- Hindi News
- राज्य
- पंजाब
- सोशल मीडिया रील्स के दौर में फीका पड़ रहा शास्त्रीय नृत्य का आकर्षण, युवाओं की बदलती पसंद बनी चिंता
सोशल मीडिया रील्स के दौर में फीका पड़ रहा शास्त्रीय नृत्य का आकर्षण, युवाओं की बदलती पसंद बनी चिंता का विषय
कथक और भरतनाट्यम जैसे पारंपरिक नृत्य रूपों से युवाओं का बढ़ रहा मोहभंग, विशेषज्ञ बोले—गहराई से सीखने की बजाय रील्स पर है ज्यादा फोकस।
सोशल मीडिया रील्स की बढ़ती लोकप्रियता का असर अब नृत्य कला पर भी दिखाई देने लगा है। कथक, भरतनाट्यम और अन्य पारंपरिक व आधुनिक नृत्य शैलियों की जगह युवा अब छोटे वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
रील्स की दुनिया में खो रही नृत्य की परंपरा, सोशल मीडिया ने बदली युवाओं की पसंद
इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रील्स का बढ़ता चलन युवाओं की रुचियों को तेजी से प्रभावित कर रहा है। इसका असर अब नृत्य कला पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कथक और भरतनाट्यम जैसे भारतीय शास्त्रीय नृत्य ही नहीं, बल्कि साल्सा और हिप-हॉप जैसी लोकप्रिय पश्चिमी नृत्य शैलियों के प्रति भी युवाओं का आकर्षण कम होता नजर आ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की पीढ़ी लंबी अवधि तक किसी नृत्य शैली की तकनीक, अनुशासन और बारीकियां सीखने के बजाय सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय होने को अधिक महत्व दे रही है।
H2: रील्स की लोकप्रियता ने बदली सीखने की सोच
नृत्य विशेषज्ञों के अनुसार, आज कई युवा महीनों या वर्षों तक किसी नृत्य शैली का प्रशिक्षण लेने की बजाय एक या दो मिनट की रील तैयार करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।वे अक्सर ट्रेंडिंग बॉलीवुड गानों या वायरल डांस स्टेप्स को सीखकर सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हैं। उनका उद्देश्य तकनीकी दक्षता हासिल करने से अधिक व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स बढ़ाना होता है।
H2: कथक विशेषज्ञ ने जताई चिंता
संगीता डांस अकादमी की कथक विशेषज्ञ संगीता बी. कुशवाहा का कहना है कि सोशल मीडिया के प्रभाव ने युवाओं की सोच में बड़ा बदलाव ला दिया है।
उनके अनुसार, पहले विद्यार्थी किसी नृत्य शैली की बुनियादी तकनीक और गहराई को समझने में समय लगाते थे, लेकिन अब कई युवा केवल किसी खास गाने के स्टेप्स सीखकर इंस्टाग्राम रील बनाने तक सीमित रहना चाहते हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज भी कुछ विद्यार्थी ऐसे हैं जो कथक जैसी शास्त्रीय नृत्य विधाओं को गंभीरता से सीखने के लिए नियमित प्रशिक्षण ले रहे हैं।
H2: सोशल मीडिया पर लोकप्रियता बनी नई प्राथमिकता
कॉलेज छात्रा नवधा बताती हैं कि उन्होंने शुरुआत में डांस स्टूडियो इसलिए जॉइन किया ताकि सोशल मीडिया रील्स के लिए डांस स्टेप्स सीख सकें।
उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर अच्छी रील लाखों लोगों तक पहुंच सकती है और कम समय में लोकप्रियता दिला सकती है। इसी कारण कई युवा दोस्तों के साथ मिलकर रील्स के लिए अभ्यास करते हैं।
H2: कला और लोकप्रियता के बीच संतुलन की जरूरत
कला विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्रतिभा दिखाने का एक प्रभावी मंच है, लेकिन यदि इसका उपयोग केवल त्वरित लोकप्रियता तक सीमित रह जाए तो पारंपरिक कला रूपों को नुकसान पहुंच सकता है।
उनका कहना है कि युवाओं को रील्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए भी नृत्य की तकनीक, इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को समझने पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
Key Highlights:
- रील्स की बढ़ती लोकप्रियता से शास्त्रीय नृत्य के प्रति युवाओं की रुचि घट रही है।
- कथक और भरतनाट्यम के साथ साल्सा और हिप-हॉप जैसी शैलियां भी प्रभावित हो रही हैं।
- विशेषज्ञों का कहना है कि युवा तकनीकी प्रशिक्षण से अधिक सोशल मीडिया लोकप्रियता पर ध्यान दे रहे हैं।
- कुछ विद्यार्थी अब भी शास्त्रीय नृत्य सीखने के लिए समर्पित हैं।
- विशेषज्ञों ने कला और डिजिटल माध्यमों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता बताई।
FAQ Section
Q1. विशेषज्ञों की मुख्य चिंता क्या है?
उनका मानना है कि युवा पारंपरिक नृत्य शैलियों को गहराई से सीखने की बजाय सोशल मीडिया रील्स बनाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
Q2. किन नृत्य शैलियों का उल्लेख किया गया है?
कथक, भरतनाट्यम, साल्सा और हिप-हॉप जैसी नृत्य शैलियों का उल्लेख किया गया है।
Q3. कथक विशेषज्ञ संगीता बी. कुशवाहा ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण कई युवा केवल ट्रेंडिंग गानों के स्टेप्स सीखकर रील्स बनाना चाहते हैं, जबकि तकनीकी प्रशिक्षण में उनकी रुचि कम हो रही है।
Q4. क्या सभी युवा शास्त्रीय नृत्य से दूर हो रहे हैं?
नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार, अब भी कुछ विद्यार्थी पूरी लगन से शास्त्रीय नृत्य का नियमित प्रशिक्षण ले रहे हैं।
Conclusion:
सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण की चुनौती भी सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युवा डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हुए शास्त्रीय और अन्य नृत्य शैलियों की मूल तकनीक और संस्कृति को भी अपनाएं, तो आधुनिकता और परंपरा के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

