जालंधर में राष्ट्रव्यापी हड़ताल के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन, श्रम संहिताएं रद्द करने की मांग

देश भगत यादगार हॉल से प्रेस क्लब तक रैली; पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोका, दो घंटे धरना

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ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी हड़ताल आह्वान के समर्थन में जालंधर के देश भगत यादगार हॉल में सैकड़ों श्रमिकों, कर्मचारियों, आशा, मिड-डे मील और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, किसानों व पेंशनरों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने श्रम संहिताओं को रद्द करने और पुरानी श्रम कानूनों की बहाली की मांग उठाई।

ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी हड़ताल आह्वान के समर्थन में आज जालंधर के देश भगत यादगार हॉल में सैकड़ों श्रमिकों, मिड-डे मील कर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं, ग्रामीण व खेत मजदूरों, कर्मचारियों, पेंशनरों और किसानों ने जोरदार प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को रद्द करने और पूर्व श्रम कानूनों को बहाल करने की मांग की। इसके अलावा उन्होंने मिड-डे मील, आशा और आंगनवाड़ी सहित अकुशल श्रमिकों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने तथा 26,000 रुपये मासिक वेतन निर्धारित करने की मांग रखी।

प्रमुख मांगें

प्रदर्शनकारियों की अन्य मांगों में शामिल हैं:

  • बिजली संशोधन विधेयक और बीज विधेयक 2025 को वापस लिया जाए

  • वीबी-जी राम जी (VB-G Ram G) को रद्द किया जाए

  • मनरेगा कानून को बहाल किया जाए

  • सरकारी संस्थानों के निजीकरण पर रोक लगाई जाए

  • भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को रद्द किया जाए

पुलिस से टकराव, सड़क पर धरना

विशाल रैली के बाद संगठन देश भगत यादगार हॉल से प्रेस क्लब की ओर मार्च कर रहे थे। इसी दौरान भारी पुलिस बल ने मुख्य सड़क पर वाहन और बैरिकेड लगाकर प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया।

पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने सड़क के बीचों-बीच धरना दिया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

सरकार पर दोहरी नीति का आरोप

सभा को संबोधित करते हुए नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान शहर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में व्यस्त थे, लेकिन आंदोलनकारियों से मिलने या उनकी मांगों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी।

उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर पंजाब सरकार और आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल का समर्थन करने की घोषणा की, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार के निर्देश पर पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों को बलपूर्वक रोक दिया। नेताओं ने इसे सरकार की “दोहरी नीति” करार दिया और इसकी कड़ी निंदा की।

श्रम संहिताओं पर तीखी प्रतिक्रिया

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने 29 श्रमिक समर्थक कानूनों को समाप्त कर चार श्रम संहिताएं लागू की हैं, जिनका उद्देश्य श्रमिकों के लोकतांत्रिक अधिकार, जैसे यूनियन बनाने का अधिकार, छीनना है।

उन्होंने आरोप लगाया कि ये कदम कॉरपोरेट घरानों और देशी-विदेशी पूंजीपतियों को खुश करने के लिए उठाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 1 अप्रैल से इन चारों श्रम संहिताओं को लागू करने की घोषणा की गई है।

उनका कहना था कि इन संहिताओं के लागू होने से:

  • स्थायी नौकरियों की जगह फिक्स्ड टर्म रोजगार लागू होगा

  • नौकरी की सुरक्षा खत्म होगी

  • कार्य अवधि 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे तक की जा सकती है

  • वेतन वृद्धि के बजाय शर्तें थोपी जाएंगी

  • श्रमिकों की सुरक्षा, सुविधाएं, वेतन और बोनस प्रबंधन के विवेक पर छोड़ दिए जाएंगे

संघर्ष तेज करने की चेतावनी

प्रदर्शनकारियों ने श्रमिकों से अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष पर भरोसा रखने का आह्वान किया। उन्होंने घोषणा की कि 22 फरवरी को राज्य सरकार के मंत्रियों, विधायकों और भाजपा नेताओं के आवासों के बाहर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।

करीब दो घंटे तक चले धरने के बाद आंदोलन को समाप्त कर दिया गया, लेकिन नेताओं ने संघर्ष को और तेज तथा व्यापक बनाने की घोषणा की।Screenshot_1140

Edited By: Karan Singh

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