देशी कीकर के महत्व को चित्रकला के जरिए राष्ट्रीय पहचान, छात्र ने जीता INTACH का राष्ट्रीय पुरस्कार

'ट्री ऑफ लाइफ' प्रतियोगिता में पंजाब के देशी कीकर को बनाया विषय, 12 हजार प्रविष्टियों के बीच राष्ट्रीय विजेता बना छात्र

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स्प्रिंग डेल स्कूल के कक्षा आठ के छात्र सहजप्रीत सिंह सोखल ने देशी कीकर (बबूल) के पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित 'ट्री ऑफ लाइफ' कला प्रतियोगिता में राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया। प्रतियोगिता में देशभर से करीब 12 हजार प्रविष्टियां भेजी गई थीं।

देशी कीकर पर बनाई कलाकृति ने दिलाया राष्ट्रीय सम्मान

पंजाब के एक छात्र ने देशी कीकर (Vachellia nilotica) यानी बबूल के पेड़ के महत्व को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। स्प्रिंग डेल एजुकेशनल सोसायटी के छात्र सहजप्रीत सिंह सोखल ने "ट्री ऑफ लाइफ" कला प्रदर्शनी प्रतियोगिता में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर स्कूल और राज्य का नाम रोशन किया।

यह प्रतियोगिता इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) की हेरिटेज एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन सर्विस (HECS) द्वारा आयोजित की गई थी, जिसमें देशभर के कक्षा 7 से 9 तक के विद्यार्थियों ने भाग लिया।

12 हजार प्रविष्टियों में चुनी गई विजेता कलाकृति

स्प्रिंग डेल एजुकेशनल सोसायटी के चेयरमैन साहिलजीत सिंह संधू ने बताया कि प्रतियोगिता में देशभर से लगभग 12,000 प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं। इनमें सहजप्रीत सिंह सोखल की पोस्टर कला को राष्ट्रीय विजेता घोषित किया गया।

प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को अपने क्षेत्र के किसी देशज (स्वदेशी) वृक्ष को विषय बनाकर उसकी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्ता को चित्रकला के माध्यम से प्रस्तुत करना था।

कीकर को बताया 'जीवन का वृक्ष'

सहजप्रीत की कलाकृति में पंजाब और उत्तर भारत में व्यापक रूप से पाए जाने वाले देशी कीकर के पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को दर्शाया गया।

पोस्टर में एक संत को कीकर के पेड़ की छांव में बैठे हुए दिखाया गया है। चित्र पर पंजाबी में लिखा गया संदेश था—

"मालवे दे कीकर हैठां, सुकून भरियां गल्लां"

जिसका भावार्थ है कि "मालवा के कीकर के पेड़ों की छांव में शांति और सुकून मिलता है।"

तेजी से घट रही है देशी कीकर की संख्या

कलाकृति के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि देशी कीकर पंजाब के मूल (नेटिव) वृक्षों में से एक है, जिसकी संख्या लगातार कम होती जा रही है।

यह पेड़ स्थानीय जलवायु, वर्षा और भीषण गर्मी के अनुरूप स्वाभाविक रूप से अनुकूलित है। साथ ही इसका पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका में भी महत्वपूर्ण योगदान है।


Key Highlights:

  • स्प्रिंग डेल स्कूल के छात्र सहजप्रीत सिंह सोखल ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
  • INTACH की "Tree of Life" प्रतियोगिता में मिली सफलता।
  • देशभर से लगभग 12,000 प्रविष्टियां प्रतियोगिता में शामिल हुईं।
  • देशी कीकर (बबूल) के पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व को चित्र में दर्शाया गया।
  • कलाकृति में "मालवे दे कीकर हैठां, सुकून भरियां गल्लां" संदेश दिया गया।
  • प्रतियोगिता का उद्देश्य स्वदेशी वृक्षों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।

FAQ Section:

Q1. राष्ट्रीय पुरस्कार किस छात्र ने जीता?
स्प्रिंग डेल स्कूल के कक्षा आठ के छात्र सहजप्रीत सिंह सोखल ने यह पुरस्कार जीता।

Q2. प्रतियोगिता का आयोजन किसने किया था?
यह प्रतियोगिता INTACH की हेरिटेज एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन सर्विस (HECS) द्वारा आयोजित की गई थी।

Q3. छात्र ने किस पेड़ को अपनी कलाकृति का विषय बनाया?
देशी कीकर (Vachellia nilotica/बबूल) को विषय बनाया गया।

Q4. प्रतियोगिता में कितनी प्रविष्टियां आई थीं?
देशभर से करीब 12,000 प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं।

Q5. कीकर के पेड़ का महत्व क्या है?
यह स्थानीय जलवायु के अनुकूल वृक्ष है, जो पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


Conclusion:

देशी वृक्षों के संरक्षण और उनके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में यह उपलब्धि प्रेरणादायक है। सहजप्रीत सिंह सोखल की सफलता न केवल उनकी प्रतिभा का प्रमाण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी प्रभावी संदेश देती है।Screenshot_2802

Edited By: Karan Singh

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