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कपूरथला के किसान ने अपनाई इंटीग्रेटेड फार्मिंग, मछली पालन-पशुपालन और खेती से घटाई लागत, बढ़ाई आमदनी
कलेवाल गांव के 48 वर्षीय परमिंदरजीत सिंह का मॉडल बना मिसाल, मुख्यमंत्री पुरस्कार से सम्मानित किसान ने खेती में अपनाई वैज्ञानिक तकनीक
कपूरथला के कलेवाल गांव के किसान परमिंदरजीत सिंह ने मछली पालन, सुअर पालन और कृषि को एक साथ जोड़कर इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल तैयार किया है। इससे उन्हें अतिरिक्त आय के साथ उत्पादन लागत घटाने में मदद मिल रही है।
पंजाब के कपूरथला जिले के कलेवाल गांव के 48 वर्षीय किसान परमिंदरजीत सिंह ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर इंटीग्रेटेड फार्मिंग को अपनाया है। उन्होंने मछली पालन, सुअर पालन और कृषि को एक-दूसरे से जोड़कर ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें खेत से निकलने वाले संसाधनों का दोबारा उपयोग किया जाता है और उत्पादन लागत को कम करने में मदद मिलती है।
परमिंदरजीत सिंह का यह वैज्ञानिक खेती मॉडल अब किसानों के लिए नई संभावनाएं दिखा रहा है। उनके प्रयासों को राज्य स्तर पर भी पहचान मिली है और उन्हें मुख्यमंत्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
2017 में शुरू किया सुअर पालन
परमिंदरजीत सिंह का परिवार परंपरागत रूप से गेहूं और धान की खेती करता रहा है। खेती में कुछ नया करने और आमदनी के अतिरिक्त साधन विकसित करने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2017 में सुअर पालन शुरू किया।हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2020 में इस गतिविधि को जारी रखना मुश्किल हो गया और उन्हें इसे बंद करना पड़ा।
2022 में दोबारा शुरू किया कारोबार
साल 2022 में उन्होंने सुअर पालन फिर से शुरू किया। इसी दौरान उन्होंने अपने खेत में मछली पालन भी शुरू कर दिया।
सिंह के अनुसार, उनका उद्देश्य आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना और खेती को अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी बनाना था।
चार एकड़ में मछली पालन
परमिंदरजीत सिंह ने करीब चार एकड़ भूमि में मछली पालन विकसित किया है। यहां सालाना लगभग 10 टन मछली का उत्पादन होता है।
वह कंपोजिट फिश कल्चर तकनीक अपनाते हैं, जिसमें अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों को एक साथ पाला जाता है।
उनके फार्म में मुख्य रूप से ये प्रजातियां पाली जाती हैं:
- कतला
- रोहू
- कॉमन कार्प
- ग्रास कार्प
तैयार मछली को वह जालंधर की मछली मंडी में बेचते हैं।
सुअर पालन के कचरे से तैयार किया प्राकृतिक फीड सिस्टम
किसान ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग के तहत सुअर पालन और मछली पालन को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। उनके फार्म में करीब 1.5 कनाल क्षेत्र में पिगरी बनाई गई है।
सुअर शेड की सफाई से निकलने वाले कचरे को सीधे फेंकने के बजाय एक टैंक में जमा किया जाता है। इसके बाद मिट्टी से बने पंप की मदद से इस सामग्री को मछली तालाब तक पहुंचाया जाता है।
कम हुआ व्यावसायिक फीड पर खर्च
सुअर पालन से निकलने वाला जैविक कचरा मछलियों के लिए पोषक तत्वों के प्राकृतिक स्रोत के रूप में काम करता है। इससे व्यावसायिक मछली फीड पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिलती है।
इस व्यवस्था से खेत के अपशिष्ट का भी बेहतर उपयोग होता है और उत्पादन प्रक्रिया अधिक टिकाऊ बनती है।
तालाब का पानी खेतों के लिए प्राकृतिक खाद
परमिंदरजीत सिंह का इंटीग्रेटेड मॉडल केवल सुअर पालन और मछली पालन तक सीमित नहीं है। मछली तालाब का पानी भी उनके कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाता है।
इस पानी से वह अपने खेतों में धान और गेहूं की सिंचाई करते हैं। उनके अनुसार, तालाब का पोषक तत्वों से भरपूर पानी खेतों के लिए प्राकृतिक उर्वरक की तरह काम करता है।
इस तरह एक ही फार्म में पानी, जैविक अपशिष्ट और कृषि संसाधनों का चक्रीय उपयोग होता है।
तकनीकी प्रशिक्षण से मजबूत की जानकारी
आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए परमिंदरजीत सिंह ने संबंधित संस्थानों से प्रशिक्षण भी लिया।
उन्होंने फिशरीज ट्रेनिंग सेंटर एवं फिश सीड फार्म, कपूरथला से मछली पालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहीं, सुअर पालन के लिए उन्होंने गुरु अंगद देव वेटरिनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी (GADVASU), लुधियाना से प्रशिक्षण लिया।
किसानों के लिए टिकाऊ खेती की मिसाल
परमिंदरजीत सिंह का मॉडल दिखाता है कि पारंपरिक कृषि के साथ पशुपालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों को जोड़कर किसान अपनी आय के स्रोत बढ़ा सकते हैं।
साथ ही, एक गतिविधि से निकलने वाले संसाधनों को दूसरी गतिविधि में इस्तेमाल करने से लागत कम करने और कृषि अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है।
Key Highlights:
- कपूरथला के कलेवाल गांव के 48 वर्षीय किसान परमिंदरजीत सिंह ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग अपनाई।
- खेती के साथ मछली पालन और सुअर पालन को जोड़ा।
- 2017 में सुअर पालन शुरू किया, 2020 में कोविड के दौरान बंद किया।
- 2022 में सुअर पालन दोबारा शुरू कर मछली पालन भी अपनाया।
- चार एकड़ में मछली पालन से करीब 10 टन सालाना उत्पादन।
- कतला, रोहू, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प की कंपोजिट फिश कल्चर।
- मछली जालंधर की मछली मंडी में बेची जाती है।
- करीब 1.5 कनाल में पिगरी स्थापित की।
- पिगरी के जैविक कचरे का उपयोग मछली तालाब में पोषक तत्वों के स्रोत के रूप में।
- तालाब के पोषक तत्वों वाले पानी से धान और गेहूं की सिंचाई।
- वैज्ञानिक खेती के लिए मुख्यमंत्री पुरस्कार से सम्मानित।
FAQ Section:
सवाल: परमिंदरजीत सिंह कहां के किसान हैं?
जवाब: वह कपूरथला जिले के कलेवाल गांव के 48 वर्षीय किसान हैं।
सवाल: उन्होंने कौन-कौन सी कृषि गतिविधियां शुरू की हैं?
जवाब: उन्होंने पारंपरिक खेती के साथ मछली पालन और सुअर पालन को जोड़ा है।
सवाल: उनके मछली फार्म का आकार कितना है?
जवाब: मछली पालन करीब चार एकड़ भूमि में किया जा रहा है।
सवाल: सालाना कितना मछली उत्पादन होता है?
जवाब: उनके फार्म से करीब 10 टन मछली का सालाना उत्पादन होता है।
सवाल: मछली पालन में कौन सी प्रजातियां हैं?
जवाब: फार्म में कतला, रोहू, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प पाली जाती हैं।
सवाल: इंटीग्रेटेड फार्मिंग से लागत कैसे कम होती है?
जवाब: सुअर पालन से निकलने वाले जैविक कचरे का उपयोग मछली तालाब में पोषक तत्वों के स्रोत के रूप में किया जाता है और तालाब का पोषक पानी खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल होता है। इससे संसाधनों का दोबारा उपयोग होता है और कुछ इनपुट लागत कम करने में मदद मिलती है।
सवाल: परमिंदरजीत सिंह को कौन सा सम्मान मिला है?
जवाब: उनके वैज्ञानिक खेती के दृष्टिकोण और इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
Conclusion:
कपूरथला के कलेवाल गांव के परमिंदरजीत सिंह ने पारंपरिक खेती के साथ मछली पालन और सुअर पालन को जोड़कर इंटीग्रेटेड फार्मिंग की प्रभावी मिसाल पेश की है। मछली तालाब में सुअर पालन के जैविक कचरे का उपयोग और उसी तालाब के पोषक पानी से खेतों की सिंचाई उनके मॉडल को संसाधन-कुशल बनाती है। वैज्ञानिक प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकों के सहारे तैयार यह मॉडल किसानों के लिए अतिरिक्त आय, लागत नियंत्रण और टिकाऊ कृषि की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।
