क या शैक्षणिक संस्थान बनाए जाने की मांग कर रहा है।
Conclusion:
कारगिल विजय दिवस पर शहीद ग्रेनेडियर मनोहर लाल मवालिया की वीरगाथा देशभक्ति, साहस और सर्वोच्च बलिदान की मिसाल बनकर सामने आती है। उनके बलिदान को सम्मान देने के लिए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन परिवार आज भी एक भव्य स्मारक की उम्मीद लगाए बैठा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस वीर सपूत के अदम्य साहस से प्रेरणा ले सकें।

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