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पंडित तारा सिंह नरोतम की विरासत पर विशेष कार्यक्रम, युवाओं को पंजाबी साहित्य से जोड़ने पर जोर
INTACH पंजाब और बाबा आया सिंह रिआर्की कॉलेज के संयुक्त आयोजन में सिख साहित्य और निर्मला परंपरा पर हुई चर्चा
अमृतसर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में सिख विद्वान और निर्मला चिंतक पंडित तारा सिंह नरोतम के जीवन और साहित्यिक योगदान को याद किया गया। वक्ताओं ने युवाओं को पंजाब की भूली-बिसरी साहित्यिक विरासत से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
पंजाब की साहित्यिक और धार्मिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से बाबा आया सिंह रिआर्की कॉलेज में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) पंजाब के सहयोग से किया गया, जिसमें सिख विद्वान और निर्मला चिंतक पंडित तारा सिंह नरोतम के जीवन और कार्यों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि पंजाब की समृद्ध साहित्यिक परंपरा और महान विद्वानों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की बड़ी जरूरत है।
निर्मला परंपरा के प्रमुख विद्वान थे पंडित तारा सिंह नरोतम
कार्यक्रम में वक्ताओं ने पंडित तारा सिंह नरोतम को निर्मला परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण विद्वानों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि नरोतम ने अपना पूरा जीवन सिख साहित्य, गुरबाणी की व्याख्या और धार्मिक ग्रंथों के संरक्षण के लिए समर्पित किया।हालांकि, इतने बड़े योगदान के बावजूद आज उनका नाम आम लोगों के बीच अपेक्षाकृत कम जाना जाता है।
साधारण किसान परिवार से निकलकर बने महान विद्वान
शोधकर्ताओं और विद्वानों ने बताया कि पंडित तारा सिंह नरोतम एक साधारण किसान परिवार से थे, लेकिन उन्होंने काशी, अमृतसर और बंगाल जैसे शिक्षा केंद्रों में अध्ययन कर गहन ज्ञान अर्जित किया।
उनकी रचनाएं 4,000 से अधिक पृष्ठों में फैली हुई हैं, जिनमें गुरबाणी व्याख्या, सिख दर्शन, शब्दकोश और धार्मिक साहित्य शामिल हैं।
‘गुरु गिरारथ कोश’ को बताया ऐतिहासिक ग्रंथ
कार्यक्रम के दौरान पंडित नरोतम की प्रसिद्ध रचना ‘गुरु गिरारथ कोश’ का विशेष उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने इसे सिख साहित्य का एक ऐतिहासिक संदर्भ ग्रंथ बताया, जिसने आधुनिक सिख शब्दकोशों को भी प्रभावित किया।
इसके अलावा ‘श्री गुरमत निर्णय सागर’, ‘भगत बाणी स्टीक’ और ‘गुर तीर्थ संग्रह’ जैसी उनकी प्रमुख कृतियों पर भी चर्चा की गई।
हेमकुंट साहिब के महत्व का शुरुआती उल्लेख
वक्ताओं ने बताया कि ‘गुर तीर्थ संग्रह’ में हेमकुंट साहिब के महत्व का शुरुआती प्रकाशित उल्लेख मिलता है। इसे सिख इतिहास और धार्मिक साहित्य के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना गया।
युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने की जरूरत
प्रोफेसर नरेश कुमार ने कहा कि जो समाज अपने विद्वानों को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कट जाता है। उन्होंने कहा कि भूले-बिसरे विद्वानों को याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि अकादमिक जिम्मेदारी भी है।
वहीं बलविंदर सिंह ने कहा कि INTACH पंजाब केवल ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक और बौद्धिक विरासत को भी संरक्षित करने के लिए काम कर रहा है।
उन्होंने घोषणा की कि पंडित नरोतम की अप्रकाशित रचनाओं को दोबारा प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा ताकि वे शोधकर्ताओं और पाठकों तक फिर से पहुंच सकें।
विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा हैं पंडित नरोतम
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे स्वर्ण सिंह विर्क ने कहा कि पंडित तारा सिंह नरोतम का जीवन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि नरोतम ने जीवनभर लेखन और अध्ययन को समर्पित रखा, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए सीखने योग्य उदाहरण है।
Key Highlights:
- बाबा आया सिंह रिआर्की कॉलेज में विशेष कार्यक्रम आयोजित
- INTACH पंजाब के सहयोग से हुआ आयोजन
- पंडित तारा सिंह नरोतम के साहित्यिक योगदान पर चर्चा
- युवाओं को पंजाबी साहित्यिक विरासत से जोड़ने पर जोर
- ‘गुरु गिरारथ कोश’ सहित प्रमुख कृतियों का उल्लेख
FAQ Section:
Q1. पंडित तारा सिंह नरोतम कौन थे?
वे सिख विद्वान और निर्मला परंपरा के प्रमुख चिंतक थे, जिन्होंने गुरबाणी और सिख साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
Q2. कार्यक्रम का आयोजन किसने किया?
यह कार्यक्रम बाबा आया सिंह रिआर्की कॉलेज और INTACH पंजाब के सहयोग से आयोजित किया गया।
Q3. पंडित नरोतम की प्रमुख रचनाएं कौन-सी हैं?
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘गुरु गिरारथ कोश’, ‘श्री गुरमत निर्णय सागर’, ‘भगत बाणी स्टीक’ और ‘गुर तीर्थ संग्रह’ शामिल हैं।
Q4. कार्यक्रम में किस मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया?
युवाओं को पंजाब की साहित्यिक और बौद्धिक विरासत से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
Conclusion:
पंडित तारा सिंह नरोतम पर आयोजित यह कार्यक्रम पंजाब की समृद्ध साहित्यिक और धार्मिक विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से जोड़ना है, तो ऐसे महान विद्वानों के योगदान को व्यापक स्तर पर सामने लाना जरूरी है।

