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जिंदगी में ही अपना भंडारा: अकेलेपन की मार झेल रहे बुजुर्ग की अनोखी पहल
Rakesh Yadav ने 1900 लोगों को खिलाया भोजन, कहा – “मेरे बाद करने वाला कोई नहीं”
उत्तर प्रदेश के औरैया में एक बुजुर्ग ने अपने ही “मृत्यु भोज” का आयोजन जीवित रहते किया, क्योंकि उनके बाद इसे करने वाला कोई नहीं है।
प्रसिद्ध शायर Firaq Gorakhpuri की पंक्तियाँ—
“हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था,
मेरी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था”—
आज भी समाज की कई सच्चाइयों को बयां करती हैं।
ऐसी ही एक मार्मिक कहानी उत्तर प्रदेश के औरैया से सामने आई है, जहां Rakesh Yadav नाम के 65 वर्षीय बुजुर्ग ने अपने ही “मृत्यु भोज” (भंडारा) का आयोजन जीवित रहते कर दिया।
🍛 1900 लोगों के लिए भंडारा
राकेश यादव ने करीब 1900 लोगों के लिए भंडारे का आयोजन किया, जिसमें पूजा के बाद लोगों को पूड़ी-सब्जी का भोजन कराया गया। आमतौर पर ऐसा आयोजन किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया जाता है, लेकिन उन्होंने इसे अपने जीवन में ही कर डाला।
💔 अकेलेपन की कहानी
राकेश यादव अविवाहित हैं। उनके दो छोटे भाई थे—
- एक की बीमारी से मृत्यु हो गई
- दूसरे की हत्या हो गई
उनकी एक बहन है, जो स्वयं भी अविवाहित है।
उन्होंने बताया, “मैं बिल्कुल अकेला हूं, मेरे बाद मेरा भंडारा करने वाला कोई नहीं है, इसलिए मैंने इसे खुद ही करने का फैसला लिया।”
❓ शादी क्यों नहीं की?
इस सवाल पर राकेश यादव ने बेहद सरल लेकिन दर्द भरा जवाब दिया—
“हमारे पास जमीन नहीं थी, तो शादी कैसे होती?”
🪔 भावनात्मक संदेश
इस भंडारे के निमंत्रण पत्र पर Firaq Gorakhpuri की प्रसिद्ध पंक्तियां भी छपी थीं, जो उनके जीवन के अकेलेपन और संघर्ष को दर्शाती हैं।
🧠 समाज के लिए संदेश
यह घटना समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—
क्या आज के समय में भी लोग इतने अकेले हो सकते हैं कि उन्हें अपने ही अंतिम संस्कार से जुड़े कर्म खुद करने पड़ें?
✅ निष्कर्ष
राकेश यादव की यह पहल भले ही अनोखी हो, लेकिन इसके पीछे छिपा अकेलापन और दर्द समाज को सोचने पर मजबूर करता है।
