पंजाब की बेटी बलजीत कौर ने एशियन गेम्स में जीता गोल्ड, कभी चने-बादाम के लिए भी करना पड़ता था संघर्ष

तरनतारन के छोटे से गांव से भारतीय महिला हॉकी टीम तक का सफर आसान नहीं रहा। मजदूर पिता के संघर्ष, परिवार के सहयोग और बलजीत कौर के जुनून ने उन्हें एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक तक पहुंचाया।

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पंजाब के तरनतारन जिले के काका कंडियाला गांव की बलजीत कौर ने भारतीय महिला हॉकी टीम के साथ एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी पहचान बनाई। कभी आर्थिक तंगी के कारण उन्हें डाइट के लिए चने और बादाम तक दूसरे खिलाड़ियों से मांगने पड़ते थे। मजदूर पिता ने आर्थिक मुश्किलों के बावजूद बेटी का हॉकी खेलने का सपना पूरा करने में उसका साथ दिया।

 

पंजाब की बेटी बलजीत कौर की कहानी संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। तरनतारन जिले के काका कंडियाला गांव की रहने वाली 25 वर्षीय बलजीत कौर ने भारतीय महिला हॉकी टीम के साथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। वह इस स्वर्ण पदक विजेता भारतीय टीम में पंजाब की एकमात्र महिला खिलाड़ी थीं।

गोल्ड मेडल जीतने के बाद बलजीत कौर ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा, "मुझे सिल्वर नहीं, गोल्ड ही जीतना था। मुझे पता था कि हम गोल्ड जीतेंगे।" उनकी यह बात उनके आत्मविश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण को दर्शाती है।

गोल्ड मेडल जीतने से पहले ही घर वापसी की कर ली थी तैयारी

बलजीत कौर को अपनी टीम की जीत पर पूरा भरोसा था। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही उन्होंने घर लौटने की तैयारियां कर ली थीं। उन्होंने अपने बड़े भाई दलशेर सिंह, जो टैक्सी चलाते हैं, से घर वापसी पर ढोल बजाकर स्वागत करने की व्यवस्था करने को कहा था।

उनका यह आत्मविश्वास उस खिलाड़ी के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है, जिसने सीमित संसाधनों के बीच हॉकी में अपना करियर बनाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की।

आर्थिक तंगी के कारण डाइट पूरी करना भी था मुश्किल

बलजीत कौर का हॉकी तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उनका परिवार आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था। उनके कोच खिलाड़ियों को नियमित रूप से चने और बादाम खाने की सलाह देते थे, क्योंकि खेल में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए पौष्टिक आहार जरूरी था।

हालांकि, बलजीत के परिवार के लिए रोजाना चने और बादाम खरीदना भी कई बार मुश्किल होता था। ऐसे में वह अपनी जरूरत पूरी करने के लिए दूसरी खिलाड़ियों से चने और बादाम मांग लेती थीं।

बलजीत के मुताबिक, वह ऐसा इसलिए करती थीं, ताकि उनके कोच को लगे कि उन्होंने जरूरी डाइट ली है। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने खेल और फिटनेस पर ध्यान देना जारी रखा।

मजदूर पिता ने कभी बेटी को हॉकी छोड़ने के लिए नहीं कहा

बलजीत कौर के पिता लखविंदर सिंह मजदूरी करके परिवार का गुजारा करते थे। उनकी आमदनी सीमित थी, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटी को हॉकी खेलने से नहीं रोका।

बलजीत के अनुसार, उनके पिता हमेशा उन्हें प्रोत्साहित करते थे और खेल जारी रखने के लिए प्रेरित करते थे। हालांकि, आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए पिता से पैसे मांगना उनके लिए आसान नहीं था।

वह कई बार जरूरत के लिए पैसे मांगते हुए संकोच महसूस करती थीं, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पिता के लिए पैसे जुटाना कितना मुश्किल है।

बेटी के सपने के लिए कर्ज लेने से भी पीछे नहीं हटे पिता

बलजीत की मां राजवंत कौर के मुताबिक, परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसके बावजूद लखविंदर सिंह अपनी बेटी की हॉकी से जुड़ी जरूरतों के लिए किसी न किसी तरह पैसों का इंतजाम कर लेते थे।

कई बार उन्हें दूसरों से उधार भी लेना पड़ता था, लेकिन उन्होंने बेटी के खेल को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार के इसी सहयोग ने बलजीत को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में मदद की।

चचेरी बहन को देखकर हॉकी खेलने की जगी थी इच्छा

बलजीत कौर का हॉकी से जुड़ाव बचपन से ही शुरू हो गया था। उन्हें इस खेल की प्रेरणा अपनी चचेरी बहन से मिली, जो हॉकी खेलती थीं।

बलजीत ने बताया कि वह अपनी चचेरी बहन को सुबह जूते पहनकर हॉकी खेलने के लिए जाते हुए देखती थीं। धीरे-धीरे उनके मन में भी हॉकी खेलने की इच्छा पैदा हुई और उन्होंने इस खेल को अपना लक्ष्य बना लिया।

शुरुआत में परिवार के लिए यह समझना मुश्किल था कि हॉकी में उनकी दिलचस्पी उन्हें कहां तक ले जाएगी।

भाई को भी नहीं था बहन की सफलता का अंदाजा

बलजीत के बड़े भाई दलशेर सिंह ने भी स्वीकार किया कि एक समय उन्हें बहन के हॉकी खेलने को लेकर संदेह था। उन्हें लगता था कि बलजीत पढ़ाई से बचने के लिए हॉकी खेलती हैं और पिता की मेहनत की कमाई खेल पर खर्च हो रही है।

हालांकि, समय के साथ बलजीत की मेहनत और उपलब्धियों ने उनकी सोच बदल दी। एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतना उनके लिए भी गर्व का क्षण रहा।

 

Key Highlights:

  • पंजाब के तरनतारन जिले की बलजीत कौर ने भारतीय महिला हॉकी टीम के साथ एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता।

  • वह स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम में पंजाब की एकमात्र महिला खिलाड़ी थीं।

  • बलजीत कौर काका कंडियाला गांव की रहने वाली हैं।

  • उनके पिता लखविंदर सिंह मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण करते थे।

  • आर्थिक तंगी के कारण बलजीत को कई बार डाइट के लिए दूसरे खिलाड़ियों से चने और बादाम मांगने पड़ते थे।

  • पिता ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटी को हॉकी खेलने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया।

  • बलजीत को हॉकी खेलने की प्रेरणा अपनी चचेरी बहन से मिली थी।

  • गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्होंने अपने गांव में ढोल के साथ स्वागत की तैयारी पहले से कर रखी थी।

FAQ Section:

1. बलजीत कौर कौन हैं?

बलजीत कौर पंजाब के तरनतारन जिले के काका कंडियाला गांव की भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ी हैं। उन्होंने भारतीय टीम के साथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता।

2. बलजीत कौर का संबंध पंजाब के किस जिले से है?

बलजीत कौर तरनतारन जिले के काका कंडियाला गांव की रहने वाली हैं।

3. बलजीत कौर के पिता क्या काम करते हैं?

उनके पिता लखविंदर सिंह मजदूरी करके परिवार का गुजारा करते थे और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटी के हॉकी खेलने में उनका साथ देते रहे।

4. बलजीत कौर को हॉकी खेलने की प्रेरणा कहां से मिली?

बलजीत कौर को हॉकी खेलने की प्रेरणा अपनी चचेरी बहन से मिली थी। वह उन्हें सुबह हॉकी खेलने जाते हुए देखती थीं।

5. बलजीत कौर को डाइट के लिए किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?

परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनके लिए नियमित रूप से चने और बादाम खरीदना मुश्किल था। कई बार उन्हें अपनी डाइट पूरी करने के लिए अन्य खिलाड़ियों से ये चीजें मांगनी पड़ती थीं।

6. एशियन गेम्स में बलजीत कौर की क्या उपलब्धि रही?

बलजीत कौर ने भारतीय महिला हॉकी टीम के साथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता। वह इस टीम में पंजाब की एकमात्र महिला खिलाड़ी थीं।

Conclusion:

बलजीत कौर की कहानी बताती है कि सीमित आर्थिक संसाधन किसी खिलाड़ी के सपनों की राह में चुनौती जरूर बन सकते हैं, लेकिन परिवार का सहयोग और लगातार मेहनत आगे बढ़ने का रास्ता खोल सकते हैं। मजदूर पिता की मेहनत, मां का समर्थन और खुद बलजीत के हॉकी के प्रति जुनून ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। चने और बादाम के लिए संघर्ष करने से लेकर एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने तक का उनका सफर पंजाब की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणादायक है।Screenshot_366

Edited By: Atul Sharma

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