मालेरकोटला में ज़कात सेंटर की पहल से बदली 476 जरूरतमंदों की ज़िंदगी

रोज़गार, उच्च शिक्षा और मासिक सहायता पर फोकस, कई लाभार्थी अब खुद बन रहे दाता

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मालेरकोटला स्थित ज़कात सेंटर ऑफ इंडिया की स्थानीय इकाई ने 2022 से अब तक 476 जरूरतमंद लोगों और उनके परिवारों को रोज़गार, उच्च शिक्षा और मासिक वित्तीय सहायता देकर आत्मनिर्भर बनाने में मदद की है।

स्थानीय मुस्लिम संगठनों के उत्साही कार्यकर्ताओं ने Zakat Centre of India की मालेरकोटला इकाई के बैनर तले कई जरूरतमंद परिवारों की ज़िंदगी बदलने में सफलता हासिल की है।

साल 2022 में संगठन की स्थापना के बाद से, अध्यक्ष मोहम्मद ताज राणा के नेतृत्व में पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने 476 लोगों और उनके आश्रित परिवारों को रोज़गार उपलब्ध कराने, उच्च शिक्षा दिलाने और नियमित मासिक वित्तीय सहायता (समावात) देकर सहयोग किया है।

Jamaat-e-Islami Hind, मालेरकोटला के पदाधिकारी मोहम्मद इरशाद ने सराहना करते हुए कहा कि ज़कात सेंटर की स्थानीय इकाई ने रमज़ान से जुड़े ज़कात के संग्रह और उसके उचित उपयोग के प्रति जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि कई मुस्लिम रमज़ान के पवित्र महीने में अपनी सालाना अनिवार्य 2.5 प्रतिशत संपत्ति ज़कात के रूप में अदा करना पसंद करते हैं।

इरशाद ने कहा कि आम तौर पर दानदाता अपनी दी गई राशि के अंतिम उपयोग की निगरानी नहीं कर पाते, जबकि ज़कात सेंटर लाभार्थियों को व्यवसाय या शैक्षणिक पाठ्यक्रम शुरू करने के बाद मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता भी प्रदान करता है।

संस्था के सचिव आदिल खान ने बताया कि स्थानीय ज़कात सेंटर, केंद्रीय निकाय के अधीन कार्यरत 34 इकाइयों में से एक है और पिछले चार वर्षों से सक्रिय है। उन्होंने कहा कि आपदा या प्राकृतिक calamity जैसे बाढ़ के समय संगठन सभी समुदायों की सहायता करता है, लेकिन आजीविका, उच्च शिक्षा और मासिक पेंशन इसकी तीन प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं।

निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत संस्था तीन प्रमुख क्षेत्रों में अधिकतम 50,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता के लिए आवेदन आमंत्रित करती है—

  • आजीविका (60 प्रतिशत बजट)

  • उच्च शिक्षा (20 प्रतिशत)

  • मवासात/मासिक पेंशन (1,000 रुपये प्रतिमाह – 20 प्रतिशत)

पदाधिकारियों ने संतोष जताया कि कई लाभार्थी अब मोटरबाइक रेहड़ी, ई-रिक्शा, गली-मोहल्लों की किराना दुकान, चाय स्टॉल, सब्जी-फल विक्रय, कढ़ाई-बुटीक और हेयरकटिंग सैलून जैसे छोटे व्यवसायों के जरिए आत्मनिर्भर बन चुके हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें से कई लोग अब ज़कात लेने के बजाय स्वयं जरूरतमंदों को दान देने लगे हैं।Screenshot_1529

Edited By: Karan Singh

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