अमृतसर की सड़कों के बीच आज भी जिंदा है गुरु काल का इतिहास, जानिए गुरुद्वारा पिपली साहिब की कहानी

गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा है गुरुद्वारा पिपली साहिब का इतिहास, कभी अमृतसर-लाहौर शाही मार्ग पर था अहम पड़ाव

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आज का इस्लामाबाद अमृतसर शहर का व्यस्त इलाका है, लेकिन गुरु काल में यह क्षेत्र एक छोटे से बसेरे के बाहर महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता था। गुरुद्वारा पिपली साहिब आज भी इस ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाता है।

 

अमृतसर आज एक बड़े और व्यस्त शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन शहर के कई हिस्से ऐसे हैं जिनका इतिहास गुरु काल से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है गुरुद्वारा पिपली साहिब, जो पुतलीघर चौक से इस्लामाबाद बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित है।

आज यह इलाका व्यस्त सड़कों और बाजारों से घिरा हुआ है। हालांकि, गुरु काल में जब अमृतसर का विस्तार सीमित था और मुख्य रूप से गुरु के महल तथा किला लोहगढ़ के आसपास ही बस्ती थी, तब यह क्षेत्र अमृतसर से लाहौर जाने वाले शाही मार्ग पर एक महत्वपूर्ण विश्राम स्थल के रूप में जाना जाता था।

गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा है गुरुद्वारा पिपली साहिब का इतिहास

गुरुद्वारा पिपली साहिब का इतिहास सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा हुआ माना जाता है। ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, वर्ष 1581 में गुरु गद्दी को लेकर हुए घटनाक्रम के बाद गुरु अर्जन देव जी को गुरु के महल से बाहर रहना पड़ा।

बताया जाता है कि पृथी चंद ने गुरु गद्दी प्राप्त करने में असफल रहने के बाद गुरु अर्जन देव जी के निवास गुरु के महल पर जबरन कब्जा कर लिया था। इसके बाद गुरु अर्जन देव जी ने गोइंदवाल, बसरके और छेहर्टा साहिब सहित कई स्थानों पर समय बिताया।

पिपल के पेड़ों के कारण पड़ा ‘पिपली साहिब’ नाम

ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, बाद में गुरु अर्जन देव जी ने इस स्थान को कुछ समय के लिए अपना निवास बनाया। उस समय यहां बड़ी संख्या में पिपल के पेड़ मौजूद थे।

धीरे-धीरे गुरु की मौजूदगी के कारण यह स्थान संगत के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित होने लगा। श्रद्धालु यहां एकत्रित होने लगे और गुरु के साथ संगत-पंगत की परंपरा मजबूत हुई।

संगत और लंगर का बना महत्वपूर्ण केंद्र

गुरु काल में यह स्थान केवल विश्राम करने की जगह नहीं रहा, बल्कि धार्मिक और सामुदायिक गतिविधियों का केंद्र भी बन गया।

दरबार साहिब के पवित्र सरोवर की सेवा से जुड़ी संगत

उस समय दूर-दराज से पुरुष और महिलाएं दरबार साहिब के पवित्र सरोवर के निर्माण और सेवा में हिस्सा लेने के लिए अमृतसर पहुंचते थे। बाहर से आने वाली संगत के लिए इस स्थान पर भोजन और ठहरने की व्यवस्था की जाती थी।

इस तरह यहां संगत और पंगत (लंगर) की परंपरा ने इस स्थान को सिख इतिहास में विशेष महत्व दिया।

अमृतसर-लाहौर मार्ग पर था महत्वपूर्ण पड़ाव

गुरु काल में अमृतसर आज की तरह फैला हुआ महानगर नहीं था। शहर की बस्ती मुख्य रूप से गुरु के महल और किला लोहगढ़ के आसपास केंद्रित थी।

उस समय अमृतसर और लाहौर को जोड़ने वाला मार्ग व्यापार, यात्रा और आवागमन के लिहाज से महत्वपूर्ण था। इसी मार्ग पर स्थित होने के कारण पिपली साहिब आने-जाने वाले यात्रियों और संगत के लिए विश्राम का प्रमुख स्थान बन गया।

भाई गुरदास के लौटने का भी मिलता है उल्लेख

ऐतिहासिक विवरणों में वर्ष 1586 का भी उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि भाई गुरदास प्रचार के उद्देश्य से आगरा सहित कई स्थानों की यात्रा करने के बाद वापस लौटे थे।

पिपली साहिब से जुड़ा इतिहास इसी दौर में अमृतसर में धार्मिक गतिविधियों और संगत के विस्तार की तस्वीर प्रस्तुत करता है।

आज गुरुद्वारा पिपली साहिब के आसपास आधुनिक अमृतसर की चहल-पहल दिखाई देती है, लेकिन यह स्थान शहर के उस दौर की याद दिलाता है जब अमृतसर धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो रहा था।

Key Highlights:

  • गुरुद्वारा पिपली साहिब अमृतसर के पुतलीघर-इस्लामाबाद मार्ग पर स्थित है।
  • इसका इतिहास गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा हुआ माना जाता है।
  • गुरु काल में यह अमृतसर-लाहौर शाही मार्ग पर महत्वपूर्ण विश्राम स्थल था।
  • क्षेत्र में मौजूद पिपल के पेड़ों के कारण इसका नाम पिपली साहिब से जुड़ा माना जाता है।
  • यहां संगत और पंगत यानी लंगर की परंपरा विकसित हुई।
  • दरबार साहिब के पवित्र सरोवर के निर्माण और सेवा के लिए आने वाली संगत के ठहरने व भोजन की व्यवस्था यहां की जाती थी।
  • वर्ष 1586 में भाई गुरदास के यात्रा से लौटने का भी ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।

FAQ Section:

Q1. गुरुद्वारा पिपली साहिब कहां स्थित है?
गुरुद्वारा पिपली साहिब अमृतसर में पुतलीघर चौक से इस्लामाबाद बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित है।

Q2. गुरुद्वारा पिपली साहिब किस गुरु से जुड़ा है?
गुरुद्वारा पिपली साहिब का इतिहास सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी से जुड़ा हुआ माना जाता है।

Q3. पिपली साहिब नाम क्यों पड़ा?
ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, उस समय इस क्षेत्र में कई पिपल के पेड़ थे। इसी वजह से यह स्थान पिपली साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

Q4. गुरु काल में इस स्थान का क्या महत्व था?
यह अमृतसर-लाहौर मार्ग पर एक महत्वपूर्ण विश्राम स्थल था। साथ ही यहां आने वाली संगत के लिए भोजन और ठहरने की व्यवस्था की जाती थी।

Q5. क्या पिपली साहिब का संबंध दरबार साहिब की सेवा से भी था?
हां, ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार दरबार साहिब के पवित्र सरोवर के निर्माण और सेवा के लिए बाहर से आने वाली संगत यहां रुकती थी और उनके लिए लंगर व आवास की व्यवस्था होती थी।

Conclusion:

गुरुद्वारा पिपली साहिब अमृतसर की उन ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है, जो आधुनिक शहर के बीच गुरु काल की यादों को संजोए हुए हैं। गुरु अर्जन देव जी से जुड़ी परंपराओं, संगत-पंगत की व्यवस्था और दरबार साहिब की सेवा से जुड़े प्रसंग इस स्थान को सिख इतिहास में विशेष महत्व देते हैं। आज आसपास भले ही व्यस्त बाजार और सड़कें हों, लेकिन पिपली साहिब अमृतसर के पुराने इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है।Screenshot_1505

Edited By: Atul Sharma

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