स्क्रीन टाइम ने छीनी मिट्टी के खिलौनों की चमक, अमृतसर के खडोनियां वाला बाजार में सिर्फ त्योहारों पर लौटती रौनक

मोबाइल गेम और वेब सीरीज की बढ़ती लत के बीच बच्चों में पारंपरिक मिट्टी के खिलौनों का शौक घटा, दिवाली और जन्माष्टमी पर ही बढ़ती है बिक्री

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अमृतसर के सदियों पुराने खडोनियां वाला बाजार में मिट्टी के खिलौनों की परंपरा अब सीमित होती जा रही है। बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम ने मिट्टी से खिलौने बनाने और खेलने के शौक को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि जन्माष्टमी और दिवाली पर इनकी मांग फिर बढ़ जाती है।

 

अमृतसर का ऐतिहासिक खडोनियां वाला बाजार कभी मिट्टी के खिलौनों और पारंपरिक कारीगरी के लिए जाना जाता था, लेकिन बदलते समय के साथ बच्चों की पसंद भी तेजी से बदली है। मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम और वेब सीरीज ने बच्चों के खाली समय पर कब्जा कर लिया है। इसका असर मिट्टी के खिलौनों और पारंपरिक शौक पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

स्क्रीन टाइम ने बदला बच्चों का शौक

पारंपरिक बाजार में काम करने वाले कलाकारों के अनुसार अब बच्चों में मिट्टी के खिलौनों को लेकर पहले जैसी दिलचस्पी नहीं रही। स्कूल, कोचिंग और पढ़ाई के बाद बच्चों के पास मनोरंजन के लिए सीमित समय बचता है, जिसे वे ज्यादातर मोबाइल और डिजिटल माध्यमों पर बिताते हैं।

15 वर्षीय अस्मीत सचदेवा ने बताया कि स्कूल और कोचिंग के बाद मिट्टी के बर्तनों या खिलौनों से खेलने का समय बहुत कम मिलता है। खाली समय में वह मोबाइल गेम खेलना या वेब सीरीज देखना पसंद करता है।

उन्होंने बताया कि जब स्कूल में मिट्टी के बर्तनों या पॉटरी से जुड़ा कोई प्रोजेक्ट मिलता है, तब वह खडोनियां वाला बाजार जाकर तैयार मिट्टी के सामान खरीद लेते हैं।

जन्माष्टमी और दिवाली पर लौटती है बाजार की रौनक

कारीगरों का कहना है कि मिट्टी के खिलौनों की बिक्री अब पूरे साल नहीं होती। जन्माष्टमी और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान ही इन पारंपरिक वस्तुओं की मांग बढ़ती है।

एक कलाकार ने कहा कि अब मुख्य रूप से इन्हीं दो त्योहारों के आसपास टेराकोटा यानी पकी हुई मिट्टी के खिलौने तैयार किए जाते हैं। इन मौकों पर बाजार में ग्राहकों की आवाजाही भी बढ़ जाती है।

सदियों पुराने इस बाजार में आम दिनों में अपेक्षाकृत कम भीड़ रहती है, जबकि जन्माष्टमी और दिवाली के दौरान मिट्टी के खिलौनों की खरीदारी के लिए लोग पहुंचते हैं।

घाटे के बाद कारोबार में आया बदलाव

बाजार के एक विक्रेता के मुताबिक मिट्टी के खिलौनों के कारोबार में लगातार नुकसान होने के कारण कई दुकानदारों ने अपनी आजीविका के लिए दूसरे सामान बेचना शुरू कर दिया है। अब यहां कॉस्मेटिक्स, स्टेशनरी और किराने का सामान भी बेचा जाता है।

विक्रेता ने बताया कि जन्माष्टमी और दिवाली के आसपास ही वे दोबारा टेराकोटा के खिलौने बनाकर बेचते हैं। त्योहारों के दौरान बिक्री बढ़ने से इस पारंपरिक कारोबार से कुछ बेहतर कमाई की उम्मीद रहती है।

दूसरे राज्यों से मंगाए जाते हैं मिट्टी के सामान

खडोनियां वाला बाजार के ज्यादातर विक्रेता मिट्टी से बने सामान खुद तैयार करने के बजाय दूसरे क्षेत्रों से मंगाते हैं। कारोबारियों के अनुसार इन वस्तुओं की आपूर्ति कोलकाता, लखनऊ, आगरा और पंजाब के विभिन्न हिस्सों से होती है।

बदलती जीवनशैली और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक मिट्टी के खिलौनों का बाजार सीमित होता जा रहा है। हालांकि त्योहारों के दौरान इनकी मांग यह संकेत देती है कि भारतीय लोक कला और पारंपरिक कारीगरी के लिए लोगों के बीच अब भी जगह बनी हुई है।

Key Highlights:

  • अमृतसर के खडोनियां वाला बाजार में मिट्टी के खिलौनों की परंपरा कमजोर पड़ रही है।
  • बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम का असर पारंपरिक शौक पर पड़ा है।
  • मोबाइल गेम और वेब सीरीज बच्चों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बन रहे हैं।
  • जन्माष्टमी और दिवाली पर टेराकोटा खिलौनों की बिक्री बढ़ती है।
  • घाटे के कारण कई विक्रेताओं ने कॉस्मेटिक्स, स्टेशनरी और किराने का कारोबार शुरू किया।
  • ज्यादातर मिट्टी के सामान कोलकाता, लखनऊ, आगरा और पंजाब के विभिन्न हिस्सों से मंगाए जाते हैं।

FAQ Section:

सवाल: अमृतसर का खडोनियां वाला बाजार किस लिए जाना जाता है?
जवाब: खडोनियां वाला बाजार पारंपरिक मिट्टी के खिलौनों और मिट्टी से बने सामान के लिए जाना जाता है।

सवाल: मिट्टी के खिलौनों की बिक्री कब ज्यादा होती है?
जवाब: बाजार के कलाकारों और विक्रेताओं के अनुसार जन्माष्टमी और दिवाली के दौरान इनकी बिक्री सबसे ज्यादा होती है।

सवाल: बच्चों में मिट्टी के खिलौनों की लोकप्रियता क्यों कम हुई?
जवाब: बढ़ते स्क्रीन टाइम, मोबाइल गेम, वेब सीरीज और पढ़ाई-कोचिंग में व्यस्तता को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

सवाल: मिट्टी के खिलौने किन जगहों से बाजार में आते हैं?
जवाब: विक्रेताओं के अनुसार ज्यादातर सामान कोलकाता, लखनऊ, आगरा और पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से मंगाया जाता है।

Conclusion:
अमृतसर के खडोनियां वाला बाजार में मिट्टी के खिलौनों की घटती लोकप्रियता बदलते दौर और बच्चों की बदलती पसंद को दर्शाती है। हालांकि जन्माष्टमी और दिवाली जैसे त्योहारों पर इनकी मांग अब भी पारंपरिक कारीगरी की विरासत को जीवित रखे हुए है।Screenshot_1256

Edited By: Atul Sharma

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