रेवाड़ी की मशहूर जूतियों पर मंडराया संकट, कभी देशभर में थी धाक; अब ब्रांडेड फुटवियर से घट रही मांग

‘ब्रास सिटी ऑफ इंडिया’ के नाम से पहचान रखने वाले रेवाड़ी में तिल्लेदार जूतियों की कारीगरी एक सदी से अधिक पुरानी, लेकिन मशीन से बने जूते-चप्पलों ने बढ़ाई चुनौती

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रेवाड़ी की पारंपरिक जूती बनाने की कला कभी शहर की पहचान हुआ करती थी। तिल्लेदार जूतियों पर बारीक जरदोजी और धातु के धागों से की गई कारीगरी देशभर में मशहूर थी, लेकिन अब बदलती पसंद और महंगे चमड़े ने कारीगरों की मुश्किल बढ़ा दी है।

 

हरियाणा का रेवाड़ी कभी अपनी पीतल की कारीगरी के साथ-साथ पारंपरिक जूतियों के लिए भी जाना जाता था। खास तौर पर तिल्लेदार जूतियां, जिन पर बारीक जरी और सुनहरे धागों से खूबसूरत डिजाइन बनाए जाते थे, शहर की खास पहचान थीं।

रेवाड़ी में जूती बनाने का काम एक सदी से भी ज्यादा पुराना है। शहर के कई इलाकों में यह कला पीढ़ियों से घर-घर में चली आ रही थी। लेकिन समय के साथ लोगों की पसंद बदलने, मशीन से बने फुटवियर के बढ़ते चलन और उत्पादन लागत बढ़ने के कारण यह पारंपरिक कुटीर उद्योग अब मुश्किल दौर से गुजर रहा है।

इन इलाकों में होती थी जूती बनाने की कारीगरी

रेवाड़ी में सांघी का बास, कटोपार, रामपुरा, बिजलीघर, बीकानेर, गढ़ी बोलनी और तुर्कियावास जैसे इलाके पुराने समय से जूती बनाने के प्रमुख केंद्र रहे हैं।

यहां पुरुष जूतियों का निर्माण करते थे, जबकि महिलाएं उन पर धागों और धातु से बारीक डिजाइन तैयार करती थीं। स्थानीय चमड़ा कारीगर राम चंदर के अनुसार, महिलाओं की कढ़ाई और डिजाइन जूतियों की खूबसूरती को अलग पहचान देती थी।

दिल्ली के बड़े शोरूम तक पहुंचती थीं रेवाड़ी की जूतियां

रेवाड़ी में तैयार की गई जूतियों की मांग इतनी अधिक थी कि इन्हें दिल्ली के बड़े शोरूम तक भेजा जाता था। वहां इन पारंपरिक जूतियों को ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रदर्शित किया जाता था।

इस कारोबार से जुड़े पुराने कारीगरों के मुताबिक, रेवाड़ी की जूतियों ने लंबे समय तक देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बनाए रखी।

दारा सिंह समेत कई फिल्मी सितारों को पसंद थीं जूतियां

रेवाड़ी की जूतियों की लोकप्रियता आम ग्राहकों तक सीमित नहीं थी। स्थानीय लोगों और पुराने कारीगरों को याद है कि देश के कई फिल्मी सितारे भी इन जूतियों को पसंद करते थे।

रेवाड़ी के कांग्रेस नेता और नगर पार्षद प्रवीण चौधरी के अनुसार, प्रसिद्ध पहलवान और अभिनेता दारा सिंह रेवाड़ी से अपना खुस्सा मंगवाते थे। उनके परिवार के लोग भी लंबे समय से जूती बनाने के काम से जुड़े रहे हैं।

उनके मुताबिक, कई अन्य अभिनेता भी फिल्मों में और निजी जीवन में रेवाड़ी की जूतियां पहनते थे। रेवाड़ी में बनी जूतियां राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक भेजी जाती थीं।

फैशनेबल फुटवियर के सामने फीकी पड़ी पारंपरिक जूतियां

जिस तरह समय के साथ रेवाड़ी के मशहूर पीतल उद्योग की चमक स्टील और दूसरे आधुनिक उत्पादों के सामने कम हुई, उसी तरह पारंपरिक जूतियों का बाजार भी प्रभावित हुआ है।

आज की युवा पीढ़ी आरामदायक और आधुनिक फुटवियर को अधिक प्राथमिकता देती है। लोगों की बढ़ती क्रय क्षमता के साथ बाजार में ब्रांडेड और मशीन से बने जूते, सैंडल और चप्पलों की मांग बढ़ी है।

इसके चलते हाथ से तैयार होने वाली पारंपरिक जूतियों की बिक्री पर असर पड़ा है।

रेलवे रोड पर अब गिनी-चुनी दुकानें

रेवाड़ी में जूतियों की बिक्री करने वाली दुकानों की संख्या में भी काफी कमी आई है। अब शहर के रेलवे रोड पर ही कुछ गिनी-चुनी जूती की दुकानें दिखाई देती हैं।

इससे पारंपरिक जूती बनाने वाले उन कारीगरों की आजीविका पर भी संकट बढ़ गया है, जिन्होंने यह हुनर अपने माता-पिता और बुजुर्गों से सीखा था।

महंगा चमड़ा और कम मजदूरी बनी बड़ी चुनौती

लंबे समय से जूती बनाने वाले चमड़ा कारीगर गोपाल दास मौजूदा स्थिति को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि चमड़े की कीमत लगातार बढ़ी है, जबकि मेहनत के मुकाबले मिलने वाली मजदूरी और कमाई पर दबाव बढ़ गया है।

ऐसे में कारीगरों के लिए पारंपरिक तरीके से जूती बनाकर परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

पीढ़ियों पुरानी कला के अस्तित्व पर सवाल

रेवाड़ी की जूती निर्माण कला सिर्फ एक कारोबार नहीं, बल्कि शहर की पुरानी हस्तकला और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। अगर बाजार और आय के अवसर लगातार कम होते रहे, तो नई पीढ़ी के कारीगर इस पेशे से दूरी बना सकते हैं।

इससे पीढ़ियों से चली आ रही तिल्लेदार जूती और हाथ से कढ़ाई की पारंपरिक कला के भविष्य को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।

Key Highlights:

  • रेवाड़ी कभी पीतल के साथ पारंपरिक जूतियों के लिए भी प्रसिद्ध था।
  • तिल्लेदार जूतियां बारीक जरी और सुनहरे धागों की कारीगरी के लिए जानी जाती थीं।
  • रेवाड़ी में जूती बनाने का काम 100 साल से अधिक पुराना बताया जाता है।
  • सांघी का बास, कटोपार, रामपुरा और गढ़ी बोलनी समेत कई इलाके इसके पुराने केंद्र रहे हैं।
  • महिलाओं द्वारा जूतियों पर बारीक डिजाइन और कढ़ाई की जाती थी।
  • रेवाड़ी की जूतियां दिल्ली के बड़े शोरूम और कई राज्यों तक भेजी जाती थीं।
  • दारा सिंह समेत कई फिल्मी सितारों के रेवाड़ी की जूतियां पहनने का उल्लेख मिलता है।
  • मशीन से बने और ब्रांडेड फुटवियर की बढ़ती मांग से पारंपरिक जूतियों का बाजार घटा है।
  • रेलवे रोड पर अब जूती की कुछ ही दुकानें बची हैं।
  • महंगे चमड़े और कम होती कमाई से कारीगर आर्थिक मुश्किलों में हैं।

FAQ Section:

सवाल: रेवाड़ी किस तरह की जूतियों के लिए प्रसिद्ध था?

जवाब: रेवाड़ी खास तौर पर तिल्लेदार जूतियों के लिए प्रसिद्ध था, जिन पर जरी और धातु के धागों से बारीक डिजाइन तैयार किए जाते थे।

सवाल: रेवाड़ी में जूती बनाने का काम कितना पुराना है?

जवाब: रेवाड़ी में जूती बनाने की कारीगरी एक सदी से भी अधिक पुरानी बताई जाती है।

सवाल: रेवाड़ी की जूतियां कहां तक भेजी जाती थीं?

जवाब: रेवाड़ी की पारंपरिक जूतियां राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई क्षेत्रों में भेजी जाती थीं।

सवाल: रेवाड़ी की पारंपरिक जूतियों का कारोबार क्यों घट रहा है?

जवाब: मशीन से बने और ब्रांडेड फुटवियर की बढ़ती मांग, बदलती उपभोक्ता पसंद और बढ़ती उत्पादन लागत ने पारंपरिक जूती कारोबार को प्रभावित किया है।

सवाल: जूती कारीगरों के सामने क्या मुश्किलें हैं?

जवाब: कारीगरों के अनुसार चमड़े की लागत बढ़ गई है, जबकि उनकी मेहनत के अनुरूप कमाई और मजदूरी पर दबाव है। इससे इस पारंपरिक काम से जुड़े परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

Conclusion:

रेवाड़ी की तिल्लेदार जूतियां कभी शहर की पहचान और स्थानीय कारीगरों की रोजी-रोटी का मजबूत आधार थीं। दिल्ली से लेकर कई राज्यों तक इनकी मांग रही और फिल्मी सितारों के बीच भी इनकी लोकप्रियता का उल्लेख मिलता है। लेकिन आधुनिक और ब्रांडेड फुटवियर के बढ़ते बाजार ने इस पारंपरिक कला को कमजोर कर दिया है। महंगा कच्चा माल और घटती कमाई के बीच अब जरूरत इस बात की है कि रेवाड़ी की इस विरासत को नए बाजार, डिजाइन और उचित समर्थन के जरिए बचाने की कोशिश की जाए।Screenshot_1275

Edited By: Atul Sharma

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