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रक्षाबंधन पर BSF जवानों के साथ बहनों का भावुक रिश्ता, अटारी-वाघा बॉर्डर और असल उत्तर में बांधी राखी
पूर्व पंजाब स्वास्थ्य मंत्री लक्ष्मी कांता चावला ने 1969 से चली आ रही परंपरा निभाई, INTACH तरनतारन की डॉ. बलजीत कौर ने भी BSF जवानों को बांधा रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन पर अटारी-वाघा बॉर्डर और असल उत्तर मिलिट्री हेरिटेज साइट पर BSF जवानों के साथ भावनात्मक रूप से त्योहार मनाया गया। छात्राओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जवानों की कलाई पर राखी बांधकर उनके प्रति सम्मान जताया।
रक्षाबंधन के पावन अवसर पर भारत-पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा में तैनात BSF जवानों के साथ भाई-बहन के रिश्ते की भावनात्मक तस्वीर देखने को मिली। अटारी-वाघा बॉर्डर पर पूर्व पंजाब स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता लक्ष्मी कांता चावला ने BSF जवानों की कलाई पर राखी बांधकर वर्षों पुरानी परंपरा को निभाया। वहीं, तरनतारन में INTACH की संयोजक डॉ. बलजीत कौर ने असल उत्तर मिलिट्री हेरिटेज साइट पर BSF जवानों को रक्षा सूत्र बांधा।
अटारी-वाघा बॉर्डर पर BSF जवानों को बांधी राखी
रक्षाबंधन के मौके पर लक्ष्मी कांता चावला कई स्कूलों की छात्राओं के साथ अटारी-वाघा संयुक्त जांच चौकी पहुंचीं। यहां उन्होंने BSF जवानों के साथ रक्षाबंधन मनाया और उनकी कलाई पर राखी बांधी।
चावला पिछले कई दशकों से इस परंपरा को निभाती आ रही हैं। उन्होंने बताया कि वह वर्ष 1969 से रक्षाबंधन पर सीमा पर तैनात जवानों को राखी बांधती रही हैं।‘देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं जवान’
लक्ष्मी कांता चावला ने कहा कि BSF के बहादुर जवान देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, ताकि देशवासी अपने घरों में सुरक्षित और चैन की नींद सो सकें।
उन्होंने कहा कि सीमा पर तैनात जवान अक्सर अपने परिवार और बहनों से दूर रहते हैं। ऐसे में रक्षाबंधन के दिन उनकी बहनें उनके पास नहीं पहुंच पातीं। उन्होंने जवानों की कलाई पर राखी बांधने को अपने लिए सम्मान की बात बताया।
चावला ने कहा कि देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने से पीछे नहीं हटने वाले इन जवानों के साथ रक्षाबंधन मनाना गर्व का विषय है।
असल उत्तर में भी BSF जवानों के साथ मनाया रक्षाबंधन
इस बीच INTACH तरनतारन की संयोजक डॉ. बलजीत कौर ने भी रक्षाबंधन के अवसर पर BSF जवानों के साथ त्योहार मनाया। उन्होंने असल उत्तर मिलिट्री हेरिटेज साइट पर BSF personnel की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।
डॉ. बलजीत कौर द्वारा जवानों को राखी बांधना सैनिकों और आम नागरिकों के बीच मजबूत रिश्ते का प्रतीक बना। इस पहल के जरिए सीमा की सुरक्षा करने वाले जवानों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की गई।
सैनिकों और नागरिकों के रिश्ते का प्रतीक
रक्षाबंधन का यह आयोजन केवल एक त्योहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों और आम नागरिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को भी सामने रखा।
सीमा पर तैनात जवान जहां देशवासियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं, वहीं रक्षाबंधन जैसे अवसर उन्हें परिवार से दूर होने के बावजूद अपनापन महसूस कराने का माध्यम बनते हैं।
Key Highlights:
- रक्षाबंधन पर अटारी-वाघा बॉर्डर पर BSF जवानों को राखी बांधी गई।
- पूर्व पंजाब स्वास्थ्य मंत्री लक्ष्मी कांता चावला ने वर्षों पुरानी परंपरा निभाई।
- चावला वर्ष 1969 से BSF जवानों के साथ रक्षाबंधन मनाती आ रही हैं।
- विभिन्न स्कूलों की छात्राओं ने भी जवानों की कलाई पर राखी बांधी।
- असल उत्तर मिलिट्री हेरिटेज साइट पर INTACH तरनतारन की संयोजक डॉ. बलजीत कौर ने BSF जवानों को रक्षा सूत्र बांधा।
- कार्यक्रमों में जवानों और आम नागरिकों के बीच भावनात्मक संबंध को रेखांकित किया गया।
FAQ Section:
लक्ष्मी कांता चावला कब से BSF जवानों को राखी बांध रही हैं?
लक्ष्मी कांता चावला वर्ष 1969 से रक्षाबंधन के अवसर पर BSF जवानों को राखी बांधने की परंपरा निभा रही हैं।
अटारी-वाघा बॉर्डर पर रक्षाबंधन कैसे मनाया गया?
लक्ष्मी कांता चावला ने विभिन्न स्कूलों की छात्राओं के साथ अटारी-वाघा संयुक्त जांच चौकी पर BSF जवानों की कलाई पर राखी बांधी।
लक्ष्मी कांता चावला ने जवानों के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि BSF जवान देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं ताकि नागरिक शांति और सुरक्षा के साथ अपने घरों में रह सकें।
डॉ. बलजीत कौर ने कहां BSF जवानों को राखी बांधी?
INTACH तरनतारन की संयोजक डॉ. बलजीत कौर ने असल उत्तर मिलिट्री हेरिटेज साइट पर BSF जवानों को राखी बांधी।
रक्षाबंधन पर जवानों को राखी बांधने का क्या संदेश है?
यह पहल देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और नागरिकों-सैनिकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
Conclusion:
रक्षाबंधन के अवसर पर अटारी-वाघा बॉर्डर और असल उत्तर में BSF जवानों की कलाई पर बंधा राखी का धागा देशभक्ति और भाई-बहन के रिश्ते की भावनाओं का प्रतीक बना। लक्ष्मी कांता चावला की 1969 से चली आ रही परंपरा और डॉ. बलजीत कौर की पहल ने उन जवानों के प्रति सम्मान जताया, जो अपने परिवारों से दूर रहकर देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं।
