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HAU में 6 करोड़ का बायोगैस प्लांट बेकार, 31.53 लाख की शुद्धिकरण प्रणाली 7 साल से नहीं हुई चालू
ऑडिट रिपोर्ट में कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट और निगरानी पर उठे सवाल, समय पर आपूर्ति नहीं हुई और सिस्टम चालू किए बिना बैंक गारंटी भी जारी कर दी गई
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में कृषि अपशिष्ट से बायोगैस बनाने की करीब 6 करोड़ रुपये की परियोजना का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। ऑडिट में 31.53 लाख रुपये की बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली को गैर-उपयोगी खर्च बताया गया है।
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) में कृषि फार्म के कचरे से बायोगैस तैयार करने के लिए शुरू की गई करीब 6 करोड़ रुपये की परियोजना सवालों के घेरे में आ गई है। परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली सात साल से अधिक समय बीतने के बाद भी चालू नहीं हो सकी है।
Principal Accountant General (Audit) ने मामले को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। ऑडिट रिपोर्ट में 31.53 लाख रुपये की शुद्धिकरण प्रणाली पर किया गया खर्च ‘अनुत्पादक व्यय’ बताया गया है। साथ ही अनुबंध प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था में कमियों की ओर भी इशारा किया गया है।
31.53 लाख रुपये की प्रणाली का खर्च हुआ बेकार
ऑडिट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने 24 मई 2019 को संबंधित विभाग के पक्ष में 31,53,375 रुपये का अस्थायी अग्रिम जारी किया था। यह राशि कृषि महाविद्यालय एवं प्रौद्योगिकी विभाग के माध्यम से बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली खरीदने के लिए निकाली गई थी।टेंडर रिकॉर्ड की जांच के दौरान ऑडिट में पाया गया कि प्रक्रिया में केवल दो फर्मों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद मार्च 2019 में W2W Agri Biotech के पक्ष में सप्लाई ऑर्डर को मंजूरी दी गई।
कुल 70 लाख रुपये की थी प्रारंभिक मंजूरी
विश्वविद्यालय के कुलपति ने शुरुआत में इस खरीद के लिए 70 लाख रुपये की मंजूरी दी थी। इसमें फर्म द्वारा बताए गए खर्च का 50 प्रतिशत अग्रिम के रूप में जारी किया गया।
यह अग्रिम 31,53,400 रुपये की बैंक गारंटी के बदले फर्म को दिया गया था।
15 दिन में होनी थी सप्लाई, सात महीने से ज्यादा की देरी
सप्लाई ऑर्डर 26 अप्रैल 2019 को जारी किया गया था। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सामग्री की आपूर्ति 15 दिनों के भीतर पूरी की जानी थी।
लेकिन ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित सामग्री की आपूर्ति 23 दिसंबर 2019 को हुई। यानी निर्धारित समयसीमा के मुकाबले सप्लाई में सात महीने से अधिक की देरी हुई।
ई-वे बिल में भी सामने आया अंतर
ऑडिट ने सामग्री की कीमत को लेकर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, ई-वे बिल में सामान की कीमत 19,42,500 रुपये दिखाई गई थी, जबकि जारी किए गए अग्रिम की राशि इससे मेल नहीं खाती थी।
ऑडिट ने इस अंतर को भी रिकॉर्ड और अनुबंध प्रबंधन की निगरानी से जुड़ा महत्वपूर्ण बिंदु माना।
सिस्टम चालू नहीं हुआ, फिर भी बैंक गारंटी जारी
मामले में एक और बड़ी कमी बैंक गारंटी से जुड़ी पाई गई। ऑडिट के अनुसार, सामग्री की आपूर्ति के 30 दिनों के भीतर यानी 6 जनवरी 2020 को बैंक गारंटी जारी कर दी गई।
खास बात यह थी कि उस समय तक बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली चालू ही नहीं हुई थी।
ऑडिट ने यह भी पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में सामग्री की स्टॉक रजिस्टर में एंट्री का प्रमाण नहीं मिला। इसके अलावा, शर्तों के मुताबिक कुल लागत के पांच प्रतिशत के बराबर परफॉर्मेंस सिक्योरिटी की वसूली का भी रिकॉर्ड नहीं था।
सात साल बाद भी सिस्टम अधूरा क्यों?
ऑडिट ने सबसे अहम सवाल यही उठाया कि जब इस प्रणाली पर लाखों रुपये खर्च किए जा चुके थे, तो इसके बाद भी यह वर्षों तक अधूरी और गैर-उपयोगी कैसे बनी रही।
ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि सात साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली न तो पूरी तरह उपलब्ध कराई गई और न ही इसे चालू किया गया। इसके कारण 31,53,375 रुपये का खर्च निष्फल हो गया।
कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट और मॉनिटरिंग पर सवाल
ऑडिट ने इस पूरे मामले को अनुबंध प्रबंधन और निगरानी में कमी का संकेत बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने, सिस्टम की कमीशनिंग कराने और भुगतान से जुड़े सुरक्षा प्रावधानों की निगरानी में गंभीर खामियां दिखाई देती हैं।
इस मामले में विश्वविद्यालय की खरीद प्रक्रिया और परियोजना की निगरानी को लेकर जवाबदेही का सवाल भी उठ रहा है।
Key Highlights:
- HAU में करीब 6 करोड़ रुपये की कृषि अपशिष्ट आधारित बायोगैस परियोजना का उपयोग नहीं हो पा रहा।
- बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली पर 31,53,375 रुपये खर्च किए गए।
- सिस्टम सात साल से अधिक समय बाद भी चालू नहीं हुआ।
- Principal Accountant General (Audit) ने खर्च को ‘अनुत्पादक व्यय’ बताया।
- कुलपति ने खरीद के लिए शुरुआती तौर पर 70 लाख रुपये मंजूर किए थे।
- 31,53,400 रुपये की बैंक गारंटी के बदले 50 प्रतिशत अग्रिम जारी किया गया।
- सप्लाई 15 दिनों में होनी थी, लेकिन 23 दिसंबर 2019 को हुई।
- ई-वे बिल में सामान की कीमत 19,42,500 रुपये दर्ज थी।
- सिस्टम चालू होने से पहले ही 6 जनवरी 2020 को बैंक गारंटी जारी कर दी गई।
- स्टॉक रजिस्टर में सामग्री की एंट्री और 5 प्रतिशत परफॉर्मेंस सिक्योरिटी की वसूली का रिकॉर्ड नहीं मिला।
- ऑडिट ने कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट और निगरानी में कमियों की ओर इशारा किया।
FAQ Section:
सवाल: HAU की बायोगैस परियोजना कितनी लागत की है?
जवाब: कृषि फार्म के कचरे पर आधारित बायोगैस प्लांट परियोजना की लागत करीब 6 करोड़ रुपये बताई गई है।
सवाल: बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली पर कितना खर्च हुआ?
जवाब: ऑडिट के अनुसार, बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली के लिए 31,53,375 रुपये का खर्च किया गया।
सवाल: सिस्टम कितने समय से चालू नहीं हुआ है?
जवाब: ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, सात साल से अधिक समय बीतने के बावजूद सिस्टम चालू नहीं किया जा सका।
सवाल: बायोगैस सिस्टम की सप्लाई कब होनी थी?
जवाब: 26 अप्रैल 2019 के सप्लाई ऑर्डर के अनुसार सामग्री 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जानी थी, लेकिन इसकी आपूर्ति 23 दिसंबर 2019 को हुई।
सवाल: ऑडिट ने किन कमियों पर सवाल उठाए?
जवाब: ऑडिट ने सप्लाई में देरी, बैंक गारंटी समय से पहले जारी करने, स्टॉक रजिस्टर में एंट्री के अभाव, परफॉर्मेंस सिक्योरिटी की वसूली और कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट व निगरानी में कमियों पर सवाल उठाए।
Conclusion:
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की कृषि अपशिष्ट आधारित बायोगैस परियोजना में बायोगैस शुद्धिकरण प्रणाली का वर्षों तक चालू न होना सरकारी खर्च और परियोजना प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 31.53 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद सिस्टम का उपयोग नहीं हो सका। ऑडिट रिपोर्ट में सप्लाई में देरी से लेकर बैंक गारंटी जारी करने और सुरक्षा राशि की निगरानी तक कई कमियां दर्ज की गई हैं। अब इस मामले में जवाबदेही तय करने और परियोजना को उपयोग में लाने की दिशा में कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
