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1984 सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार, BJP के 'जख्म 84' कार्यक्रम में पीड़ितों ने सुनाई रूह कंपा देने वाली आपबीती
Sub-Title: महिलाओं के साथ यौन हिंसा, परिवारों की हत्या और घरों को जलाने की घटनाओं का किया जिक्र; पीड़ितों ने राहुल गांधी को परिवार और कांग्रेस की भूमिका पर खुली बहस की चुनौती दी।
1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों ने BJP के 'जख्म 84' सम्मेलन में चार दशक पुरानी दर्दनाक घटनाओं को याद किया। पीड़ितों ने आरोप लगाया कि इतने वर्षों बाद भी उन्हें पूरा न्याय नहीं मिला है। उन्होंने कांग्रेस और तत्कालीन सरकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी को खुली बहस की चुनौती दी।
1984 के सिख विरोधी दंगों का दर्द आज भी उन परिवारों के दिलों में जिंदा है, जिन्होंने उस दौर में अपने परिजनों, घरों और अपनों को खोया था। घटना के चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई पीड़ित परिवार न्याय की लड़ाई जारी रखे हुए हैं। इसी दर्द और संघर्ष की कहानियां BJP के 'जख्म 84' सम्मेलन के दूसरे सत्र में सामने आईं।
'द सिख मैसकर: व्हेन एंड हाउ' विषय पर आयोजित इस सत्र में दंगा पीड़ितों ने अपने साथ हुई कथित ज्यादतियों और परिवारों पर हुए हमलों की आपबीती सुनाई। उन्होंने आरोप लगाया कि 1984 की हिंसा कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित साजिश थी।
पीड़ितों ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने न तो उनसे माफी मांगी और न ही उनके जख्मों को भरने के लिए पर्याप्त प्रयास किए। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अपने परिवार, पार्टी और कांग्रेस सरकारों की भूमिका पर खुली बहस करने की चुनौती भी दी।
महिलाओं के साथ अत्याचार और परिवारों की दर्दनाक कहानियां
सम्मेलन में भागी कौर ने 1984 की हिंसा के दौरान महिलाओं के साथ हुई कथित बर्बरता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस समय कई महिलाओं को गंभीर हिंसा और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।
उन्होंने किशोरी लाल नामक व्यक्ति पर सात सिखों की हत्या करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उसने कथित तौर पर कसाई के औजार जैसी धारदार वस्तु से हत्याएं की थीं।
भागी कौर ने यह भी आरोप लगाया कि तत्कालीन शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदलवाने का प्रयास किया था। ये आरोप सम्मेलन में पीड़िता द्वारा लगाए गए थे।
चार बहनों को खाट के नीचे छिपाकर बचाया गया
सम्मेलन में सतपाल कौर ने अपनी दर्दनाक कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि 1984 में जब हिंसा हुई, तब उनकी उम्र महज 11 साल थी। उस समय पड़ोसियों ने उन्हें और उनकी चार बहनों को एक खाट के नीचे छिपाकर उनकी जान बचाई थी।
बाद में पांचों बहनों को नारी निकेतन में रखा गया। सतपाल कौर के अनुसार, वकील एचएस फूलका ने उनका पता लगाया और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें उनके नाना की देखरेख में सौंपने में मदद की।
उन्होंने बताया कि इतनी कठिन परिस्थितियों से गुजरने के बावजूद उन्हें आज तक न नौकरी मिली और न ही पेंशन। परिवार का पालन-पोषण करने के लिए उनकी बहनों को घरों में बर्तन धोने जैसे काम करने पड़े।
लकवाग्रस्त रिटायर्ड आर्मी कैप्टन को जिंदा जलाने का आरोप
एक अन्य पीड़ित ने रिटायर्ड आर्मी कैप्टन घुमन सिंह चहल की हत्या की दर्दनाक घटना का जिक्र किया। उनके मुताबिक, कैप्टन चहल लकवाग्रस्त थे और हमले के दौरान उन्हें कथित तौर पर उनके ही घर में जिंदा जला दिया गया।
पीड़ित ने बताया कि आगजनी में उनके बेटे की शैक्षणिक डिग्रियां भी नष्ट हो गईं। इस घटना ने परिवार को गहरा नुकसान पहुंचाया।
निरप्रीत कौर ने सुनाई दिल्ली में हुए हमले की कहानी
सम्मेलन में निरप्रीत कौर ने भी अपनी आपबीती साझा की। उन्होंने बताया कि 1984 में उनकी उम्र 16 साल थी और वह दिल्ली की पावर कॉलोनी में अपने परिवार के साथ रहती थीं।
उनके अनुसार, 31 अक्टूबर को बलवान खोखर उनके घर आए और उनके भाई को ड्राइवर की नौकरी दिलाने की बात कही। निरप्रीत ने आरोप लगाया कि यह परिवार के सदस्यों की संख्या जानने की एक चाल थी।
उन्होंने बताया कि उसी रात दो पुलिसकर्मियों ने परिवार को सुरक्षा देने का भरोसा दिलाया था, लेकिन अगले दिन भीड़ ने उनके घर को घेर लिया।
निरप्रीत कौर ने आरोप लगाया कि इस भीड़ में बलवान खोखर और कृष्णा खोखर भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि उनके नौ वर्षीय भाई को निशाना बनाया गया और परिवार को करीब चार घंटे तक हमले का सामना करना पड़ा।
पुलिस पर समझौते का दबाव बनाने का आरोप
निरप्रीत कौर के मुताबिक, हमले के दौरान उनके परिवार का ट्रक आग के हवाले कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने परिवार पर समझौता करने का दबाव बनाया। इसके बाद उनके घर पर दोबारा हमला हुआ।
उन्होंने सज्जन कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने पुलिस की जीप के सामने खड़े होकर भीड़ को उकसाया था। निरप्रीत ने बताया कि एयरफोर्स के विंग कमांडर एनएस पन्नू की मदद से कई लोगों की जान बच सकी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उन्हें TADA के तहत गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ समेत अलग-अलग जेलों में रखा गया। उनके पति की भी कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई।
निरप्रीत कौर ने बताया कि नानावती आयोग और उनके पिता के मामले को दोबारा खोले जाने के बावजूद न्याय के लिए उनकी लड़ाई कई वर्षों तक जारी रही।
राहुल गांधी को खुली बहस की चुनौती
'जख्म 84' सम्मेलन में पीड़ितों ने कांग्रेस और गांधी परिवार की भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 1984 की हिंसा के पीड़ितों को आज भी न्याय और उचित सहायता का इंतजार है।
पीड़ितों ने राहुल गांधी को खुली बहस की चुनौती देते हुए कहा कि 1984 की घटनाओं, कांग्रेस पार्टी और उस समय की सरकारों की भूमिका पर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए।
उनका कहना था कि पीड़ित परिवारों के दर्द और न्याय की मांग को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
Key Highlights:
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BJP के 'जख्म 84' सम्मेलन के दूसरे सत्र में 1984 दंगा पीड़ितों ने आपबीती सुनाई।
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पीड़ितों ने चार दशक बाद भी न्याय नहीं मिलने की बात कही।
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सतपाल कौर ने बताया कि 11 साल की उम्र में पड़ोसियों ने उन्हें और उनकी चार बहनों को छिपाकर बचाया था।
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रिटायर्ड आर्मी कैप्टन घुमन सिंह चहल को घर में जिंदा जलाए जाने का आरोप सामने आया।
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निरप्रीत कौर ने दिल्ली में अपने परिवार पर हुए हमले की कहानी साझा की।
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कांग्रेस और तत्कालीन सरकारों की भूमिका पर सवाल उठाए गए।
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पीड़ितों ने राहुल गांधी को खुली बहस की चुनौती दी।
FAQ Section
1. BJP का 'जख्म 84' सम्मेलन किस मुद्दे पर आयोजित किया गया?
यह सम्मेलन 1984 के सिख विरोधी दंगों और उन घटनाओं के पीड़ितों के संघर्ष तथा न्याय की मांग पर केंद्रित था।
2. सतपाल कौर के साथ 1984 में क्या हुआ था?
सतपाल कौर ने बताया कि उस समय वह 11 साल की थीं। पड़ोसियों ने उन्हें और उनकी चार बहनों को खाट के नीचे छिपाकर बचाया था।
3. घुमन सिंह चहल कौन थे?
घुमन सिंह चहल एक रिटायर्ड आर्मी कैप्टन थे। सम्मेलन में एक पीड़ित ने आरोप लगाया कि लकवाग्रस्त होने के बावजूद उन्हें उनके घर में जिंदा जला दिया गया।
4. निरप्रीत कौर ने सम्मेलन में क्या आरोप लगाए?
उन्होंने दिल्ली में अपने परिवार पर हुए हमले, पुलिस की कथित भूमिका, घर में आगजनी और न्याय के लिए लंबे संघर्ष के बारे में बताया।
5. पीड़ितों ने राहुल गांधी को क्या चुनौती दी?
पीड़ितों ने राहुल गांधी को 1984 की हिंसा में उनके परिवार, कांग्रेस पार्टी और तत्कालीन कांग्रेस सरकारों की भूमिका पर खुली बहस करने की चुनौती दी।
Conclusion:
1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की आपबीती एक बार फिर देश के सामने उस दर्दनाक दौर की यादें लेकर आई है। BJP के 'जख्म 84' सम्मेलन में सामने आई कहानियों ने न्याय, जवाबदेही और पीड़ित परिवारों के पुनर्वास से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। चार दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी कई पीड़ितों की न्याय की मांग जारी है। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

