जालंधर में 70 साल पुरानी रामलीला की परंपरा कायम, नौकरी और कारोबार छोड़ रामायण के किरदार निभाते हैं स्थानीय लोग

सोडल रोड पर 12 से 20 अक्टूबर तक रामलीला का आयोजन, 25 से अधिक कलाकार ले रहे हिस्सा; परिवारों के लिए आस्था और गर्व का प्रतीक बनी परंपरा

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पंजाब के जालंधर में सोडल रोड की 70 साल पुरानी रामलीला परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है। निजी नौकरियों और कारोबार से जुड़े 25 से अधिक कलाकार कई सप्ताह की तैयारी के बाद रामायण के पात्र निभाते हैं। यह आयोजन निःशुल्क किया जाता है।

पंजाब के जालंधर में सोडल रोड पर हर साल रामलीला के दौरान कुछ दिनों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की रफ्तार बदल जाती है। कोई अपनी दुकान और कारोबार छोड़कर मंच पर उतरता है, तो कोई नौकरी से समय निकालकर रामायण के किरदार निभाता है। करीब 70 साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों की आस्था, समर्पण और पारिवारिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है।

सोडल रोड स्थित रामलीला मैदान में 12 से 20 अक्टूबर तक आयोजित इस रामलीला का संचालन नवयुवक मंडल रामलीला कमेटी करती है। आयोजन में 25 से अधिक कलाकार हिस्सा लेते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग निजी नौकरियों में काम करते हैं या अपना कारोबार चलाते हैं।

परिवार की तीसरी पीढ़ी संभाल रही परंपरा

कमेटी के अध्यक्ष और उद्योगपति सुखविंदर कालिया के लिए रामलीला केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि परिवार की विरासत है। वह अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं, जो इस आयोजन का नेतृत्व कर रही है। उनसे पहले उनके दिवंगत पिता अजोतिया प्रकाश कालिया कमेटी के चेयरमैन रह चुके हैं।

सुखविंदर कालिया के मुताबिक, रामलीला उनके लिए प्रदर्शन से बढ़कर भक्ति और पूजा का माध्यम है। आयोजन को सभी लोगों के लिए निःशुल्क रखा जाता है, ताकि हर कोई रामलीला देख सके।

उन्होंने बताया कि कलाकारों की वेशभूषा, मेकअप और मंच सजाने का खर्च आयोजक स्वयं उठाते हैं। दशकों पुरानी इस परंपरा को जीवित रखना उनके परिवारों के लिए आस्था और गर्व की बात है।

एक महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी

रामलीला में मंच पर दिखाई देने वाले दृश्यों के पीछे कलाकारों की कई सप्ताह की मेहनत होती है। इसकी तैयारियां करीब एक महीने पहले शुरू हो जाती हैं। कलाकार हर शाम रात 8 बजे से 11 बजे तक रिहर्सल करते हैं।

कार्यक्रम शुरू होने के बाद उनकी दिनचर्या और भी व्यस्त हो जाती है। रामलीला का मंचन शाम 6 बजे से रात 2 बजे तक चलता है। नौकरी और कारोबार की जिम्मेदारियों के साथ अभ्यास और मंचन के लिए समय निकालना कलाकारों के समर्पण को दर्शाता है।

14 साल की उम्र से रामलीला से जुड़े हैं पवन लूथर

रामलीला में रावण का किरदार निभाने वाले पवन लूथर हर साल इस आयोजन के लिए अपनी मार्केटिंग की नौकरी से करीब एक महीने की छुट्टी लेते हैं। वह 14 साल की उम्र से इस रामलीला से जुड़े हुए हैं।

पवन लूथर ने अपने लंबे जुड़ाव के दौरान दशरथ, मेघनाद, परशुराम और विश्वामित्र जैसे कई किरदार निभाए हैं। पिछले तीन वर्षों से वह रावण की भूमिका निभा रहे हैं। इस साल उन्होंने दशरथ का किरदार भी निभाया।

उन्होंने बताया कि जब भी किसी कलाकार की उपलब्धता नहीं होती, तो वह उसकी भूमिका निभाने के लिए आगे आ जाते हैं।

पिता भी निभा चुके हैं रामलीला में अहम भूमिका

पवन लूथर का रामलीला से जुड़ाव केवल व्यक्तिगत रुचि तक सीमित नहीं है। यह उनके परिवार की परंपरा का भी हिस्सा है। उनसे पहले उनके पिता कृष्ण लाल लूथर रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका निभाते थे।

इस तरह सोडल रोड की रामलीला अलग-अलग पीढ़ियों को जोड़ने का काम कर रही है। स्थानीय कलाकारों के लिए यह मंच सिर्फ अभिनय का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।

Key Highlights

  • जालंधर के सोडल रोड पर करीब 70 साल पुरानी रामलीला परंपरा।

  • 12 से 20 अक्टूबर तक रामलीला मैदान में आयोजन।

  • 25 से अधिक स्थानीय कलाकार निभा रहे रामायण के पात्र।

  • अधिकांश कलाकार निजी नौकरियों या कारोबार से जुड़े हैं।

  • रिहर्सल करीब एक महीने पहले शुरू होती है।

  • रामलीला का आयोजन दर्शकों के लिए निःशुल्क किया जाता है।

  • कई कलाकारों के लिए रामलीला पारिवारिक विरासत का हिस्सा है।

FAQ

1. जालंधर में रामलीला का आयोजन कहां किया जा रहा है?

रामलीला का आयोजन सोडल रोड स्थित रामलीला मैदान में किया जा रहा है।

2. रामलीला का आयोजन कब तक है?

दिए गए विवरण के अनुसार, आयोजन 12 से 20 अक्टूबर तक हो रहा है।

3. रामलीला में कितने कलाकार हिस्सा लेते हैं?

इस आयोजन में 25 से अधिक कलाकार भाग लेते हैं।

4. रामलीला की तैयारी कब शुरू होती है?

कलाकार मंचन से करीब एक महीने पहले हर शाम रिहर्सल शुरू कर देते हैं।

5. पवन लूथर कौन-सा किरदार निभाते हैं?

पवन लूथर पिछले तीन वर्षों से रावण का किरदार निभा रहे हैं। इस साल उन्होंने दशरथ की भूमिका भी निभाई।

Conclusion

जालंधर के सोडल रोड की रामलीला इस बात की मिसाल है कि सांस्कृतिक परंपराएं लोगों के समर्पण से जीवित रहती हैं। नौकरी और कारोबार की व्यस्तता के बावजूद स्थानीय कलाकार हर साल अपना समय निकालकर रामायण के पात्रों को मंच पर जीवंत करते हैं। परिवारों की कई पीढ़ियों से जुड़ी यह परंपरा आज भी आस्था, संस्कृति और सामुदायिक एकता को मजबूत कर रही है।Screenshot_109

Edited By: Atul Sharma

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