- Hindi News
- राज्य
- हरियाणा
- रोहतक PGIMS की डॉक्टर ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च को राष्ट्रीय पहचान, छाती में भूरा मवाद जमा होने वाली
रोहतक PGIMS की डॉक्टर ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च को राष्ट्रीय पहचान, छाती में भूरा मवाद जमा होने वाली दुर्लभ बीमारी पर किया अध्ययन
थोरैसिक अमीबायसिस के लक्षणों को केवल टीबी समझने की गलती न करें, समय पर पहचान और इलाज से बड़ी सर्जरी के बिना भी हो सकती है पूरी रिकवरी
रोहतक PGIMS के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इस शोध में एक दुर्लभ बीमारी के बारे में बताया गया है, जिसमें छाती की झिल्ली के आसपास मवाद जमा हो जाता है।
डॉ. ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च को मिली राष्ट्रीय पहचान
हरियाणा के रोहतक स्थित PGIMS की डॉक्टर ग्रंथिका शर्मा ने चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में सीनियर रेजिडेंट के पद पर कार्यरत डॉ. ग्रंथिका की रिसर्च को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
उनका अध्ययन एक दुर्लभ बीमारी थोरैसिक अमीबायसिस पर केंद्रित है। इस स्थिति में छाती की प्लूरल कैविटी में भूरे रंग का मवाद जमा हो सकता है। रिसर्च में बताया गया है कि इसके लक्षणों को केवल टीबी समझना सही नहीं है, क्योंकि इसके पीछे अमीबायसिस का दुर्लभ संक्रमण भी हो सकता है।
बुखार, सीने में दर्द और भूरे बलगम को न करें नजरअंदाज
शोध के अनुसार, थोरैसिक अमीबायसिस के दौरान मरीज को बुखार, सीने में दर्द और भूरे रंग का बलगम आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
इन लक्षणों को अक्सर टीबी से जोड़कर देखा जा सकता है, लेकिन कुछ मामलों में ये दुर्लभ अमीबायसिस संक्रमण का संकेत भी हो सकते हैं। इसलिए सही जांच और समय पर बीमारी की पहचान बेहद जरूरी है।
आंत से छाती तक फैल सकता है अमीबायसिस का संक्रमण
यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, रोहतक के वाइस चांसलर डॉ. एचके अग्रवाल ने डॉ. ग्रंथिका को इस उपलब्धि पर बधाई दी।
उन्होंने बताया कि अमीबायसिस का संक्रमण आमतौर पर आंतों से शुरू होता है, लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में यह छाती तक फैल सकता है। इससे फेफड़ों के आसपास मौजूद प्लूरल कैविटी में मवाद जमा होने लगता है। इस स्थिति को एम्पायमा कहा जाता है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, रिसर्च में ऐसे मामलों की दुर्लभता का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह स्थिति लगभग 2.5 लाख लोगों में से एक में देखने को मिलती है।
समय पर इलाज से बड़ी सर्जरी की जरूरत से बचाव संभव
रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. प्रेम प्रकाश गुप्ता ने कहा कि बीमारी की शुरुआती पहचान और उचित इलाज बेहद जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इसके उपचार में आमतौर पर एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं और छाती में जमा मवाद को एक ट्यूब के जरिए बाहर निकाला जाता है। यह ड्रेनेज प्रक्रिया लगभग 10 दिनों तक चल सकती है।
समय पर बीमारी की पहचान और सही उपचार मिलने से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है और बड़ी सर्जरी की जरूरत से भी बचा जा सकता है।
मुख्य बातें
-
PGIMS रोहतक की डॉ. ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च को राष्ट्रीय पहचान मिली।
-
शोध थोरैसिक अमीबायसिस नामक दुर्लभ बीमारी पर आधारित है।
-
इसमें छाती की प्लूरल कैविटी में भूरे रंग का मवाद जमा हो सकता है।
-
बुखार, सीने में दर्द और भूरे बलगम को केवल टीबी का लक्षण न समझें।
-
यह संक्रमण आंतों से छाती तक फैल सकता है।
-
इलाज में एंटीबायोटिक्स और ट्यूब के जरिए मवाद निकालना शामिल हो सकता है।
-
समय पर इलाज से बड़ी सर्जरी के बिना रिकवरी संभव है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. थोरैसिक अमीबायसिस क्या है?
यह अमीबायसिस संक्रमण का एक दुर्लभ रूप है, जिसमें संक्रमण छाती तक फैल सकता है और प्लूरल कैविटी में मवाद जमा हो सकता है।
2. इस बीमारी के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
बुखार, सीने में दर्द और भूरे रंग का बलगम इसके संभावित लक्षणों में शामिल हैं।
3. क्या इन लक्षणों का मतलब हमेशा टीबी होता है?
नहीं। ये लक्षण अन्य बीमारियों में भी हो सकते हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में थोरैसिक अमीबायसिस भी इसकी वजह हो सकता है।
4. इस बीमारी का इलाज कैसे किया जाता है?
आमतौर पर एंटीबायोटिक्स और ट्यूब के जरिए छाती में जमा मवाद को बाहर निकालने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इलाज मरीज की स्थिति के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं।
5. रिसर्च किस डॉक्टर ने की है?
यह रिसर्च PGIMS रोहतक के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. ग्रंथिका शर्मा ने की है।
निष्कर्ष
डॉ. ग्रंथिका शर्मा की रिसर्च ने एक दुर्लभ बीमारी के प्रति चिकित्सा जगत और आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इसका मुख्य संदेश है कि बुखार, सीने में दर्द और भूरे बलगम जैसे लक्षणों को केवल टीबी मानकर नहीं चलना चाहिए। सही जांच और समय पर उपचार से मरीज के स्वस्थ होने की संभावना बेहतर हो सकती है।


