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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी सरकार को निर्देश, मेडिकल सुविधाओं पर मांगी विस्तृत रिपोर्ट
वेंटिलेटर, अस्पतालों की स्थिति और निजी अस्पतालों के नियमन पर हलफनामा दाखिल करने का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य के मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं का ब्योरा देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने निजी अस्पतालों के नियमन पर भी जवाब मांगा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह राज्य के सभी जिलों के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं, खासकर वेंटिलेटर जैसी व्यवस्थाओं का विस्तृत हलफनामा दाखिल करे। अदालत ने यह भी पूछा है कि ये सुविधाएं स्थानीय मरीजों की जरूरतों को किस हद तक पूरा करती हैं।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार यह स्पष्ट करे कि क्या निजी अस्पतालों और क्लीनिकों के संचालन को नियंत्रित करने के लिए कोई कानूनी या नियामक व्यवस्था मौजूद है। विशेष रूप से, मरीजों के इलाज की गुणवत्ता और उनसे ली जाने वाली फीस के संबंध में क्या नियम लागू हैं।
यह आदेश 22 अप्रैल को जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने पारित किया। यह सुनवाई 2016 में ‘वी द पीपल’ नामक NGO द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के संदर्भ में हुई, जिसे इसके महासचिव प्रिंस लेनिन ने दायर किया था।
याचिका में लखनऊ के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल विश्वविद्यालयों में आवश्यक वेंटिलेटरों की संख्या सहित अन्य चिकित्सा सुविधाओं की जानकारी मांगी गई थी। साथ ही इलाज से जुड़े कई अन्य मुद्दे भी उठाए गए थे।
कोर्ट ने भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव के माध्यम से केंद्र सरकार को भी इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया।
इसके अलावा, डिप्टी सॉलिसिटर जनरल एसबी पांडे को नोटिस जारी कर निजी अस्पतालों के नियमन और यदि आवश्यक हो तो नए कानून की जरूरत पर जवाब देने को कहा गया है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार अपने हलफनामे में यह बताए कि लखनऊ के राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) जैसे सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल अन्य जिलों में कितने स्थापित किए गए हैं या प्रस्तावित हैं, ताकि मरीजों को इलाज के लिए लखनऊ आने के लिए मजबूर न होना पड़े।

