दौरे के दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों और प्रगतिशील कृषकों के साथ संवाद कर प्राकृतिक खेती तथा पशुपालन आधारित कृषि मॉडल की व्यवहारिक जानकारी हासिल की। यह जानकारी पूर्व प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र एवं डेयरी प्रशिक्षण केंद्र, National Dairy Research Institute (एनडीआरआई) डॉ. Dalip Gosain ने दी।
किसानों को संबोधित करते हुए डॉ. गोसाईं ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियां प्राकृतिक खेती के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। उन्होंने बताया कि विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियां और छोटी जोतों की संरचना राज्य को कम लागत और टिकाऊ कृषि प्रणालियों के लिए उपयुक्त बनाती है।
उन्होंने जानकारी दी कि हिमाचल प्रदेश में लगभग दो लाख कृषक परिवार करीब 38,000 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हिमाचल प्राकृतिक उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल है। राज्य सरकार द्वारा मक्का के लिए 40 रुपये प्रति किलोग्राम, गेहूं के लिए 60 रुपये प्रति किलोग्राम तथा कच्ची हल्दी के लिए 90 रुपये प्रति किलोग्राम का एमएसपी निर्धारित किया गया है, जिससे किसानों को रसायन-मुक्त खेती की ओर प्रोत्साहन मिल रहा है।
डॉ. गोसाईं ने किसानों को साहीवाल, गिर और राठी जैसी देशी नस्ल की गायों को पालने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इन नस्लों का गोबर और गौमूत्र प्राकृतिक खेती के प्रमुख घटक हैं और इनके उपयोग से मिट्टी की उर्वरता व उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।
दौरे के दौरान किसानों ने टिकाऊ कृषि मॉडल, जैविक इनपुट निर्माण, फसल विविधीकरण और पशुधन आधारित आय सृजन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी प्राप्त की। किसानों ने इस अध्ययन भ्रमण को ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि इससे उन्हें अपने क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को और प्रभावी ढंग से अपनाने में सहायता मिलेगी।

