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मोहाली नेक्स्ट जनरेशन रोड प्रोजेक्ट में बोली प्रक्रिया आगे बढ़ी, 673.99 करोड़ की सबसे कम बोली
हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद वित्तीय बोली खुली, अंतिम फैसला अदालत पर निर्भर
पंजाब सरकार ने मोहाली नेक्स्ट जनरेशन रोड प्रोजेक्ट के लिए वित्तीय बोलियां खोल दी हैं। गावर कंस्ट्रक्शन लिमिटेड सबसे कम बोलीदाता बनी, लेकिन परियोजना का आवंटन हाईकोर्ट के फैसले पर निर्भर रहेगा।
पंजाब सरकार ने मोहाली नेक्स्ट जनरेशन रोड्स प्रोग्राम को लेकर बड़ी प्रगति करते हुए वित्तीय बोलियां खोल दी हैं, जबकि इस मामले पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका लंबित है।
इस परियोजना के लिए गावर कंस्ट्रक्शन लिमिटेड ने 673.99 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली लगाई है, जो संशोधित परियोजना लागत 666.41 करोड़ रुपये से थोड़ी अधिक है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, पांच में से चार कंपनियां तकनीकी मूल्यांकन में सफल रहीं और उनकी वित्तीय बोलियां खोली गईं। VRC कंस्ट्रक्शंस (इंडिया) लिमिटेड को तकनीकी चरण में अयोग्य घोषित कर दिया गया।
अब सबसे कम बोलीदाता को कार्य आवंटित करने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन यह आवंटन हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 1 अप्रैल को निर्धारित है।
इससे पहले 27 फरवरी को हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति लीसा गिल और न्यायमूर्ति रमेश चंदर डिमरी शामिल थे, ने स्पष्ट किया था कि किसी भी कार्य का आवंटन अदालत के अंतिम फैसले के अधीन होगा।
अदालत ने राज्य सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया था, क्योंकि ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा दिया गया संक्षिप्त हलफनामा मुख्य मुद्दों को संबोधित नहीं कर पाया था।
यह परियोजना शुरू से ही विवादों में रही है। 18 जनवरी को सामने आने के बाद से इसकी लागत—लगभग 10 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर—और 10 साल के आउटसोर्सिंग मॉडल को लेकर काफी बहस हुई।
इस मामले में GMADA कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन समेत अन्य ने याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 11 जनवरी 2026 को जारी टेंडर नोटिस इस तरह बनाया गया था कि पहले से पंजीकृत ठेकेदारों को बाहर रखा जा सके। साथ ही, इसमें जॉइंट वेंचर का विकल्प नहीं दिया गया और बिना विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के ही टेंडर जारी कर दिया गया।
इस परियोजना को केएपी सिन्हा की अध्यक्षता में हुई GMADA की 40वीं बैठक में सैद्धांतिक मंजूरी मिली थी। बाद में कार्य क्षेत्र में बदलाव का हवाला देते हुए परियोजना लागत को 783.46 करोड़ रुपये से घटाकर 666.41 करोड़ रुपये कर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ता प्रारंभिक अनुमान में कमी का प्रमाण मान रहे हैं।

