पश्चिम एशिया संकट का असर: दवाइयों, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल डिवाइस उद्योग पर बढ़ा दबाव

कच्चे माल की कमी, लागत में भारी बढ़ोतरी और सप्लाई में देरी से उद्योग चिंतित

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पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ फार्मा, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल डिवाइस उद्योग पर भी पड़ रहा है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ने और सप्लाई बाधित होने से उद्योग संकट में है।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट बनता जा रहा है। जहां आमतौर पर इसका असर तेल और ऊर्जा बाजारों पर दिखता है, वहीं अब इसके प्रभाव दवा, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल डिवाइस जैसे क्षेत्रों पर भी साफ नजर आ रहे हैं।

हरियाणा में 250 से अधिक फार्मास्युटिकल, कॉस्मेटिक्स और मेडिकल डिवाइस निर्माण इकाइयां हैं, जिनका सालाना टर्नओवर लगभग 5,000 करोड़ रुपये है। इस संकट के कारण कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी, सप्लाई में देरी और उद्योग के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, खासकर उन उत्पादों में जो पेट्रो-केमिकल्स पर निर्भर हैं।

फार्मा उद्योग पर इसका गहरा असर पड़ा है। पहले जो पैरासिटामोल 250–270 रुपये प्रति किलोग्राम मिलता था, अब उसकी कीमत 600–650 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है। एंटीबायोटिक्स की कीमतों में 20–30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह सर्जिकल आइटम और पैकेजिंग सामग्री (जैसे एल्युमिनियम फॉयल) के दाम भी 20–30 प्रतिशत बढ़ गए हैं।

इसके अलावा आयात-निर्यात की ढुलाई दरों में भी 20–30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।

आरएल शर्मा, हरियाणा फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष, ने कहा कि फार्मा उद्योग कई देशों पर निर्भर है और पश्चिम एशिया के संकट ने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। उन्होंने बताया कि कच्चा माल मुख्य रूप से चीन से आता है, जबकि पैकेजिंग सामग्री दक्षिण कोरिया से प्राप्त होती है। हवाई मार्गों पर प्रतिबंध के कारण सामग्री समय पर नहीं पहुंच पा रही है।

उन्होंने कहा कि इस वैश्विक निर्भरता के कारण एक क्षेत्र का संकट पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित करता है और अब चीन भी स्थिर आपूर्ति बनाए रखने में दबाव महसूस कर रहा है। उन्होंने सरकार से उद्योग को प्रोत्साहन देने की मांग की।

राजीव मल्होत्रा ने कहा कि कच्चे माल और पैकेजिंग की बढ़ती कीमतों के कारण समय पर ऑर्डर पूरा करना मुश्किल हो गया है।

कॉस्मेटिक्स उद्योग भी इससे अछूता नहीं है। रोहित गुप्ता ने बताया कि शैंपू, साबुन, कंडीशनर और क्रीम जैसे उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हुई है। सल्फर और प्रोपिलीन ग्लाइकोल जैसे प्रमुख तत्वों की कमी हो गई है और उनकी कीमतों में 70–90 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

पेट्रोलियम से बनने वाली पैकेजिंग सामग्री भी महंगी हो गई है, जिससे उत्पादन लागत और बढ़ गई है और कॉस्मेटिक्स उद्योग के लिए स्थिति और कठिन हो गई है।

मेडिकल डिवाइस उद्योग भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। सर्जिकल उपकरणों से लेकर डायग्नोस्टिक किट तक, सभी में आयातित धातु, प्लास्टिक और विशेष पुर्जों पर निर्भरता है। बढ़ती ढुलाई लागत और कच्चे माल की कमी के कारण इन उत्पादों की समय पर डिलीवरी करना मुश्किल होता जा रहा है।

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Edited By: Karan Singh

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