प्रो. राजिंदर सिंह गिल: खेल, शिक्षा और समाज सेवा में प्रेरणादायक जीवन यात्रा

भारतीय साइक्लिंग के अग्रदूत और समर्पित शिक्षक, जिनकी विरासत पीढ़ियों को प्रेरित करती है

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प्रो. राजिंदर सिंह गिल ने खेल, शिक्षा, समाज सेवा और आध्यात्म के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है। उनकी उपलब्धियां और समर्पण उन्हें एक प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व बनाते हैं।

आज के दौर में जहां सफलता को अक्सर व्यक्तिगत उपलब्धियों से मापा जाता है, प्रो. राजिंदर सिंह गिल एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने खेल, शिक्षा, समाज सेवा और आध्यात्म के क्षेत्र में एक अनूठी पहचान बनाई है। उनका जीवन उत्कृष्टता और समर्पण का प्रतीक है, और उन्हें भारतीय साइक्लिंग के अग्रदूत तथा एक प्रतिबद्ध शिक्षाविद के रूप में व्यापक सम्मान प्राप्त है।

प्रो. गिल ने अपनी मैट्रिक की शिक्षा हरियाणा के पेहोवा स्थित सरकारी हाई स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने पटियाला के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन से शारीरिक शिक्षा में मास्टर डिग्री प्राप्त की। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS), पटियाला से एथलेटिक्स में सर्टिफिकेट कोर्स भी किया और बाद में पीएचडी के लिए पंजीकरण करवाया, जो उनके निरंतर शैक्षणिक विकास के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

एक उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में प्रो. गिल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और साइक्लिंग में राष्ट्रीय स्तर पर नए कीर्तिमान स्थापित किए। उन्होंने 1971 की नेशनल साइक्लिंग चैंपियनशिप में जूनियर वर्ग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया और 1974 में 31वीं नेशनल चैंपियनशिप में सीनियर वर्ग में नया रिकॉर्ड कायम किया। यह उस प्रतियोगिता के चारों वर्गों में एकमात्र रिकॉर्ड था।

अपने शानदार करियर में प्रो. गिल ने विभिन्न राष्ट्रीय, अंतर-राज्य और अंतर-क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में कुल 35 पदक जीते। भारतीय साइक्लिंग के इतिहास में एक अनोखी उपलब्धि हासिल करते हुए उन्होंने जूनियर और सीनियर दोनों राष्ट्रीय चैंपियनशिप में एक साधारण एटलस साइकिल पर छह-छह पदक जीते—जो पिछले एक सदी में शायद ही किसी ने हासिल किया हो।

व्यावसायिक जीवन में, 75 वर्षीय प्रो. गिल ने लुधियाना के गुजरांवाला गुरु नानक (GGN) खालसा कॉलेज में 37 वर्षों तक सेवा देने के बाद शारीरिक शिक्षा विभाग के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्ति ली।

सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका समर्पण कम नहीं हुआ। विभागाध्यक्ष रहने के बाद उन्होंने तीन और वर्षों तक छात्रों का मार्गदर्शन जारी रखा और केवल प्रतीकात्मक रूप से प्रति माह 1 रुपये का मानदेय स्वीकार किया।

उनके सहयोगियों के अनुसार, प्रो. गिल के लिए खेल का मैदान केवल कार्यस्थल नहीं, बल्कि जुनून और उद्देश्य का स्थान था। सेवानिवृत्ति के बाद भी सक्रिय रहने का उनका निर्णय उनके कर्तव्यबोध और संस्थान के प्रति गहरे लगाव को दर्शाता है।

प्रो. गिल लुधियाना में विवाह विवाद प्रकोष्ठ के सदस्य के रूप में नेशनल लोक अदालत की कार्यवाही में भी भाग लेते हैं।

पूर्व अंतरराष्ट्रीय साइक्लिस्ट और भारतीय टीम के कप्तान प्रदीप सिंह संधू (वर्तमान में अबोहर में एसपी) ने उन्हें एक ऐसे गुरु के रूप में याद किया, जिन्होंने खिलाड़ियों के साथ-साथ उनके चरित्र, अनुशासन और जीवन मूल्यों को भी आकार दिया।

एक अन्य शिष्य, अंतरराष्ट्रीय साइक्लिस्ट और डीएसपी मोहाली जगप्रीत सिंह ने उन्हें एक सख्त लेकिन स्नेही मार्गदर्शक बताया, जिनका प्रभाव खेल के मैदान से कहीं आगे तक फैला हुआ है।

प्रो. गिल को ब्रिस्बेन, ऑस्ट्रेलिया की इंडोज पंजाबी साहित्य अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया।

उत्तर भारत में साइक्लिंग को लोकप्रिय बनाने में प्रो. गिल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों से छह प्रमुख विश्वविद्यालयों—पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला, पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी लुधियाना, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर, पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी जालंधर और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी—में साइक्लिंग टीमों की शुरुआत हुई, जहां उन्होंने कोच के रूप में योगदान दिया।


प्रो. गिल के जीवन की मुख्य उपलब्धियां (Highlights):

  • पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के साइक्लिंग क्लब के सचिव के रूप में 31 वर्षों (1981–2012) तक सेवा दी।
  • राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए और पुरस्कार प्राप्त किए।
  • “इंडो-पाक संबंध” विषय पर उनके शोध पत्र को सर्वश्रेष्ठ पेपर का सम्मान मिला।
  • “बाबा नानक: गुरबाणी में अनहद नाद का वैज्ञानिक पहलू” विषय पर भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति का पुरस्कार मिला।
  • लुधियाना पुलिस के विवाह विवाद प्रकोष्ठ में 20 वर्षों तक काउंसलर के रूप में सेवा देकर 3,000 से अधिक मामलों को सुलझाने में योगदान दिया।
  • शिक्षक संगठनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिला और राज्य स्तर पर पदाधिकारी रहे।
  • देश-विदेश में सैकड़ों व्याख्यान दिए और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म (YouTube चैनल) के माध्यम से भी अपने विचार साझा कर रहे हैं।

👉 प्रो. राजिंदर सिंह गिल का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, मेहनत और सेवा भाव से कोई भी व्यक्ति समाज में स्थायी और प्रेरणादायक विरासत छोड़ सकता है।

 
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Edited By: Karan Singh

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