- Hindi News
- राज्य
- पंजाब
- चंबा रुमाल ने अमृतसर में बिखेरा हिमालयी कला का जादू, KT Kala Museum में छात्रों ने सीखी अनूठी कढ़ाई
चंबा रुमाल ने अमृतसर में बिखेरा हिमालयी कला का जादू, KT Kala Museum में छात्रों ने सीखी अनूठी कढ़ाई
KT Kala Museum and Art Gallery में आयोजित विशेष वर्कशॉप में कलाकार एवं क्राफ्ट रिसर्चर रीना देवी ने चंबा रुमाल की प्रसिद्ध ‘दोरुखा’ तकनीक का प्रदर्शन किया।
अमृतसर में आयोजित विशेष कला कार्यशाला में चंबा रुमाल की समृद्ध परंपरा और बारीक कढ़ाई से कला प्रेमी रूबरू हुए। छात्रों ने हिमाचल प्रदेश से जुड़ी इस पारंपरिक कला की दोरुखा तकनीक को करीब से समझा।
अमृतसर में बुधवार को कला प्रेमियों को हिमालय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक खास कला देखने और समझने का मौका मिला। KT Kala Museum and Art Gallery में आयोजित विशेष वर्कशॉप में चंबा रुमाल की खूबसूरती, इतिहास और पारंपरिक कढ़ाई तकनीक को केंद्र में रखा गया।
कार्यक्रम में कलाकार और क्राफ्ट रिसर्चर रीना देवी ने कला छात्रों को चंबा रुमाल की प्रसिद्ध ‘दोरुखा’ यानी डबल स्टिच तकनीक का प्रदर्शन करके समझाया। इस पारंपरिक कला में दोनों तरफ एक समान और आईने जैसी कढ़ाई तैयार होती है, जो इसे बेहद खास बनाती है।
चंबा रुमाल की कला से रूबरू हुए कला प्रेमी
चंबा रुमाल हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक कढ़ाई कला है। इसकी बारीक सुई-कढ़ाई और आकर्षक डिजाइनों के कारण इसे लघु चित्रकला जैसा स्वरूप भी माना जाता है।वर्कशॉप के दौरान छात्रों को इस कला की बारीकियों के साथ-साथ इसके सांस्कृतिक महत्व के बारे में भी जानकारी दी गई। रीना देवी ने पारंपरिक तकनीक को आधुनिक और टिकाऊ फैशन के संदर्भ में आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर भी काम किया है।
दोरुखा तकनीक क्यों है खास?
चंबा रुमाल की दोरुखा तकनीक इसकी सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है। इसमें कढ़ाई इस तरह की जाती है कि कपड़े के दोनों तरफ लगभग एक जैसी आकृति और फिनिश दिखाई देती है।
रीना देवी के अनुसार, यह तकनीक चंबा रुमाल को भौगोलिक पहचान वाले विशेष वस्त्र शिल्प के रूप में अलग पहचान देती है। इसकी बारीक कढ़ाई देखने में किसी मिनिएचर पेंटिंग जैसी प्रतीत होती है।
गुरु नानक देव से भी जुड़ा है चंबा रुमाल का इतिहास
चंबा रुमाल का पंजाब के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास से भी गहरा संबंध बताया जाता है। मान्यता है कि गुरु नानक देव की बहन बेबे नानकी द्वारा 16वीं सदी में तैयार किया गया सबसे पुराना दर्ज चंबा रुमाल होशियारपुर स्थित गुरुद्वारा बाबे दे बेर में संरक्षित है।
इस ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण चंबा रुमाल केवल एक पारंपरिक हस्तकला नहीं, बल्कि पंजाब और हिमाचल की साझा सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
पारंपरिक कला को टिकाऊ फैशन से जोड़ने की कोशिश
क्राफ्ट रिसर्चर रीना देवी का काम पारंपरिक शिल्प, स्थिरता और महिलाओं के नेतृत्व वाले रचनात्मक उद्यमों को बढ़ावा देने पर केंद्रित रहा है।
वह चंबा रुमाल की पारंपरिक तकनीक को संरक्षित करने के साथ-साथ इसे टिकाऊ और स्लो फैशन उद्योग से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही हैं। वर्कशॉप में छात्रों को इसी दृष्टिकोण के साथ पारंपरिक कढ़ाई के व्यावहारिक पहलुओं को समझने का अवसर मिला।
Key Highlights:
- अमृतसर में KT Kala Museum and Art Gallery में चंबा रुमाल पर विशेष वर्कशॉप आयोजित हुई।
- कलाकार एवं क्राफ्ट रिसर्चर रीना देवी ने छात्रों को ‘दोरुखा’ तकनीक का प्रदर्शन किया।
- दोरुखा तकनीक में कपड़े के दोनों तरफ एक समान कढ़ाई की जाती है।
- चंबा रुमाल हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक कढ़ाई कला है।
- इसे देखने में मिनिएचर पेंटिंग जैसा प्रभाव देने वाली कला के रूप में जाना जाता है।
- चंबा रुमाल का पंजाब के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास से भी संबंध बताया जाता है।
- बेबे नानकी से जुड़ा 16वीं सदी का चंबा रुमाल होशियारपुर के गुरुद्वारा बाबे दे बेर में संरक्षित होने की बात कही गई है।
- रीना देवी पारंपरिक कला को टिकाऊ और स्लो फैशन से जोड़ने की दिशा में काम कर रही हैं।
FAQ Section:
चंबा रुमाल क्या है?
चंबा रुमाल हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक कढ़ाई कला है, जिसमें हाथ से बारीक सुई-काम करके आकर्षक डिजाइन तैयार किए जाते हैं।
दोरुखा तकनीक क्या है?
दोरुखा चंबा रुमाल की विशेष डबल स्टिच तकनीक है। इसमें कढ़ाई दोनों तरफ से लगभग समान दिखाई देती है, जिससे इसका फिनिश आईने जैसा नजर आता है।
चंबा रुमाल का पंजाब से क्या संबंध है?
चंबा रुमाल का पंजाब की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से संबंध बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, गुरु नानक देव की बहन बेबे नानकी द्वारा तैयार किया गया एक प्राचीन चंबा रुमाल होशियारपुर में संरक्षित है।
KT Kala Museum में क्या हुआ?
KT Kala Museum and Art Gallery में चंबा रुमाल पर विशेष वर्कशॉप आयोजित की गई, जिसमें कला छात्रों को इसकी पारंपरिक कढ़ाई और दोरुखा तकनीक के बारे में बताया गया।
चंबा रुमाल को मिनिएचर पेंटिंग जैसा क्यों कहा जाता है?
इसकी बारीक और बेहद सटीक कढ़ाई, जटिल आकृतियों तथा दोनों तरफ समान फिनिश के कारण यह देखने में मिनिएचर पेंटिंग जैसा प्रभाव देता है।
Conclusion:
KT Kala Museum and Art Gallery में आयोजित चंबा रुमाल की वर्कशॉप ने कला प्रेमियों और छात्रों को हिमालयी हस्तकला की समृद्ध परंपरा से जोड़ने का काम किया। दोरुखा जैसी पारंपरिक तकनीक के प्रदर्शन के जरिए न केवल इस कला की बारीकियां सामने आईं, बल्कि इसे टिकाऊ फैशन और आधुनिक रचनात्मक उद्योग से जोड़ने की संभावनाओं पर भी ध्यान गया। ऐसी पहलें पारंपरिक भारतीय शिल्प को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
