पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को कोलकाता में दिनभर का धरना देकर राज्य में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का विरोध किया।
उनका यह विरोध प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग का प्रतिनिधिमंडल 8 मार्च को पश्चिम बंगाल पहुंचने वाला है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार करेंगे, जबकि चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी भी उनके साथ होंगे। आयोग 8 से 10 मार्च तक राज्य में रहकर चुनाव तैयारियों की समीक्षा करेगा।
इस बीच, बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल एडजुडिकेशन) के दायरे में आने से आगामी चुनाव कार्यक्रम पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद पश्चिम बंगाल में कुल 60,06,675 मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया है।
करीब 532 न्यायिक अधिकारी प्रतिदिन 50,000 से 60,000 मामलों की जांच कर रहे हैं। इस गति से पूरी प्रक्रिया पूरी होने में तीन महीने से अधिक समय लग सकता है।
सूत्रों के अनुसार, जांच के बाद मंजूर किए गए मतदाताओं की पहली सूची 9 मार्च को जारी की जाएगी, जबकि सभी 60 लाख से अधिक मामलों का निपटारा करने में मौजूदा गति से लगभग 90 दिन लग सकते हैं।
यह अवधि वर्तमान पश्चिम बंगाल विधानसभा के कार्यकाल (जो 7 मई को समाप्त हो रहा है) से भी आगे जा सकती है।
अगर मार्च-अप्रैल के दौरान चुनाव कार्यक्रम घोषित होता है, तो संभव है कि मतदान के समय भी कई मतदाताओं की जांच प्रक्रिया जारी रहे।
इससे पहले 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया था कि मतदाता सूची में पाए गए तार्किक विसंगतियों (logical discrepancy) से जुड़े मामलों की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की जाए।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 24 फरवरी तक करीब 532 न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई थी, जो तब से मतदाताओं की सूची की जांच कर रहे हैं।
