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520 करोड़ के CMR घोटाले में 58 राइस मिलों की जांच में बड़ी अनियमितताएं उजागर
डिफॉल्टर मिलरों की संपत्तियों पर समय पर कार्रवाई न होने से सरकार को भारी नुकसान
राइस मिलों द्वारा 520 करोड़ रुपये के कस्टम मिल्ड राइस (CMR) की आपूर्ति न करने के मामले में जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं, जिनमें संपत्तियों की कुर्की और नीलामी में लापरवाही शामिल है।
58 राइस मिलों की जांच के दौरान गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं, जिन्होंने 2013-14 से 2024-25 के बीच सरकार को लगभग 520 करोड़ रुपये का कस्टम मिल्ड राइस (CMR) नहीं दिया।
यह जांच उपायुक्त उत्तम सिंह द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने की, जिसका उद्देश्य डिफॉल्टर मिलरों और उनके गारंटरों की संपत्तियों की स्थिति का आकलन करना था।
इस समिति में तहसीलदार संदीप शर्मा, जिला राजस्व लेखाकार राकेश मित्तल और खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के एक प्रतिनिधि शामिल थे।
जांच में पाया गया कि 2013-14 सीजन में 16 मिलें डिफॉल्टर थीं, लेकिन इनमें से छह के खिलाफ संपत्ति कुर्क करने की कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस देरी के कारण एक संपत्ति को बेच दिया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मिलों को धान आवंटित किया गया, जबकि उनकी जमीन पहले से ही डिफॉल्टर इकाइयों से जुड़ी हुई थी। इसके बावजूद, मिलरों ने अपनी इकाइयों के नाम बदलकर नए आवंटन हासिल कर लिए।
जिला राजस्व अधिकारी (DRO) मनीष कुमार यादव ने बताया कि समय पर संपत्तियों की कुर्की और नीलामी न होने के कारण डिफॉल्टर मिलर नई पहचान के साथ अपना कारोबार जारी रखते रहे।
नीलोखेड़ी के एक मामले में भी अनियमितता सामने आई, जहां विभाग ने संपत्ति कुर्क न करने का कारण लंबित मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) बताया। हालांकि, भौतिक जांच में पाया गया कि मूल मालिकों ने संपत्ति बेच दी थी और वहां एक नई इकाई काम कर रही थी।
एक अन्य मामले में, 2013-14 में लगभग 7.75 करोड़ रुपये के बकायेदार एक मिल को 2019-20 के आसपास बेच दिया गया। विभाग का कहना था कि मिल मालिकों को जेल भेजा गया था और बाद में रिहा कर दिया गया, लेकिन जांच में पाया गया कि जमीन समतल कर दी गई थी और अब विभाग के पास उस पर कोई कब्जा नहीं है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एफआईआर दर्ज की गई और संपत्ति कुर्क करने की प्रारंभिक कार्रवाई भी हुई, लेकिन नुकसान की भरपाई के लिए नीलामी नहीं कराई गई।
कुछ मामलों में वसूली इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि मिलें किराए की जमीन पर चल रही थीं और डिफॉल्टरों के नाम पर कोई संपत्ति नहीं थी।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ मामलों में संपत्तियों को कुर्क करने के बावजूद राजस्व विभाग ने संबंधित विभाग की अनुमति के बिना ही जमीन का पंजीकरण कर दिया, जिससे मामले और जटिल हो गए।
