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सेक्टर-26 मंडी सफाई व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, दो हफ्ते में मांगी ताजा रिपोर्ट
आउटसोर्स कर्मचारियों पर निर्भरता पर सवाल, खाली पद को सैनिटरी इंस्पेक्टर में बदला गया
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेक्टर-26 मंडी की सफाई व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए दो हफ्ते में ताजा तस्वीरें और रिपोर्ट पेश करने को कहा है। प्रशासन ने एक खाली पद को सैनिटरी इंस्पेक्टर में बदलने की जानकारी दी।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सेक्टर-26 सब्जी मंडी में सफाई व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासन से दो हफ्तों के भीतर ताजा स्थिति की तस्वीरें प्रस्तुत करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजय बेरी की खंडपीठ के समक्ष यूटी के वरिष्ठ स्थायी वकील अमित झांजी ने बताया कि सफाई व्यवस्था की निगरानी के लिए एक खाली पद को पुनः नामित (री-डिज़ाइन) किया गया है।
उन्होंने 17 मार्च के एक पत्र का हवाला देते हुए बताया कि मार्केट कमेटी में नया पद बनाने की बजाय “ऑक्शन रिकॉर्डर” के एक खाली पद को “सैनिटरी इंस्पेक्टर” में बदल दिया गया है, ताकि नगरपालिका से जुड़े कार्यों, विशेषकर मंडी की सफाई व्यवस्था, की देखरेख की जा सके।
यह मामला कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) के तहत उठाया गया था, जो एक समाचार रिपोर्ट में मंडी की खराब सफाई व्यवस्था के आधार पर शुरू हुआ।
प्रशासन ने कोर्ट को यह भी बताया कि मार्केट कमेटी में स्थायी रूप से सैनिटरी इंस्पेक्टर का पद सृजित करने के लिए राज्य कृषि विपणन बोर्ड से मंजूरी मांगी गई है, लेकिन भर्ती नियम बनाने की प्रक्रिया में समय लग सकता है।
अमित झांजी ने कहा कि भर्ती नियम तैयार करने के लिए समय चाहिए और जल्द ही एक शपथपत्र के जरिए इसकी समय-सीमा अदालत के सामने रखी जाएगी। यह नियुक्ति या तो प्रतिनियुक्ति (deputation) से होगी या सीधे भर्ती के माध्यम से।
कोर्ट ने 17 मार्च के पत्र को रिकॉर्ड में लेते हुए मंडी की मौजूदा स्थिति का आकलन करने के लिए ताजा तस्वीरें मांगी हैं। अदालत ने कहा कि पहले पेश की गई तस्वीरें 2025 के अंत की थीं, इसलिए अब अलग-अलग एंगल से वर्तमान तस्वीरें ली जाएं ताकि यह देखा जा सके कि पहले की अव्यवस्था को सुधारा गया है या नहीं, प्लेटफॉर्म ठीक किए गए हैं या नहीं और सफाई व्यवस्था में सुधार हुआ है या नहीं।
अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया दो हफ्तों में पूरी करने का निर्देश दिया है।
अपने पहले के आदेश में अदालत ने यह भी सवाल उठाया था कि जरूरी नगरपालिका कार्यों को पूरी तरह आउटसोर्स कर्मचारियों के जरिए कराना कितना वैध है। कोर्ट ने कहा था कि इससे निगरानी कमजोर होती है और अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल अनुबंध समाप्त करने तक सीमित रह जाती है।
