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बैसाखी से पहले ‘छज्ज’ की परंपरा पड़ रही फीकी, आधुनिकता के बीच खोती जा रही विरासत
कभी हर घर की जरूरत थे अनाज साफ करने वाले छज्ज, अब बाजार और मांग के अभाव में संकट में कारीगर
बैसाखी के अवसर पर ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा रहे ‘छज्ज’ अब धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। आधुनिक मशीनों और बदलती जीवनशैली के कारण इस पारंपरिक कला से जुड़े कारीगरों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
जैसे-जैसे Baisakhi का पर्व नजदीक आता है, कुछ साल पहले तक गांवों में महिलाओं को ‘छज्ज’—एक सपाट और हल्का मुड़ा हुआ टोकरी जैसा बर्तन—से अनाज फटकते हुए देखना आम बात होती थी।
ये छज्ज हवा की मदद से गेहूं, चावल और अन्य अनाज से भूसी अलग करने में उपयोग किए जाते थे। कभी लगभग हर घर में मौजूद रहने वाला यह सामान अब धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है और आजकल बहुत कम देखने को मिलता है।
इस परंपरा के खत्म होने में आधुनिक तकनीक और मशीनों का बड़ा योगदान रहा है, जिसने पारंपरिक तरीकों की जगह ले ली है।
खन्ना में अभी भी कुछ महिलाएं ऐसे छज्ज बनाने का काम कर रही हैं, लेकिन उनका कहना है कि उचित बाजार और ग्राहकों की कमी के कारण इस कला को आजीविका के रूप में बनाए रखना मुश्किल हो गया है।
खन्ना के मीट मार्केट के पास रहने वाली एक महिला ऐसे छज्ज और मिट्टी के गुल्लक बनाती हैं। वह इन्हें दुकानदारों को बेचती हैं, जो बाद में इन्हें ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचते हैं।
चप्पर गांव के निवासी शरणजीत बोपराय ने बताया कि पहले हर घर में ऐसे छज्ज आसानी से मिल जाते थे, लेकिन अब ग्रामीण घरों में भी यह नहीं मिलते। उन्होंने कहा, “शादी के सीजन में अब इन्हें बाजार से खरीदना पड़ता है।”
स्थानीय निवासी नीरा ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए छज्ज खरीदे थे और उनमें रंग-बिरंगे कवर लगाकर दहेज (ट्रूसो) रखा गया। “ये बहुत सुंदर और अलग दिख रहे थे,” उन्होंने कहा।
