फगवाड़ा के सिविल अस्पताल में पिछले दो महीनों के दौरान कुत्तों के काटने के 240 से अधिक मामले सामने आए हैं। शहर में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है और विभिन्न इलाकों में कुत्तों के हमलों में कई लोग घायल होने की खबरें सामने आई हैं।
रिहायशी गलियों, बाजारों और स्कूलों के आसपास आवारा कुत्तों के झुंड खुलेआम घूमते नजर आते हैं, जिससे स्थानीय लोगों में भय का माहौल बना हुआ है। खासकर माता-पिता, बुजुर्गों और रोजाना आने-जाने वाले लोगों को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है।
पिछले कुछ महीनों में कुत्तों के काटने के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पीड़ितों को इलाज और एंटी-रेबीज टीके की जरूरत पड़ी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का कोई स्थायी समाधान नजर नहीं आ रहा है। सुबह टहलने वाले लोग और स्कूल जाने वाले बच्चे सबसे ज्यादा खतरे में रहते हैं, क्योंकि सुबह और शाम के समय कुत्ते अक्सर झुंड बनाकर घूमते हैं।
हाल ही में एक बेहद दुखद घटना में एक बच्चे की कथित तौर पर आवारा कुत्तों के हमले में मौत हो गई, जिससे पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई और लोगों का गुस्सा भी बढ़ गया। इस दर्दनाक घटना ने अनियंत्रित आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या से पैदा हो रहे खतरे की गंभीरता को उजागर कर दिया है।
इस संबंध में गुरुवार को सिविल अस्पताल फगवाड़ा की वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. सिमरदीप कौर ने बताया कि जनवरी महीने में सिविल अस्पताल फगवाड़ा में कुत्तों के काटने के 124 मामले दर्ज किए गए थे। उन्होंने कहा कि लगभग इतने ही मामले ईएसआई अस्पताल फगवाड़ा, पंचहत के सिविल अस्पताल और निजी अस्पतालों में भी दर्ज हुए होंगे। वहीं फरवरी महीने में फगवाड़ा सिविल अस्पताल में 120 मामले सामने आए।
नागरिकों का कहना है कि बैठकें और निर्देश तो जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर ठोस और लगातार कार्रवाई देखने को नहीं मिलती। नगर निगम और पशुपालन विभाग भी इस स्थिति से निपटने में संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि पशु कल्याण से जुड़े कानूनी प्रावधान, सीमित स्टाफ और अन्य प्रशासनिक चुनौतियां बड़े पैमाने पर आवारा कुत्तों को पकड़ने या उन्हें स्थानांतरित करने में बाधा बन रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, आक्रामक कुत्तों को हटाने या कहीं और ले जाने की कोशिशों का कई बार कुछ पशु प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध किया है, जिससे सख्त कार्रवाई करने में हिचकिचाहट पैदा होती है। वहीं कई स्थानीय लोग भी ऐसे समूहों से सीधे टकराव से बचना चाहते हैं, जिससे समस्या और जटिल हो गई है। नतीजतन प्रशासन नियमों, जन सुरक्षा और सामाजिक दबाव के बीच फंसा हुआ नजर आता है।

