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हरियाणा के राखीगढ़ी महोत्सव में उमड़े एक लाख लोग, हड़प्पा सभ्यता की विरासत ने खींचा ध्यान
19 से 25 अक्टूबर तक आयोजित सात दिवसीय महोत्सव में 5,000 से 6,000 स्कूली विद्यार्थियों ने लिया हिस्सा; ग्रामीण महिलाओं ने हड़प्पा कला से प्रेरित दरियां बनाकर दिखाई पारंपरिक हुनर की झलक
हरियाणा के राखीगढ़ी गांव में आयोजित सात दिवसीय राखीगढ़ी महोत्सव में अनुमानित एक लाख लोग पहुंचे। 19 से 25 अक्टूबर तक चले इस आयोजन में हड़प्पा सभ्यता की पुरातात्विक विरासत, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, विद्यार्थियों की शैक्षणिक गतिविधियों और ग्रामीण महिलाओं की पारंपरिक बुनाई को प्रमुखता दी गई। महोत्सव ने प्राचीन संस्कृति को समझने के साथ स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की संभावनाएं भी सामने रखीं।
हरियाणा के हिसार क्षेत्र स्थित राखीगढ़ी गांव में आयोजित सात दिवसीय राखीगढ़ी महोत्सव ने बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकर्षित किया। हरियाणा पुरातत्व विभाग और हांसी जिला प्रशासन की ओर से 19 से 25 अक्टूबर तक आयोजित इस महोत्सव में अनुमानित एक लाख आगंतुक पहुंचे। इनमें पुरातत्व विशेषज्ञ, विद्यार्थी और हरियाणा के विभिन्न हिस्सों से आए लोग शामिल थे।
महोत्सव का मुख्य उद्देश्य हड़प्पा सभ्यता से जुड़े पुरातात्विक अवशेषों और सांस्कृतिक विरासत को लोगों तक पहुंचाना था। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, शैक्षणिक भ्रमण और पारंपरिक हस्तकला से जुड़ी गतिविधियां भी आयोजित की गईं।
हड़प्पा सभ्यता को करीब से समझने पहुंचे विद्यार्थी
हरियाणा पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक नरेंद्र परमार के अनुसार, महोत्सव में विभिन्न स्कूलों के लगभग 5,000 से 6,000 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। विद्यार्थियों को प्राचीन सभ्यता के अवशेषों और उसकी सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानने का अवसर मिला।
राखीगढ़ी हड़प्पा सभ्यता से जुड़े प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में शामिल है। यहां आयोजित महोत्सव ने विद्यार्थियों और आम लोगों को इतिहास को पुस्तकों से बाहर निकलकर समझने का अवसर दिया।
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जुटे पुरातत्व विशेषज्ञ
महोत्सव के दौरान आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से लगभग 70 पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। सम्मेलन में राखीगढ़ी और सरस्वती-सिंधु सभ्यता से संबंधित विषयों पर चर्चा की गई। कुछ अन्य देशों के विशेषज्ञ भी ऑनलाइन माध्यम से चर्चा में शामिल हुए।
इस तरह महोत्सव ने पुरातात्विक विरासत को प्रदर्शित करने के साथ शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श का मंच भी उपलब्ध कराया।
नरेंद्र परमार ने बताया कि यह महोत्सव का तीसरा संस्करण था और इसे हर साल आयोजित करने की योजना है।
हड़प्पा कला से प्रेरित दरियां बनीं आकर्षण का केंद्र
इस वर्ष महोत्सव की एक खास पहल ग्रामीण महिलाओं की पारंपरिक बुनाई को बढ़ावा देना रही। राखीगढ़ी की महिलाओं ने हड़प्पा कला और संस्कृति से प्रेरित डिजाइन वाली दरियां तैयार कीं।
इन दरियों में प्राचीन सभ्यता से जुड़े कलात्मक तत्वों को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। तैयार की गई दरियां भारत और विदेश से आए मेहमानों तथा आगंतुकों को उपहार के रूप में भी दी गईं।
इस पहल ने स्थानीय हस्तकला को राखीगढ़ी की ऐतिहासिक पहचान से जोड़ने का अवसर दिया और ग्रामीण महिलाओं के हुनर को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
गांव के पूर्व सरपंच दिनेश श्योराण ने बताया कि वह पिछले 15 वर्षों से राखीगढ़ी की महिलाओं को पारंपरिक कला और हस्तकला के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं में हुनर की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें उचित मंच और आय अर्जित करने के अवसरों से जोड़ना जरूरी है। उनका उद्देश्य है कि महिलाएं अपने गांव में ही रोजगार हासिल कर सकें और काम की तलाश में दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर न हों।
हड़प्पा शैली से प्रेरित दरियां बनाने की पहल इसी सोच का हिस्सा है। इससे महिलाओं की पारंपरिक कला को नया बाजार मिल सकता है और उनकी आमदनी बढ़ाने की संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।
कॉलेज और ITI के विद्यार्थियों ने सीखी बुनाई
इस पहल में कॉलेज और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) के विद्यार्थियों को भी शामिल किया गया। ग्रामीण महिलाओं ने विद्यार्थियों को हड़प्पा कला से प्रेरित दरियां बुनने की तकनीक सिखाई।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस गतिविधि में हर दिन लगभग 20 विद्यार्थी शामिल होते थे। उन्होंने पारंपरिक बुनाई की तकनीक सीखने के साथ यह भी जाना कि प्राचीन सभ्यता से प्रेरित डिजाइन को नए उत्पादों में कैसे शामिल किया जा सकता है।
इससे पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और हस्तकला को नए रचनात्मक प्रयोगों से जोड़ने का अवसर मिला।
रोहतक विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी किया भ्रमण
रोहतक स्थित दादा लख्मी चंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (DLCSUPVA) के विद्यार्थियों ने भी राखीगढ़ी का दौरा किया।
विश्वविद्यालय के वास्तुकला और दृश्य कला संकायों के विद्यार्थियों के प्रतिनिधिमंडल ने पुरातात्विक स्थल का भ्रमण किया, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लिया और वहां मौजूद ऐतिहासिक अवशेषों को देखा।
इस शैक्षणिक भ्रमण ने विद्यार्थियों को पुरातत्व, वास्तुकला, दृश्य कला और सांस्कृतिक विरासत के बीच संबंधों को समझने का अवसर प्रदान किया।
Key Highlights
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राखीगढ़ी महोत्सव 19 से 25 अक्टूबर तक आयोजित किया गया।
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महोत्सव में अनुमानित एक लाख लोग पहुंचे।
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लगभग 5,000 से 6,000 स्कूली विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
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देशभर के लगभग 70 पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया।
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ग्रामीण महिलाओं ने हड़प्पा कला से प्रेरित दरियां तैयार कीं।
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कॉलेज और ITI के विद्यार्थियों को पारंपरिक बुनाई का प्रशिक्षण दिया गया।
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दिनेश श्योराण पिछले 15 वर्षों से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास कर रहे हैं।
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महोत्सव का तीसरा संस्करण आयोजित हुआ और इसे सालाना जारी रखने की योजना है।
FAQ Section
1. राखीगढ़ी महोत्सव कब आयोजित किया गया?
यह महोत्सव 19 से 25 अक्टूबर तक सात दिनों के लिए आयोजित किया गया।
2. महोत्सव में कितने लोग पहुंचे?
हरियाणा पुरातत्व विभाग के अनुसार, महोत्सव में अनुमानित एक लाख लोग पहुंचे।
3. राखीगढ़ी महोत्सव का मुख्य उद्देश्य क्या था?
इसका उद्देश्य हड़प्पा सभ्यता के पुरातात्विक अवशेषों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा विद्यार्थियों और आम लोगों को इस ऐतिहासिक स्थल से जोड़ना था।
4. महोत्सव में ग्रामीण महिलाओं ने क्या खास किया?
राखीगढ़ी की महिलाओं ने हड़प्पा कला और संस्कृति से प्रेरित डिजाइन वाली दरियां बनाईं। इस पहल का उद्देश्य उनकी पारंपरिक कला को पहचान दिलाना और रोजगार के अवसर बढ़ाना था।
5. महोत्सव में कितने पुरातत्व विशेषज्ञ शामिल हुए?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देशभर से लगभग 70 पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया। कुछ विदेशी विशेषज्ञ ऑनलाइन भी जुड़े।
6. महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
दिनेश श्योराण के नेतृत्व में पारंपरिक हस्तकला को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाओं को बुनाई के माध्यम से आय अर्जित करने और अपने गांव में रोजगार पाने के अवसरों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
Conclusion
राखीगढ़ी महोत्सव ने हड़प्पा सभ्यता की विरासत को लोगों के सामने लाने के साथ शिक्षा, शोध और पारंपरिक हस्तकला को भी एक मंच दिया। बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और विशेषज्ञों की भागीदारी ने इस स्थल के शैक्षणिक महत्व को रेखांकित किया। वहीं, हड़प्पा कला से प्रेरित दरियां बनाने की पहल ने ग्रामीण महिलाओं के कौशल को रोजगार और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने की संभावनाएं दिखाई हैं।

